Homeमनोरंजनजब एक फिल्म के जुनून में सुनील दत्त हो गए थे दिवालिया,...

जब एक फिल्म के जुनून में सुनील दत्त हो गए थे दिवालिया, तब नरगिस बनीं ताकत

दिवंगत अभिनेता सुनील दत्त की आज बर्थ एनिवर्सरी है। 6 जून 1929 को झेलम, पाकिस्तान में जन्मे सुनील दत्त भारतीय सिनेमा की सबसे सम्मानित हस्तियों में से एक रहे हैं। बॉलीवुड में ‘रेलवे प्लेटफॉर्म’ फिल्म से अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत करने के बाद, उन्होंने ‘मदर इंडिया’, ‘साधना’, ‘मुझे जीने दो’, ‘वक्त’, ‘पड़ोसन’, ‘हमराज’ और ‘रेशमा और शेरा’ जैसी फिल्मों में यादगार परफॉर्मेंस दीं।

यह बात है साल 1971 की। सुनील दत्त उस समय भारतीय सिनेमा के स्थापित अभिनेताओं में से एक थे। वे सिर्फ अभिनय नहीं कर रहे थे, बल्कि अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘अजंता आर्ट्स’ के बैनर तले लीक से हटकर फिल्में भी बना रहे थे। इसी दौरान उनके दिमाग में एक विचार आया, राजस्थान की पृष्ठभूमि पर (लैला- मजनू टाइप) एक अमर प्रेम कहानी बनाने का, जिसे नाम दिया गया ‘रेशमा और शेरा’।

सुनील दत्त इस फिल्म को लेकर इस कदर जुनूनी थे कि वे इसे अपने करियर की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कोई शॉर्टकट नहीं चुना। फिल्म की प्रामाणिकता के लिए वे पूरी स्टारकास्ट और क्रू को लेकर राजस्थान के जैसलमेर के पास पोचीना गांव पहुंच गए, जहां पूरी यूनिट टेंटों में रहकर शूटिंग कर रही थी।

उस दौर में जब अधिकांश फिल्में स्टूडियो में शूट होती थीं, तब रेगिस्तान में वास्तविक लोकेशन पर इतनी बड़ी फिल्म की शूटिंग करना बेहद जोखिम भरा फैसला था। लेकिन सुनील दत्त को भरोसा था कि उनकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी और फिल्म भारतीय सिनेमा में एक अलग पहचान बनाएगी।

फिल्म में वहीदा रहमान, विनोद खन्ना, राखी और अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार थे। दिलचस्प बात यह है कि अमिताभ बच्चन उस समय फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष कर रहे थे। एक किस्सा यह भी मशहूर है कि जब सुनील दत्त ने उनकी शुरुआती फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ देखी तो उनके अभिनय से प्रभावित हुए, लेकिन उनकी आवाज को लेकर संशय में थे। बाद में उन्होंने अमिताभ को ‘रेशमा और शेरा’ में लिया, मगर एक मूक किरदार में। विडंबना यह है कि आगे चलकर यही आवाज भारतीय सिनेमा की सबसे पहचान योग्य आवाजों में शामिल हो गई।

सुनील दत्त की मूल योजना थी कि फिल्म की शूटिंग 15 दिनों में पूरी कर ली जाएगी। फिल्म का निर्देशन प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार एस. सुखदेव कर रहे थे। शूटिंग का बड़ा हिस्सा पूरा भी हो चुका था। लेकिन इसी दौरान सुनील दत्त ने फिल्म के रशेस (कुछ हिस्से) देखे और वह उनसे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने एक बड़ा और जोखिम भरा फैसला लिया। एस. सुखदेव को हटाकर खुद निर्देशन की जिम्मेदारी संभाल ली और फिल्म के कई हिस्सों को दोबारा शूट किया।

इस फैसले ने पूरी परियोजना की दिशा बदल दी। जहां शूटिंग 15 दिन में पूरी होनी थी, वहां इसे पूरा होने में करीब दो महीने लग गए। ऊपर से बढ़ती लागत ने बजट को नियंत्रण से बाहर कर दिया।

फिल्म के खत्म होने तक हो गया था 60 लाख का कर्ज

फिल्म को पूरा करने के लिए सुनील दत्त ने भारी कर्ज लिया। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि जब तक ‘रेशमा और शेरा’ पूरी हुई, तब तक उन पर लगभग 60 लाख रुपये का कर्ज हो चुका था। उस दौर में यह रकम बेहद बड़ी मानी जाती थी।

