मुंबईः बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार (22 अप्रैल) को 2006 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में चार आरोपियों को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने इन चार आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने वाले आदेश को रद्द कर दिया है।
जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस श्याम चांडक की पीठ ने आरोपियों द्वारा सितंबर 2025 में विशेष न्यायालय द्वारा उनके खिलाफ आरोप तय करने के आदेश के विरुद्ध दायर अपीलों पर यह आदेश सुनाया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने चार आरोपियों के खिलाफ बंद किया मामला
अपील में निचली अदालत द्वारा आरोप तय करने के तरीके और मामले में कई सह-आरोपियों को बरी करने पर भी सवाल उठाए गए थे। ऐसे में हाई कोर्ट के आज के फैसले से आरोपी राजेंद्र चौधरी, धन सिंह, मनोहर राम सिंह नरवारिया और लोकेश शर्मा के खिलाफ मामला बंद कर दिया गया और उनके खिलाफ चल रहे मुकदमे का अंत हो गया।
इससे पहले पीठ ने अपील दाखिल करने में हुई 49 दिन की देरी को माफ कर दिया था। यह देखते हुए कि चुनौती राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम (NIA Act) की धारा-21 के तहत एक वैधानिक अपील थी।
जनवरी 2026 के उसी आदेश में अदालत ने यह दर्ज किया था कि प्रथम दृष्टया हस्तक्षेप का मामला बनता है और अपील के परिणाम आने तक निचली अदालत के समक्ष आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। 22 अप्रैल के आदेश में अदालत ने अपील स्वीकार कर ली और चारों अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया।
2006 में हुआ था मालेगांव विस्फोट
मालेगांव मामला 8 सितंबर, 2006 में हुआ था। जब बिजली उत्पादन केंद्रों वाले इस शहर में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और अन्य कानूनों के तहत मामला दर्ज किया गया था।
इस मामले की पहली जांच महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (ATS) ने की जिसने 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया और दिसंबर 2006 में आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद फरवरी 2007 में जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई और बाद में एनआईए ने इसे अपने हाथ में ले लिया। इसने आगे की जांच के बाद चार अपीलकर्ताओं को अन्य आरोपियों के साथ शामिल किया और एक नया आरोपपत्र दायर किया।
हाई कोर्ट में अपीलकर्ताओं के वकील ने दो मुख्य तर्क प्रस्तुत किए। पहला यह कि एनआईए घटना के प्रत्यक्षदर्शी का कोई भी गवाह पेश करने में विफल रही और दूसरा, कि अन्य आरोपितों को बरी करना स्पष्ट रूप से अवैध था।
वकील ने यह भी बताया कि इन बरी करने के आदेशों को चुनौती देने वाली अलग-अलग आपराधिक अपीलें वर्तमान में लंबित हैं।

