नई दिल्ली। पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण माना जाए या नहीं, इस पर चल रही बहस के बीच विदेश मंत्रालय ने अपना रुख स्पष्ट किया है। मंत्रालय ने कहा है कि भारतीय पासपोर्ट भारत सरकार द्वारा भारतीय नागरिकों को जारी किया जाने वाला एक आधिकारिक दस्तावेज है, जिसे पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत तय प्रक्रिया और विस्तृत सत्यापन (वेरिफिकेशन) के बाद जारी किया जाता है। इसका उद्देश्य भारतीय नागरिकों की विदेश यात्रा और भारत से प्रस्थान को विनियमित करना है।
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को नियमित प्रेस वार्ता में इस मुद्दे पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा कि “भारतीय पासपोर्ट, पासपोर्ट अधिनियम 1967 के अनुसार, भारत सरकार द्वारा भारत के नागरिकों को भारत से प्रस्थान को विनियमित करने के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है। इसे स्थापित प्रक्रिया के तहत आवश्यक सत्यापन के बाद जारी किया जाता है। पासपोर्ट जारी करने की पूरी प्रक्रिया पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और पासपोर्ट नियम, 1980 के तहत संचालित होती है।”
उन्होंने यह भी बताया कि फिलहाल भारत के 8 प्रतिशत से भी कम नागरिकों के पास पासपोर्ट है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
यह विवाद 24 जून को ‘पासपोर्ट सेवा दिवस’ के अवसर पर आयोजित विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग के बाद शुरू हुआ। उस दौरान मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से पूछा गया था कि क्या मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान पासपोर्ट को नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
इस पर अधिकारियों ने कहा था कि पासपोर्ट मूल रूप से एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का दस्तावेज नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि इसका उद्देश्य भारतीय नागरिकों को विदेशी देशों और बंदरगाहों के जरिए यात्रा करने की अनुमति देना है। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तेज बहस शुरू हो गई और कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने सरकार की आलोचना की।
विदेश मंत्रालय ने अपने ताजा बयान में सीधे तौर पर यह नहीं कहा कि पासपोर्ट “नागरिकता प्रमाण पत्र” है। मंत्रालय ने केवल इतना कहा कि पासपोर्ट भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है और इसके लिए विस्तृत सरकारी सत्यापन प्रक्रिया अपनाई जाती है।
यानी मंत्रालय ने अपने पहले के बयान से पीछे हटने के बजाय यह स्पष्ट किया कि पासपोर्ट जारी करने का आधार भारतीय नागरिक होना है, लेकिन उसका मुख्य कानूनी उद्देश्य विदेश यात्रा और भारत से प्रस्थान को विनियमित करना है।
सरकारी अधिकारियों ने इस विवाद के दौरान 2013 के बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया था। उस फैसले में कहा गया था कि पासपोर्ट अपने आप में नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 में एक प्रावधान ऐसा भी है, जिसके तहत सार्वजनिक हित में केंद्र सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को भी पासपोर्ट जारी कर सकती है, जो भारतीय नागरिक न हो। हालांकि, ऐसे मामले सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा नहीं होते और अपवाद माने जाते हैं।
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