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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जांच एजेंसियां अब वकीलों को यूं ही समन नहीं भेज सकेंगी

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि वकीलों को समन भेजना आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन और वकील-ग्राहक गोपनीयता के कानूनी संरक्षण का हनन है।

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक आदेश में कहा कि जांच अधिकारी किसी भी आरोपी के वकील को समन नहीं भेज सकते, जब तक कि कानून में बताए गए विशेष अपवाद लागू न हों। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि ऐसा कोई समन जारी किया जाए, तो उसमें इन अपवादों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि वकीलों को समन भेजना आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन और वकील-ग्राहक गोपनीयता के कानूनी संरक्षण का हनन है। अदालत ने इस फैसले के साथ एक संबंधित मामले में जारी समन को रद्द कर दिया।

अदालत ने आगे कहा कि जांच एजेंसियां किसी वकील से उसके ग्राहक से जुड़ी जानकारी तभी मांग सकती हैं जब वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 132 में दिए गए अपवादों के दायरे में आती हो। यह धारा वकील और मुवक्किल के बीच की गोपनीय बातचीत को कानूनी सुरक्षा देती है।

डिजिटल डिवाइस की जब्ती को लेकर निर्देश

बेंच ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 94 के तहत जब कोई डिजिटल उपकरण जांच में जब्त किया जाता है, तो उसे केवल क्षेत्राधिकार वाली अदालत में प्रस्तुत किया जा सकता है। अदालत को उस पक्ष को नोटिस देना होगा और डिवाइस केवल उस व्यक्ति, उसके वकील और चुने गए डिजिटल विशेषज्ञों की मौजूदगी में ही खोला जा सकेगा।

अदालत ने कहा कि “जांच एजेंसियां अब से वकीलों को केवल अपवादात्मक स्थितियों में ही बुला सकती हैं और तब भी उनके अन्य मुवक्किलों की गोपनीयता पूरी तरह सुरक्षित रखी जानी चाहिए।” सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को कानूनी पेशे की स्वतंत्रता और वकील-मुवक्किल विशेषाधिकार (lawyer-client privilege) की सुरक्षा के लिए मील का पत्थर माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला एक स्वत: संज्ञान मामले में दिया। दरअसल अदालत ने यह जांच शुरू की थी कि क्या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी एजेंसियां उन वकीलों को समन कर सकती हैं जो अपने मुवक्किलों को कानूनी राय देते हैं या उनकी ओर से जांच के दौरान पेश होते हैं।

यह मामला तब शुरू हुआ जब ईडी ने वरिष्ठ वकील अरविंद दातार और प्रताप वेणुगोपाल को समन भेजा था। कानूनी समुदाय के विरोध के बाद ईडी ने ये समन वापस ले लिए थे। अदालत ने तब कहा था कि वह नागरिकों के अधिकारों की संरक्षक है।

‘वकीलों को पेशेवर सलाह देने पर समन नहीं किया जा सकता’

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वकील न्याय व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं और उन्हें सुरक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा, “किसी वकील को केवल पेशेवर सलाह देने के लिए समन नहीं किया जा सकता।”

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सुरक्षा तब लागू नहीं होगी जब कोई वकील सबूतों से छेड़छाड़ या फर्जीवाड़े की सलाह देता हो।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन की ओर से अधिवक्ता विपिन नायर ने वकीलों को समन भेजे जाने पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा कि ऐसा कदम वकालत पेशे की स्वतंत्रता पर ठंडा असर डाल सकता है।

नायर ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 की धारा 50 के तहत ऐसे समन “वकील-ग्राहक गोपनीयता” के सिद्धांत का गंभीर उल्लंघन हैं।

विकास सिंह ने सुझाव दिया कि यदि किसी वकील को समन जारी करना हो तो वह जिले के पुलिस अधीक्षक स्तर से ही किया जाए और न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद ही अमल में लाया जाए।

वरिष्ठ वकील प्रताप वेणुगोपाल ने ईडी की कार्रवाई को “गैरकानूनी, असंवैधानिक और वकीलों को डराने वाला” बताया। उन्होंने कहा, “सेक्शन 132 के तहत वकीलों को मुवक्किल की गोपनीय जानकारी साझा करने से सुरक्षा मिली है, लेकिन समन भेजकर इस अधिकार को खत्म किया जा रहा है।”

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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