इतना ही नहीं, फिल्म पर पूरा ध्यान देने के कारण उन्होंने बतौर अभिनेता पांच फिल्मों के प्रस्ताव भी ठुकरा दिए थे। उन्हें विश्वास था कि ‘रेशमा और शेरा’ की सफलता सारी मुश्किलें दूर कर देगी। आखिरकार यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, उनका ड्रीम प्रोजेक्ट था।

बॉक्स पर हुई ढेर लेकिन जीते तीन राष्ट्रीय पुरस्कार

रिलीज के बाद ‘रेशमा और शेरा’ को समीक्षकों ने खूब सराहा। इसकी सिनेमैटोग्राफी, संगीत और राजस्थान के रेगिस्तानी जीवन के चित्रण की प्रशंसा हुई। फिल्म ने तीन राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते, जिनमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन और सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफी के सम्मान शामिल थे। लेकिन बॉक्स ऑफिस का फैसला अलग था।

फिल्म दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में असफल रही और व्यावसायिक रूप से नुकसान का सौदा साबित हुई। जिस फिल्म पर सुनील दत्त ने अपनी पूंजी, प्रतिष्ठा और वर्षों की मेहनत दांव पर लगा दी थी, वही उनके जीवन का सबसे बड़ा आर्थिक झटका बन गई।

जब सुपरस्टार बसों में सफर करने लगा

फिल्म की असफलता के बाद हालात इतने खराब हो गए कि सुनील दत्त लगभग दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच गए। कर्जदाताओं ने पैसे की मांग शुरू कर दी। बाद में उन्होंने खुद बताया था कि उनकी सात कारों में से छह बिक चुकी थीं। सिर्फ एक कार बची थी, जिसका इस्तेमाल बच्चों को स्कूल छोड़ने और वापस लाने के लिए किया जाता था। उनका घर भी गिरवी रखा जा चुका था। हालात यहां तक पहुंच गए कि उन्हें बसों में सफर करना पड़ता था।

उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि लोग उन्हें देखकर ताने मारते थे, “क्यों सुनील दत्त, सब खत्म हो गया? अब बस में जाना शुरू कर दिया?” एक समय ऐसा आ गया था जब हिंदी सिनेमा का यह बड़ा सितारा हर महीने कर्ज और खर्चों का हिसाब लगाकर भविष्य की चिंता करता था।

नरगिस ने नहीं टूटने दिया हौसला

इस कठिन दौर में उनकी सबसे बड़ी ताकत बनीं उनकी पत्नी नरगिस दत्त। जब आर्थिक संकट ने परिवार को घेर लिया था, तब नरगिस मजबूती से उनके साथ खड़ी रहीं। घर में मौजूद नरगिस का प्रिव्यू थिएटर भी परिवार के लिए सहारा बना। वहां फिल्म निर्माताओं की फिल्मों के प्रिव्यू और डबिंग का काम होने लगा, जिससे कुछ अतिरिक्त आय होने लगी। सुनील दत्त ने कई मौकों पर स्वीकार किया कि पत्नी के समर्थन और विश्वास ने उन्हें मानसिक रूप से टूटने नहीं दिया।

बहुत कम लोग जानते हैं कि ‘रेशमा और शेरा’ के जरिए संजय दत्त ने भी पहली बार बड़े पर्दे पर कदम रखा था। उस समय संजय दत्त महज 12 साल के थे। स्कूल की छुट्टियों में वह राजस्थान पहुंचे थे, जहां फिल्म की शूटिंग चल रही थी। सुनील दत्त ने उनसे पूछा कि क्या वे फिल्म में काम करना चाहेंगे। संजय तैयार हो गए।

इसके बाद उन्हें फिल्म की मशहूर कव्वाली ‘जालिम मेरी शराब में ये क्या मिला दिया’ में मुख्य कव्वाल सुधीर लूथरा के साथ बैठाया गया। बेटे की इस छोटी-सी प्रस्तुति से सुनील दत्त इतने खुश हुए कि वह उन्हें प्यार से “चमेली जान” कहकर बुलाने लगे। कई बार अपने पत्रों में भी वह संजय के लिए यही संबोधन इस्तेमाल करते थे।

दो साल बाद बदली किस्मत

‘रेशमा और शेरा’ की असफलता के बाद सुनील दत्त के लिए अगले दो वर्ष बेहद कठिन रहे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलने लगीं। ‘हीरा’ (1973), ‘गीता मेरा नाम’ (1974), ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ (1974) और ‘नहले पर दहला’ (1976) जैसी फिल्मों ने उन्हें फिर से आर्थिक और पेशेवर मजबूती दी।

author avatar
अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
Anil Sharma, Anil Anuj, Anil anuj articles, bole bharat, बोले भारत, अनिल शर्मा, अनिल अनुज,
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular