Home विचार-विमर्श खबरों से आगे: न नेशनल असेंबली में आवाज, न संसाधनों पर अधिकार;...

खबरों से आगे: न नेशनल असेंबली में आवाज, न संसाधनों पर अधिकार; ये है पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर की सच्चाई

कागजों पर पाकिस्तानी कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर क्षेत्र का अपना प्रधानमंत्री और एक राष्ट्रपति भी है। ऊपर से देखने पर ये शक्तिशाली पद प्रतीत होते हैं। हालांकि, ये नाम भ्रम, दिखावे और आडंबर से भरे हुए हैं क्योंकि क्षेत्र का असल नियंत्रण इस्लामाबाद स्थित कश्मीर मामलों के मंत्रालय के हाथ में है।

PoK
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन (फाइल फोटो- सोशल मीडिया)

भारत की ओर जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश (UT) की तरह, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर की भी एक विधान सभा है। पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर को वो ‘आजाद जम्मू-कश्मीर’ कहता है। लेकिन संघीय स्तर पर पाकिस्तान नेशनल असेंबली (भारत के लोक सभा की तरह प्रत्यक्ष चुनाव) और सीनेट (हमारी राज्य सभा की तरह अप्रत्यक्ष चुनाव) में उसका प्रतिनिधित्व शून्य है।

जी हाँ, यह सही है कि न इसकी नेशनल असेंबली में कोई सीट है और न ही सीनेट में। इस प्रकार पाकिस्तान की इन दो सर्वोच्च विधायी संस्थाओं में उसकी चर्चा नहीं होती। भारतीय पक्ष में, जम्मू-कश्मीर की लोकसभा में पाँच सीटें और राज्यसभा में चार सीटें हैं। जम्मू-कश्मीर के ये नौ प्रतिनिधि केंद्रीय स्तर की विधायी संस्थाओं में बैठते हैं और जम्मू-कश्मीर की आवश्यकताओं तथा उससे जुड़े सभी मुद्दों को उठाते हैं।

अभी वर्तमान में सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के लोकसभा में दो सांसद और राज्यसभा में तीन सांसद हैं। भाजपा के लोकसभा में दो सदस्य हैं, और उनमें से एक डॉ. जितेंद्र सिंह हैं, जो मई 2014 से प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में राज्य मंत्री हैं! जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे। यह दर्शाता है कि केंद्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व भारत में जम्मू-कश्मीर में शासन की संरचनात्मक व्यवस्था का हिस्सा है।

तथाकथित आजाद जम्मू-कश्मीर (एजेके) में ऐसा कोई प्रावधान मौजूद नहीं है। पीओजेके में संघीय विधायिकाओं (नेशनल असेंबली और सीनेट) में स्थानीय लोगों के लिए प्रतिनिधित्व नहीं होने का मतलब है कि वहाँ उनकी कोई आवाज नहीं है। यदि वे संघीय सरकार के साथ कोई मुद्दा उठाना चाहते हैं, तो पीओजेके के लोग ऐसा केवल नौकरशाहों से भरे कश्मीर मामलों के मंत्रालय के माध्यम से ऐसा कर सकते हैं। इस प्रकार संघीय विधायिका में कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं दोना सीधे-सीधे शक्तिहीन करने का एक साधन है।

पाकिस्तान का कब्जे वाले कश्मीर के साथ अजब रवैया!

यदि पीओजेके के साथ चार प्रांतों की तरह समान व्यवहार किया जाए, तो बजटीय आवंटनों के माध्यम से धन का स्वत संचय होगा। कुछ दिन पहले पाकिस्तान के वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने पाकिस्तान का बजट प्रस्तुत किया और उसमें पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के चार प्रांतों के लिए आवंटन थे। जबकि, पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान का उल्लेख तक नहीं था।

चारों प्रांतों को धन का आवंटन स्पष्ट रूप से परिभाषित सूत्रों के माध्यम से होता है। चारों प्रांतों को उनकी जनसंख्या, आवश्यकताओं और विशिष्ट विकास परियोजनाओं के अनुसार संघीय (केंद्रीय) निधियों से उचित हिस्सा मिलता है। पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान के मामले में ऐसा कुछ नहीं होता। संघीय सरकार अपनी इच्छा और मनमर्जी के अनुसार धन आवंटित करने के लिए स्वतंत्र है। ये आवंटन क्षेत्रों की विकास आवश्यकताओं के आधार पर नहीं होते।

भारत के जम्मू-कश्मीर से एकदम उलट POJK की स्थिति

जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में जम्मू और श्रीनगर में दो पूर्ण रूप से कार्यरत नागरिक हवाई अड्डे हैं, जबकि उधमपुर और अवंतीपोरा दो सैन्य हवाई अड्डे हैं। इसके विपरीत, पीओजेके क्षेत्र में कोई हवाई अड्डा नहीं है, न नागरिक और न ही सैन्य। इसके अलावा, भारत में जम्मू-कश्मीर के दूरदराज क्षेत्रों जैसे पुंछ, किश्तवाड़, गुरेज और कुछ अन्य दुर्गम स्थानों के लिए भी कठोर सर्दियों के दौरान हेलीकॉप्टर सेवाएँ उपलब्ध हैं। ये भारी सब्सिडी वाली सेवाएँ मुख्य रूप से आम नागरिकों की सुविधा के लिए हैं, जिनका उद्देश्य चिकित्सा आपात स्थितियों और अन्य आकस्मिकताओं का समाधान करना है। पीओजेके में ऐसी कोई सेवा मौजूद नहीं है।

