रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गांधी को पत्र
प्रिय महात्माजी,
बिहार की भयानक त्रासदी ने मुझे भीतर तक दुखी किया है। हजारों मनुष्यों का जीवन एक क्षण में नष्ट हो गया।
ऐसे समय मनुष्य स्वाभाविक रूप से किसी नैतिक अर्थ की तलाश करता है, लेकिन मुझे आपकी वह व्याख्या गहरे असमंजस में डालती है जिसमें आपने इस आपदा को अस्पृश्यता के पाप का दैवी दंड कहा है।
अस्पृश्यता निस्संदेह हमारे समाज का एक कलंक है।
मैं स्वयं इसे मानवता के विरुद्ध अपराध मानता हूँ।
लेकिन प्रकृति की अंधी और विनाशकारी शक्तियों को किसी विशेष सामाजिक अपराध के प्रतिशोध के रूप में देखना मुझे उचित नहीं लगता।
यदि हम यह मान लें कि भूकंप ईश्वर का दंड है, तो क्या हमें यह भी मानना होगा कि जिन निर्दोष बच्चों, स्त्रियों और गरीब किसानों की मृत्यु हुई, वे किसी सामूहिक अपराध के भागीदार थे?
क्या पीड़ा को इस प्रकार नैतिक व्याख्या देना उन मृतकों के प्रति अन्याय नहीं होगा?
आपका प्रभाव इस देश में अत्यंत व्यापक है। आपके शब्द करोड़ों लोगों के लिए नैतिक सत्य का रूप ले लेते हैं।इसी कारण मैं मानता हूँ कि हमें ऐसी व्याख्याओं से सावधान रहना चाहिए जो अंधविश्वास को बल दे सकती हैं और मनुष्य की वैज्ञानिक चेतना को दुर्बल बना सकती हैं।
मनुष्य का नैतिक संघर्ष अपनी जगह है, और प्रकृति का रहस्य अपनी जगह। दोनों को एक-दूसरे में विलीन कर देना मुझे भयभीत करता है।
मैं यह सब किसी विवाद की भावना से नहीं, बल्कि उस सत्यनिष्ठा से लिख रहा हूँ जो हमारे लंबे संबंध का आधार रही है।
आपका,
रवीन्द्रनाथ ठाकुर
गांधी का उत्तर
प्रिय गुरुदेव,
आपका पत्र मिला।
आपकी स्पष्टवादिता और स्नेह के लिए मैं आभारी हूँ।
मैं विज्ञान की भाषा में नहीं बोल रहा था। मैं उस नैतिक अनुभूति की भाषा में बोल रहा था जो मेरे जीवन का आधार है।
मेरे लिए संसार केवल पदार्थों और घटनाओं का यांत्रिक क्रम नहीं है। मनुष्य के नैतिक कर्म और ब्रह्मांड की शक्तियों के बीच कोई गहरा संबंध है, मैं ऐसा अनुभव करता हूँ, भले ही उसे प्रमाणित न कर सकूँ।
मैं यह नहीं कह रहा कि बिहार के पीड़ित लोग व्यक्तिगत रूप से दोषी थे। लेकिन जब कोई समाज लंबे समय तक किसी अमानवीय पाप को सहन करता है, तो उसका परिणाम किसी न किसी रूप में प्रकट होता है।
‘अस्पृश्यता’ ऐसा ही पाप है।
यदि मेरी भाषा ने लोगों को अंधविश्वास की ओर धकेला हो तो मुझे खेद होगा। लेकिन अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को मैं अस्वीकार भी नहीं कर सकता।
हमारी आपसी असहमति मेरे लिए मूल्यवान है, क्योंकि वह शत्रुता से नहीं, सत्य की खोज से उत्पन्न हुई है।
आपका,
मोहनदास गांधी
(साभार / स्रोत
The Mahatma and the Poet
Gandhi Heritage Portal
The Marginalian – Tagore & Gandhi Letters)

