केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले हफ्ते शुक्रवार को ‘समुद्र मंथन’ नाम के 84,084 करोड़ रुपये की एक योजना को मंजूरी दी। इस योजना का उद्देश्य भारत के समुद्री तटों के पास तेल और गैस की खोज को तेज करना है। अगले पांच वर्षों में इस योजना के तहत देश के ऑफशोर बेसिनों (समुद्र के नीचे स्थित कुछ भू-भाग, जहां तेल और गैस मिलने की संभावना होती है) का आधुनिक भूकंपीय (सीस्मिक) सर्वे कराया जाएगा, 60 गहरे समुद्री खोजी कुएं (डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन वेल) खोदे जाएंगे, जिनकी लागत का आधा हिस्सा सरकार वहन करेगी। साथ ही ऐसी साझा आधारभूत संरचना विकसित की जाएगी ताकि यदि तेल या गैस का भंडार मिले, तो उसका उत्पादन भी शुरू किया जा सके।
अगर यह योजना सफल होती है, तो भारत का घरेलू तेल और गैस उत्पादन वर्तमान लगभग 6.2 करोड़ टन ऑयल-इक्विवेलेंट प्रतिवर्ष से बढ़कर 8 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। लेकिन यह पूरी तरह संभावनाओं का मामला है।
दरअसल, भारत में कच्चे तेल का उत्पादन लगातार घटा है। वर्ष 2015-16 में जहां देश में 3.69 करोड़ टन कच्चे तेल का उत्पादन हुआ था, वहीं 2024-25 में यह घटकर 2.87 करोड़ टन रह गया। इसके उलट तेल आयात पर निर्भरता बढ़कर रिकॉर्ड 88.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) और पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (OPEC) दोनों का अनुमान है कि अब से 2050 तक वैश्विक तेल मांग में सबसे अधिक वृद्धि भारत से होगी। दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर के रास्तों पर बार-बार असर डाला है। इससे भारत को भी परेशानी हुई।
ऐसे में घटते घरेलू उत्पादन और बढ़ती मांग ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें सरकार को किसी न किसी स्तर पर हस्तक्षेप करना ही था। वहीं पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों ने इस निर्णय को और अधिक तात्कालिक बना दिया।
समुद्र में तेल खोजना इतना कठिन क्यों है?
असल में तेल जमीन के नीचे किसी झील की तरह जमा नहीं रहता, जैसा आमतौर पर समझा जाता है। तेल विशेष प्रकार की चट्टानों के बेहद सूक्ष्म छिद्रों (पोर स्पेस) में मौजूद होता है। किसी स्थान पर व्यावसायिक रूप से उपयोगी मात्रा में तेल मिलने के लिए पांच अलग-अलग भूवैज्ञानिक स्थितियों का एक साथ मौजूद होना जरूरी है। भूवैज्ञानिक इसे ‘वर्किंग पेट्रोलियम सिस्टम’ कहते हैं। इस अवधारणा को 1994 में लेस्ली मैगून और वॉलेस डॉव ने प्रस्तुत किया था और आज भी इसे इस क्षेत्र का मानक संदर्भ माना जाता है।
सबसे पहले सोर्स रॉक का होना जरूरी है। यह आमतौर पर शेल जैसी चट्टान होती है, जिसमें कभी बड़ी मात्रा में जैविक पदार्थ मौजूद रहे हों। लंबे समय तक अधिक तापमान और दबाव में रहने के बाद यही जैविक पदार्थ हाइड्रोकार्बन यानी तेल और गैस में बदलता है। इसके अलावा रिजर्वायर रॉक भी होना चाहिए। यह आमतौर पर बलुआ पत्थर (Sandstone) या चूना पत्थर (Limestone) जैसी छिद्रयुक्त चट्टान होती है, जो स्पंज की तरह तेल को अपने भीतर संजोकर रख सकती है।
तीसरी जरूरत सील (Seal) की होती है। यह मिट्टी या नमक जैसी ऐसी अभेद्य परत होती है, जो तेल को ऊपर की ओर रिसने से रोकती है। इसके अलावा ट्रैप (Trap) भी होना चाहिए। यह चट्टानों की ऐसी भूवैज्ञानिक संरचना होती है, जो तेल को एक जगह इकट्ठा रखती है। यदि ऐसा न हो, तो तेल इधर-उधर फैल जाता है। इन पांच में से किसी एक शर्त के भी पूरी न होने पर तेल का व्यावसायिक भंडार नहीं बन पाता।
यही वजह है कि तेल की खोज कई बार असफल हो जाती है। वैश्विक अपस्ट्रीम गतिविधियों (तेल, गैस खोज) पर नजर रखने वाली संस्था रिस्टैड एनर्जी ने साल 2020 में अपतटीय खोजी कुओं (ऑफशोर वाइल्डकैट वेल) की सफलता दर 25 प्रतिशत से भी कम थी। यानी समुद्र में हर चार खोजी कुओं में से तीन पूरी तरह बेकार साबित हुए। यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि इस 25 प्रतिशत सफलता का अर्थ केवल इतना है कि कहीं हाइड्रोकार्बन मिला। इसका मतलब यह नहीं कि वहां इतना तेल या गैस मौजूद था कि उसका उत्पादन आर्थिक रूप से लाभदायक हो। यदि इस कसौटी पर सफलता मापी जाए, तो वास्तविक सफलता दर इससे भी कम है।
समुद्र मंथन योजना: क्या भारत की मुहिम सफल होगी?