चिकित्सा सुविधाओं की बात करें तो जम्मू-कश्मीर का ढाँचा दिन-प्रतिदिन बेहतर हो रहा है और आजादी के बाद से इसमें जबरदस्त प्रगति हुई है। आज यहां 15 मेडिकल कॉलेज और सरकारी क्षेत्र में चार टर्टियरी केयर हॉस्पिटल (अत्याधुनिक अस्पताल/सुपर स्पेशियलिटी) हैं। इसके अलावा आईआईटी, आईआईएम और दो केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। साथ ही कई अन्य विश्वविद्यालय भी हैं।

पीओजेके में स्वास्थ्य ढाँचा बहुत खराब है और लोगों को इलाज के लिए इस्लामाबाद या लाहौर जाना पड़ता है।

पाकिस्तान का दिखावा…सच्चाई कुछ और

कागजों पर, पीओजेके क्षेत्र का अपना प्रधानमंत्री और एक राष्ट्रपति भी है। ऊपर से देखने पर ये शक्तिशाली पद प्रतीत होते हैं। हालांकि, ये नाम भ्रम, दिखावे और आडंबर से भरे हुए हैं क्योंकि क्षेत्र का नियंत्रण इस्लामाबाद स्थित कश्मीर मामलों के मंत्रालय के हाथ में है! शक्ति का केंद्र पीओजेके की राजधानी मुजफ्फराबाद नहीं, बल्कि इस्लामाबाद है, और बहुत हद तक पाकिस्तान सेना के मुख्यालय रावलपिंडी में भी है।

न तो पीओजेके के प्रधानमंत्री और न ही राष्ट्रपति के पास कोई वास्तविक शक्ति है। वे अनुदानों के लिए इस्लामाबाद-रावलपिंडी की व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर हैं। वे अपने पदों पर केवल तब तक बने रहते हैं जब तक यह व्यवस्था उन्हें सहन करती है।

पीओजेके क्षेत्र का नियंत्रण पूरी तरह से संघीय सरकार, उसके नौकरशाहों और उसके चहेतों के हाथ में है। इस मंत्रालय में नौकरशाह वे लोग हैं जिन्हें संघीय सरकार चुनती है और उनके पास पीओजेके के तथाकथित प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से अधिक वास्तविक शक्तियाँ हैं!

वास्तव में, पीओजेके न तो स्वायत्त है और न ही पाकिस्तान में एकीकृत। यह बीच की एक निराशाजनक स्थिति है, जो न इधर है और न उधर। यदि यह एकीकृत होता, तो इसका शासन पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे चार प्रांतों की तरह होता। तब संघीय बजट के माध्यम से धन प्राप्त होना स्वतः हो जाता।

पीओजेके का बस इस्तेमाल करता पाकिस्तान!

पीओजेके में जलविद्युत उत्पादन को लेकर एक बहुत ही विचित्र स्थिति है। इसमें अपार क्षमता है और सबसे प्रारंभिक प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं में से एक मंगला में स्थापित की गई थी। इसने 1967 में व्यावसायिक स्तर पर बिजली उत्पादन शुरू किया था। आज 2026 में, पीओजेके अपनी आवश्यकता से कहीं अधिक जलविद्युत पैदा करता है। एक अनुमान के अनुसार, यह अपनी आवश्यकता से लगभग पाँच गुना अधिक बिजली पैदा करता है। इस प्रकार, यह पाकिस्तान का एक प्रमुख पावल सरप्लस क्षेत्र है।

अजीब जमीनी हकीकत यह है कि इसके बावजूद पीओजेके के लोगों को लंबे बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है। पीओजेके में उत्पन्न बिजली पहले अपने लोगों को नहीं, बल्कि राष्ट्रीय ग्रिड को दी जाती है! इसका मतलब है कि पीओजेके के लोगों को कुछ क्षेत्रों में 12 घंटे तक की बिजली कटौती झेलनी पड़ती है, जबकि वहीं उत्पादित बिजली पंजाब के घरों को रोशन करती है! या सिंध के।

पीओजेके में उत्पादित बिजली के लिए उसकी सरकार को प्रति यूनिट 15 पैसे जल उपयोग शुल्क मिलता है। जबकि चार प्रांतों को मिलने वाली जल उपयोग शुल्क की दर प्रति यूनिट एक रुपये से अधिक है। इस प्रकार उसके लोग बिजली के उचित हिस्से के साथ-साथ राजस्व के उचित हिस्से से भी वंचित हैं।

पाकिस्तान सरकार के हाथों यह शोषण ही पीओजेके में वर्तमान अशांति के लिए जिम्मेदार है। 5 जून से वहाँ दर्जनों लोग मारे जा चुके हैं और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में दर्जनों अन्य घायल हुए हैं। सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है और पाकिस्तानी बलों की कार्रवाई बिना रुके जारी है।

author avatar
सन्त कुमार शर्मा

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version