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SC ने कॉमेडियन समय रैना समेत 5 को अपने चैनलों पर माफी माँगने को कहा, क्या है मामला?

कोर्ट ने कॉमेडियनों को अपने पॉडकास्ट और सोशल मीडिया चैनलों पर माफी मांगने का निर्देश दिया। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, पश्चाताप की मात्रा अपराध की मात्रा से अधिक होनी चाहिए।

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Samay Raina, supreme court
समय रैना। फोटोः इंस्टाग्राम (समय रैना)

नई दिल्ली: सामाजिक और व्यावसायिक मंचों पर विकलांगों का मजाक उड़ाने वाले कंटेंट पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को कॉमेडियन और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर समय रैना समेत पांच लोगों को उनके चैनलों पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह की असंवेदनशील सामग्री बनाने के लिए इन पर जुर्माना भी लगाया जाएगा।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ SMA Cure Foundation की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसे वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने पेश किया। याचिका में कॉमेडियन्स समय रैना, विपुन गोयल, बलराज परमारजीत सिंह घई, सोनाली ठक्कर (उर्फ सोनाली आदित्य देसाई) और निशांत जगदीश तंवर के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी। इन लोगों पर विकलांग व्यक्तियों का मजाक उड़ाने वाले असंवेदनशील चुटकुले बनाने का आरोप लगाया गया था।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ऐसे व्यावसायिक भाषण पर लागू नहीं होता, जो किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाता हो। जस्टिस बागची ने कहा, “हास्य जीवन का एक हिस्सा है और इसका स्वागत है… हम खुद पर हंसते हैं। लेकिन जब हम दूसरों पर हंसना शुरू करते हैं और संवेदनशीलता का उल्लंघन करते हैं… तो यह समस्याग्रस्त हो जाता है।” उन्होंने आगे कहा कि जब हास्य से किसी समुदाय को ठेस पहुंचती है, तो यह अस्वीकार्य है।

जस्टिस बागची ने जोर देकर कहा कि “इन्फ्लुएंसर्स को समझना चाहिए कि वे सिर्फ मज़ाक नहीं कर रहे, बल्कि व्यावसायिक (कमर्शियल) भाषण दे रहे हैं। समाज का इस्तेमाल किसी वर्ग की भावनाएं आहत करने के लिए नहीं किया जा सकता।”

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि माफी का स्तर उसी अनुपात में होना चाहिए जितनी गंभीरता से गलती की गई है। उन्होंने सुझाव दिया कि कॉमेडियन्स अपने पॉडकास्ट और चैनलों पर न सिर्फ माफी माँगें बल्कि दिव्यांग अधिकारों को लेकर जागरूकता फैलाने का भी प्रयास करें।

केंद्र को दिशानिर्देश बनाने का निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सोशल मीडिया पर ऐसे भाषणों पर अंकुश लगाने के लिए दिशानिर्देश बनाने को कहा, जो विकलांगों, महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों का अपमान या मजाक करते हैं। कोर्ट ने कहा कि ये दिशानिर्देश “जल्दबाजी में नहीं, बल्कि सभी हितधारकों के विचारों के आधार पर व्यापक मापदंडों पर आधारित होने चाहिए।”

अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने अदालत को बताया कि सरकार इस संबंध में एक मसौदा दिशानिर्देश तैयार करने पर सहमत है और इसे अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। जस्टिस सूर्यकांत ने भी इस बात पर जोर दिया कि अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और सम्मान के अधिकार) से ऊपर नहीं हो सकता है।

माफी और जुर्माने पर फैसला जल्द

कोर्ट ने कॉमेडियनों को अपने पॉडकास्ट और सोशल मीडिया चैनलों पर माफी मांगने का निर्देश दिया। जस्टिस सूर्यकांत ने सुझाव दिया कि अपनी गलती सुधारने के लिए, कॉमेडियन अपने मंचों का उपयोग विकलांगों के अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए भी कर सकते हैं।

इस मामले में अदालत ने पहले इन कॉमेडियनों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया था और चेतावनी दी थी कि अगर वे अदालत में पेश नहीं हुए तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट के सामने उपस्थित होने के बाद, अदालत ने उनकी आगे की व्यक्तिगत उपस्थिति को माफ कर दिया। अदालत अगले सुनवाई में कॉमेडियनों पर लगाए जाने वाले जुर्माने की राशि पर फैसला करेगी।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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