समुद्र में सफल तरीके से तेल को खोजने की कहानी गुयाना और नामीबिया जैसे उदाहरण से मिलती है। हालांकि कई उदाहरण बताते हैं कि केवल तेल मिल जाना ही पर्याप्त नहीं होता। कई बार भूगर्भीय, आर्थिक या अन्य किसी कारण से परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पाती।
उदाहरण के तौर पर फॉकलैंड द्वीप के तट पर रॉकहॉपर एक्सप्लोरेशन ने 2010 में ‘सी लायन’ नाम के तेल क्षेत्र की खोज की थी। लेकिन फाइनल निवेश निर्णय लेने में 14 साल लग गए। अब वहां 2028 में उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है। यहां भूगर्भीय दृष्टि से तेल मौजूद था, लेकिन क्षेत्र के दूर होने स्थिति और 2014 के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में आई गिरावट के कारण यह परियोजना एक दशक से अधिक समय तक आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं रही।
ऐसे ही आयरलैंड के समुद्री क्षेत्र में पिछले लगभग 50 वर्षों में करीब 200 खोजी कुएं खोदे गए, लेकिन इनमें से केवल चार स्थानों पर ही व्यावसायिक उत्पादन योग्य भंडार मिले। देश की सबसे बड़ी संभावना वाली परियोजना बैरीरो ऑफशोर एनर्जी भी 2023 में बंद हो गई, क्योंकि सरकार ने उसके और विकास करने की योजना को मंजूरी नहीं दी और वित्तीय सहायता भी नहीं मिल सकी।
ऐसे उदाहरण बताते हैं कि किसी तेल क्षेत्र की सफलता केवल भूगर्भीय खोज पर निर्भर नहीं करती। कई बार आर्थिक कारण या नियामकीय बाधाएं भी परियोजना को रोक देती हैं।
भारत कैसे और कहां करेगा 84,084 करोड़ रुपये खर्च?
तेल और गैस की खोज कई चरणों में होती है और समुद्र मंथन योजना के तहत प्रत्येक चरण पर निवेश किया जाएगा। सबसे पहले सीस्मिक सर्वे कराया जाएगा। इसके लिए समुद्र में विशेष जहाज एयर गन और हाइड्रोफोन की लंबी श्रृंखला खींचते हुए समुद्र तल के नीचे मौजूद चट्टानों की परतों का नक्शा तैयार करेंगे। इस कार्य पर योजना के तहत करीब 28 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
सीस्मिक सर्वे से चट्टानों की संरचना और वहां तरल पदार्थ होने के संकेत मिल सकते हैं, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि वहां तेल मौजूद है। इसकी पुष्टि केवल ड्रिलिंग के जरिए ही हो सकती है।
योजना का सबसे महंगा और जोखिम भरा हिस्सा डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन वेल यानी गहरे समुद्री खोजी कुएं हैं। ऐसे एक कुएं की ड्रिलिंग पर लगभग 8 से 15 करोड़ डॉलर तक खर्च आ सकता है। ड्रिलिंग पूरी होने तक यह पता नहीं चल पाता कि वहां तेल मिला है या वह केवल एक सूखा कुआं है। समुद्र मंथन योजना में 60 ऐसे कुओं की ड्रिलिंग के लिए 43,200 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। इसमें सरकार प्रत्येक संभाविक कुएं की ड्रिलिंग लागत का अधिकतम आधा हिस्सा वहन करेगी, लेकिन प्रति कुआं यह सहायता 675 करोड़ रुपये से अधिक भी नहीं होगी।
सरकार को यह सहायता इसलिए देनी पड़ रही है क्योंकि भारतीय समुद्री क्षेत्रों में खोज की सफलता की संभावना कम है और अंतरराष्ट्रीय बड़ी कंपनियां इन क्षेत्रों में निवेश करने से बचती रही हैं। ऐसे में निजी कंपनियां अकेले इतना बड़ा जोखिम उठाने को तैयार नहीं थीं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि यदि किसी स्थान पर तेल मिल भी जाए, तो उसका उत्पादन शुरू होने में कई वर्ष लग जाते हैं। गहरे समुद्री क्षेत्रों में खोज से लेकर उत्पादन शुरू होने तक 5 से 10 साल तक का समय लग सकता है।
भारत के समुद्री क्षेत्र की मौजूदा स्थिति क्या है?
