दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु और कर्नाटक में इन दिनों कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद गहराता दिखाई दे रहा है। एक ओर तमिलनाडु की विजय सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुकी है तो वहीं कर्नाटक के कई संगठन पानी छोड़ने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। संगठनों ने 13 अगस्त को तमिलनाडु में पानी छोड़ने के खिलाफ बंद का ऐलान भी किया है।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय सी जोसेफ इसको लेकर पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग कर चुके हैं। उन्होंने पीएम से मांग की कि कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना को तब तक कोई वैधानिक या प्रशासनिक मंजूरी न दी जाए जब तक कि वह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के 2007 के फैसले और नदी के जल बंटवारे पर सुप्रीम कोर्ट के 2018 के निर्णय के अनुरूप न हो।
यह पत्र जल शक्ति मंत्रालय द्वारा 27 जुलाई को संसद में दिए गए जवाब के जवाब में लिखा गया था जिसमें कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के 16 फरवरी, 2018 के फैसले में ” स्पष्ट रूप से यह निर्धारित नहीं किया गया है कि कावेरी नदी पर किसी भी संरचना के निर्माण से पहले कर्नाटक को निचले तटवर्ती राज्यों की सहमति प्राप्त करनी होगी। “
गौरतलब है कि मेकेदातु बैलेंसिंग रिजर्वायर बनाने का कर्नाटक का प्रस्ताव लंबे समय से दोनों राज्यों के बीच विवाद का विषय रहा है जिनके बीच कावेरी नदी के पानी में अपने हिस्से को लेकर अक्सर टकराव होता रहा है।
कावेरी नदी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक में क्या विवाद है?
ऐसे में जानने की कोशिश करेंगे कि तमिलनाडु और कर्नाटक में कावेरी नदी के जल को लेकर क्या विवाद है और यह कितना पुराना है, अब तक इसे सुलझाने के लिए क्या कुछ कदम उठाए गए हैं और मौजूदा तनाव किस बात को लेकर है?
कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक के पश्चिमी घाट में ब्रह्मगिरि पर्वत (तलकावेरी) से होता है। यह दक्षिण-पूर्व की ओर बहते हुए तमिलनाडु से गुजरकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इसकी लंबाई लगभग 765-800 किलोमीटर के बीच है।
ऐतिहासिक रूप से तमिलनाडु कावेरी नदी से मिलने वाले कुल पानी का लगभग 602 हजार मिलियन क्यूबिक फीट (TMC) इस्तेमाल करता था। इसके चलते 20वीं सदी की शुरुआत तक कर्नाटक के लिए केवल 138 TMC पानी ही उपलब्ध था। अब पानी की जरूरतों और आपूर्ति को लेकर दोनों राज्यों में टकराव की स्थिति हुई।
दोनों राज्यों के बीच यह विवाद काफी पुराना है और इसकी जड़ें 1892 तक जाती हैं जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन हुआ करता था। तत्कालीन समय में यह विवाद ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आने वाले मद्रास प्रेसिडेंसी और प्रिंसली स्टेट (रिसासत) मैसूर के बीच कावेरी के जल को लेकर विवाद था।

मद्रास और मैसूर के बीच हुआ समझौता
जब दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके तो अंग्रेजों ने पानी के बंटवारे के मामले में मध्यस्थता की और 1924 में मद्रास प्रेसिडेंसी और मैसूर राज्य के बीच एक समझौता हुआ। इसमें कृष्ण राज सागर (KRS) बांध के पानी के इस्तेमाल से जुड़े नियम तय किए गए।
इस समझौते के तहत, तमिलनाडु और पुडुचेरी को कावेरी नदी के अतिरिक्त पानी का 75% हिस्सा मिलना था, जबकि कर्नाटक को 23% मिलना था। बाकी पानी केरल को मिलना था। कितनी जमीन की सिंचाई की जा सकती है इस पर भी पाबंदियां थीं।
1924 में तमिलनाडु ने मेट्टूर बांध बनाया और दोनों राज्यों के बीच 50 साल के लिए एक समझौता हुआ। 1974 में जब समझौता खत्म हो गया तो कर्नाटक ने दावा किया कि इस समझौते की वजह से कावेरी बेसिन में खेती-बाड़ी से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ाने की उसकी क्षमता सीमित हो गई थी। इस दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए उसने जलाशय बनाना शुरू कर दिया। इससे दोनों राज्यों के बीच विवाद पैदा हो गया।
तमिलनाडु के जोर देने पर केंद्र सरकार ने 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन किया।
CWDT ने 2007 में क्या फैसला सुनाया?
ट्रिब्यूनल ने 17 साल की सुनवाई के बाद 5 फरवरी, 2007 को अपना आदेश सुनाया। इस्तेमाल के लिए उपलब्ध 740 TMC पानी में से 419 TMC तमिलनाडु को, 270 TMC कर्नाटक को, 30 TMC केरल को और 7 TMC पुडुचेरी को दिया गया। बाकी 14 TMC पानी पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सुरक्षित रखा गया।
आदेश में यह भी कहा गया है कि सामान्य मानसून वाले वर्षों (जून से मई) में कर्नाटक को तमिलनाडु के बिलिगुंडलू वॉटर स्टेशन पर 192 TMC पानी छोड़ना होगा। यह पानी इस तरह छोड़ा जाएगा: जून में 10 TMC, जुलाई में 34 TMC, अगस्त में 50 TMC, सितंबर में 40 TMC, अक्टूबर में 22 TMC, नवंबर में 15 TMC, दिसंबर में 8 TMC, जनवरी में 3 TMC और फरवरी से मई तक हर महीने 2.5 TMC।
ट्रिब्यूनल ने कहा, “अगर मुश्किल हालात वाले साल में पैदावार… कम होती है, तो केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और… पुडुचेरी के बीच आवंटित हिस्से को उसी अनुपात में कम कर दिया जाएगा।” कर्नाटक ने इस फैसले का विरोध किया और 312 TMC पानी की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। तमिलनाडु ने भी कावेरी नदी के पानी की अपनी मांग को लेकर ऐसा ही किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल द्वारा 2007 में तय किए गए 270 TMC पानी के हिस्से को बढ़ाकर कर्नाटक के लिए 284.75 TMC कर दिया। अब तमिलनाडु को ट्रिब्यूनल द्वारा तय किए गए 419 TMC के बजाय 404.25 TMC पानी मिलने लगा। लेकिन तमिलनाडु को 10 TMC भूजल निकालने की इजाजत देकर इसकी भरपाई भी की गई। दशकों पुराने इस विवाद में शामिल अन्य दो पक्षों केरल और पुडुचेरी के हिस्से में कोई बदलाव नहीं किया गया। उनका हिस्सा क्रमशः 30 TMC और 7 TMC ही बना रहा।
सर्वोच्च अदालत के फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अमिताव रॉय और जस्टिस एएम खानविलकर की पीठ ने जोर दिया कि कर्नाटक के “पीने के पानी की जरूरत” को “उच्च पायदान पर” रखना चाहिए।

