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मुंबई में ‘इच्छामृत्यु’ के लिए BMC के पास पहुंचे 75 आवेदन, हरीश राणा केस के बाद बढ़ा रुझान

इन आवेदनों में लोगों ने स्पष्ट किया है कि अगर वे किसी लाइलाज बीमारी का शिकार हो जाएं या किसी हादसे के बाद कोमा जैसी स्थिति में पहुंच जाएं, जहां ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो उन्हें इच्छामृत्यु का विकल्प दिया जाए।

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euthanasia in Mumbai
बीएमसी को अब तक 75 लोगों ने ‘लिविंग विल’ के जरिए इच्छामृत्यु के आवेदन सौंपे हैं। फोटोः IANS

मुंबईः भारत के पहले अदालती मंजूर इच्छामृत्यु मामले के बाद मुंबई में गरिमामय मृत्यु के अधिकार को लेकर एक गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के पास अब तक 75 नागरिकों ने अपनी ‘लिविंग विल’ जमा की है।

इन आवेदनों के माध्यम से नागरिकों ने स्पष्ट किया है कि अगर वे भविष्य में किसी ऐसी लाइलाज बीमारी का शिकार होते हैं या हादसे के बाद ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (कोमा) में पहुँच जाते हैं, जहां सुधार की कोई गुंजाइश न हो, तो उन्हें कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों पर रखने के बजाय प्राकृतिक मृत्यु का विकल्प दिया जाए। इसके लिए आवेदकों ने कानूनी रूप से ‘लिविंग विल’ तैयार कर उसे नोटरी करवाया है और संबंधित अधिकारियों के पास जमा किया है।

इच्छामृत्यु: बीएमसी की भूमिका और कानूनी सीमाएं?

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मुंबई की मेयर रितु तावड़े ने इस संवेदनशील मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि बीएमसी वर्तमान में इन दस्तावेजों को केवल एक ‘कस्टोडियन’ के रूप में सुरक्षित रख रही है।

उन्होंने कहा, “कोर्ट के निर्देशानुसार हमने इन दस्तावेजों को रखने की व्यवस्था की है, लेकिन इच्छामृत्यु को लागू करने का अधिकार नगर निगम के पास नहीं है। यह जिम्मेदारी परिवार और मेडिकल बोर्ड की होती है। हम केवल इन वसीयतों को रिकॉर्ड के तौर पर सहेज रहे हैं।”

दरअसल सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारत में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) को कानूनी मान्यता दिए जाने के बाद प्रशासन ने प्रक्रिया को व्यवस्थित किया है। बीएमसी ने हर वार्ड में मेडिकल अधिकारियों को इन ‘लिविंग विल’ की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी है।

इसके तहत नागरिकों को अपना दस्तावेज नोटरी फॉर्मेट में तैयार कर वार्ड ऑफिस में जमा करना होता है। प्रक्रिया को और अधिक सरल बनाने के लिए राज्य सरकार अब एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल या ऐप विकसित करने पर भी विचार कर रही है।

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हरीश राणा केस: वह मामला जिसने रास्ता खोला

इस पूरे विमर्श के केंद्र में हरीश राणा का मामला है, जिन्हें भारत में कोर्ट की अनुमति से इच्छामृत्यु मिलने वाला पहला व्यक्ति माना जा रहा है। 31 वर्षीय राणा 2013 से कोमा में थे।

इंजीनियरिंग के छात्र रहे राणा चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर रूप से घायल हो गए थे। लंबे समय तक कोमा में रहने के बाद उनके माता-पिता ने जीवनरक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी। दिल्ली के एम्स में पेलिएटिव केयर के दौरान उनका निधन हुआ।

इस ऐतिहासिक फैसले ने ही देश में ‘लिविंग विल’ और गरिमामय मृत्यु के अधिकार के लिए कानूनी मार्ग प्रशस्त किया है।फिलहाल स्पष्ट विस्तृत दिशानिर्देशों की प्रतीक्षा में बीएमसी इन आवेदनों को सुरक्षित रख रही है, ताकि भविष्य में किसी भी चिकित्सा आपातकाल के दौरान व्यक्ति की अंतिम इच्छा का सम्मान किया जा सके।

समाचार एजेंसी आईएएनएस इनपुट के साथ

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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