भारत का समुद्री क्षेत्र पूरी तरह अनछुआ नहीं है। यहां पहले से कई महत्वपूर्ण तेल और गैस क्षेत्र मौजूद हैं। मुंबई हाई, जिसकी खोज 1974 में हुई और 1976 से उत्पादन शुरू हुआ, कई दशकों तक देश का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र रहा। इसका उत्पादन 1989 में प्रतिदिन 4.71 लाख बैरल के उच्चतम स्तर पर पहुंचा था, लेकिन अब यह घटकर लगभग 1.31 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है।
पूर्वी तट के कृष्णा-गोदावरी बेसिन में ओएनजीसी के गहरे समुद्री ब्लॉक KG-DWN-98/2 से जनवरी 2024 में तेल उत्पादन शुरू हुआ, हालांकि उत्पादन की रफ्तार शुरुआती अनुमान से धीमी रही।
इसके अलावा अंडमान सागर में सितंबर 2025 में प्राकृतिक गैस मिलने की घोषणा की गई थी। परीक्षण में गैस में 87 प्रतिशत मीथेन पाया गया, लेकिन अभी यह तय नहीं हुआ है कि वहां व्यावसायिक उत्पादन संभव होगा या नहीं। रिस्टैड एनर्जी के अनुसार, अंडमान के गहरे समुद्री क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाले सीस्मिक डेटा की कमी सबसे बड़ी चुनौती है।
क्या है अनुमान….भारत कितना सफल होगा?
समुद्र मंथन योजना का लक्ष्य वर्ष 2031 तक भारत के घरेलू तेल और गैस उत्पादन को लगभग 6.2 करोड़ टन ऑयल-इक्विवेलेंट से बढ़ाकर 8 करोड़ टन ऑयल-इक्विवेलेंट प्रतिवर्ष करना है। यदि अपतटीय क्षेत्रों में उद्योग की औसत लगभग 25 प्रतिशत सफलता दर को आधार माना जाए, तो 60 खोजी कुओं में से लगभग 15 खोजें सफल हो सकती हैं। दुनिया में ऐसी बहुत कम खोज अभियानों ने बड़ी सफलता हासिल की है। गुयाना इसका एक उदाहरण है, लेकिन अधिकांश अभियान इस स्तर तक नहीं पहुंच पाते।
इसके अलावा, गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल मिलने के बाद भी उत्पादन शुरू होने में कई वर्ष लगते हैं। इसलिए यदि 2028 में भी किसी कुएं में सफलता मिलती है, तो संभव है कि उससे 2031 तक बहुत कम उत्पादन हो सके।
दूसरी ओर, भारत में मांग की स्थिति इतनी अनुकूल नहीं है कि लंबे समय तक इंतजार किया जा सके। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि भारत में तेल की खपत 2023 के 54.8 लाख बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 2030 तक 66 लाख बैरल प्रतिदिन हो जाएगी। इस अवधि में वैश्विक तेल मांग में होने वाली कुल वृद्धि का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा अकेले भारत से आएगा।
वहीं ओपेक ने अनुमान लगाया है कि 2050 तक भारत की अतिरिक्त तेल मांग 82 लाख बैरल प्रतिदिन होगी। यह किसी भी एक देश से होने वाली सबसे बड़ी अतिरिक्त मांग होगी। हालांकि, मांग का यह अनुमान स्थायी नहीं माना गया है।
भारत इन दिनों एक साथ नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, एथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी तेजी से काम कर रहा है। आने वाले दशकों में ये विकल्प तेल पर निर्भरता का एक बढ़ता हुआ हिस्सा कम कर सकते हैं।
कुल मिलाकर देखें तो समुद्र मंथन मौजूदा समय में एक ब्रिज की तरह नजर आता है। यह उन वर्षों के लिए आवश्यक तेल उपलब्ध कराने का प्रयास है, जब तक ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत पर्याप्त स्तर तक विकसित नहीं हो जाते। इसके लिए 84,084 करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है। यदि भूगर्भीय परिस्थितियां अनुकूल रहीं, तो यह योजना भारत को तेल और गैस के मामले में बड़ी राहत दे सकती है।