मेकादातु बांध को लेकर क्या है विवाद?
मेकेदातु बांध प्रोजेक्ट रामनगरम जिले में है। यह बेंगलुरु से लगभग 100 किलोमीटर दक्षिण में उस जगह के पास है जहां कावेरी नदी तमिलनाडु में प्रवेश करती है। इस बांध की प्रस्तावित क्षमता 48 TMC (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) है और इसकी अनुमानित लागत 6,000 करोड़ रुपये है।
बताते चलें कि यह प्रस्तावित प्रोजेक्ट कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कई सालों से विवादों में रहा है। तमिलनाडु का कहना है कि नदी के ऊपरी हिस्से में पानी जमा करने की क्षमता बढ़ने से कर्नाटक सूखे के सालों में पानी के बहाव को इस तरह नियंत्रित कर सकता है जिससे निचले इलाकों में पानी छोड़ने पर बुरा असर पड़ सकता है।
विजय ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में कावेरी न्यायाधिकरण के फैसले के खंड 11 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि प्रस्तावित परियोजना को ” केवल एक इंजीनियरिंग प्रस्ताव के रूप में नहीं आंका जा सकता।”
खंड 11 में कहा गया है कि ” ऊपरी तटवर्ती राज्य निचले तटवर्ती राज्यों को निर्धारित जल आपूर्ति को प्रभावित करने वाला कोई भी कार्य नहीं करेगा। हालांकि, संबंधित राज्य आपसी सहमति से और नियामक प्राधिकरण से परामर्श करके जल आपूर्ति के पैटर्न में कोई भी संशोधन कर सकते हैं।”
हालांकि कर्नाटक का कहना है कि मेकेदातु का मकसद मुख्य रूप से बेंगलुरु को पीने का पानी सप्लाई करना, इलाके में ग्राउंडवाटर लेवल को बढ़ाना और पनबिजली पैदा करने के लिए एक बैलेंसिंग रिज़र्वॉयर बनाना है। उसका कहना है कि यह प्रोजेक्ट अतिरिक्त सिंचाई के लिए नहीं है, और इसलिए इससे ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय पानी के बंटवारे में कोई बदलाव नहीं होगा।
अभी क्या स्थिति है और क्यों बढ़ा है विवाद?
तमिलनाडु का कहना है कि 1 जून से 23 जुलाई के बीच उसे ट्रिब्यूनल के फैसले (जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित किया था) के तहत लगभग 32 TMC पानी मिलना चाहिए था। हालांकि उसे सिर्फ 3.5 TMC पानी ही मिला। दक्षिण-पश्चिम मानसून में कम बारिश और मुश्किल वाले साल में आनुपातिक कटौती को ध्यान में रखते हुए भी राज्य का मानना है कि कम से कम 3 TMC पानी और छोड़ा जाना चाहिए था। पानी की कमी या देर से पानी छोड़े जाने का कावेरी डेल्टा के किसानों पर बुरा असर पड़ेगा।
कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) ने 28 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में सूखे से प्रभावित कावेरी बेसिन की स्थिति की समीक्षा के लिए बैठक की। समिति ने कर्नाटक को निर्देश दिया है कि वह तमिलनाडु के लिए 15 दिनों तक हर दिन 3,500 क्यूसेक की दर से 4 TMC पानी छोड़े।
तमिलनाडु सरकार के अनुसार 29 जुलाई से 2 अगस्त के बीच बिलिगुंड्लु में पानी का बहाव सिर्फ 158 से 550 क्यूसेक के बीच रहा जो तय किए गए 3,500 क्यूसेक से बहुत कम है।

ऐसे में यह मामला एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा है। विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और यह मांग की कि कर्नाटक कावेरी ऑथारिटी के निर्देशों का पालन करे जिससे राज्य (तमिलनाडु) को जरूरी पानी का हिस्सा निर्बाध रूप से मिल सके।
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