मजरूह सुल्तापुरी का एक शेर है –
‘हमारे बाद अब महफिल में अफसाने बयां होंगे,
बहारे हम को ढूंढेंगी न जाने हम कहां होंगे।’
इस शेर की याद तब अनायास आ गई जब पिछले दिनों इंडिया इस्लामिक सेटर में ख्वाजा अहमद अब्बास (1914- 1987) पर केंद्रित दास्तानगोई देखी। इसका आयोजन किया ख्वाजा अहमद अब्बास मेमोरियल ट्र्स्ट ने जो संस्कृतिकर्मी और विदुषी सईदा हामिद की परिकल्पना है। इस दास्तानगोई को लिखा सिब्तेन शाहिदी ने जो एक मशहूर लेखक हैं। इसमें दो दास्तानगो थे – राणा और राजेश। दोनों चर्चित फनकार हैं। ये प्रस्तुति महमूद फारूकी के निर्देशन में तैयार हुई। एक प्रभावशाली दास्तान जिसने कई यादें ताजा दीं और कई मसले उठा दिए। दर्शकों को कई भूली बिसरी कहानियां याद आ गई। साथ ही कई अनजाने किस्से भी सुने।
पर कौन थे ख्वाजा अहमद अब्बास? अपने जमाने के नामी शख्सियत जिनकी एक प्रगतिशील विचारधारा थी, जिन्होने फिल्मी दुनिया में काफी नाम कमाया। बतौर पत्रकार भी जाने और सराहे गए। उन्होंने तब के मशहूर अखबार `बांबे क्रोनिकल’ में फिल्मों की समीक्षा लिखने से सफर शुरू किया और फिर आगे चलकर फिल्में भी बनाई। उन्होंने कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। कइयों की पटकथाएं लिखीं। वे लबें समय तक राजकपूर के सहयोगी भी रहे और उनके लिए `श्री 420’, `आवारा’, `मेरा नाम जोकर’ से लेकर `बॉबी’ जैसी फिल्मों की कहानियां लिखीं।
आर के करंजिया के `ब्लिट्ज’ साप्ताहिक के लिए वे लगातार स्तंभ लिखते रहे। वे एक बहुमुखी प्रतिभा वाले शख्स थे। उन्होंने ऐसी कहानियां भी लिखीं जो विश्व साहित्य में याद की जाती हैं। कई पुस्तकें लिखीं। उनकी `अबाबील’ कहानी तो दुनिया की कई भाषाओं में अनूदित हुई है।
लेकिन इस मुकाम पर वे कैसे पहुंचे? क्या उनका रास्ता आसान था? उनकी जाती जिंदगी कैसी थी? उनकी विचारधारा क्या थी? ये और ऐसे कई सवालों के जवाब इस दास्तानगोई में मिले। सिब्तेन शाहिदी ने अब्बास साहब की जिंदगी के विस्तृत फलक को उद्घाटित करते हुए उस समय के कशमकश को भी सामने रखा जिससे तब का भारत गुजर रहा था और प्राचीन भारतीय संस्कृति को एक आधुनिक और प्रगतिशील मिजाज देने की कोशिश कर रहा था।
पानीपत में जन्में और अलीगढ़ विश्वविद्यालय से पढ़े अब्बास साहब अपने रोजमर्रा के जीवन में घोर नाटकीय व्यक्ति थे। खासकर अपने युवावस्था के दिनों में। आज की भाषा में कहें तो कई तरह के प्रैक्टिकल जोक्स भी करते थे। दोनो दास्तानगो ने बड़े ड्रामाई अंदाज में बताया कि ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी छात्रावस्था के आरंभिक दिनों में एक कल्पित नारीपात्र जहांनारा के नाम से अखबारों में पत्र लिखे कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लड़कियों के लिए कोई कॉलेज नहीं है और लड़कियां अगर उच्चशिक्षा नहीं पाती हैं, तो फिर समाज कैसे आगे बढ़ेगा? तब के शहर में मुददा गरमाने लगा। तब अलीगढ़ में लड़कियां स्कूल में तो पढ़ती थीं लेकिन उसके बाद उनकी शिक्षा रूक जाती थी।
अब्बास ने कुछेक अंग्रेज अखबारों के `संपादक के नाम पत्र’ स्तंभ मे ये मसला उठाया तो वहां के बौद्धिक हलके में ये सवाल भी उठने लगा कि ये जहांनारा कौन है? अब्बास अग्रेजी में ये खत लिखते थे। तब के एक अंग्रेजी अखबार `पॉयोनियर’ के संपादक को कुछ शक हुआ। इसलिए कि खत नफीस अंग्रेजी में थे। शक का कारण ये था कि जिस मुसलिम समाज में स्त्री-शिक्षा की कमी की बात की जा रही है, उसमें इतनी अच्छी अंग्रेजी लिखने वाली लड़की कहां से आ गई? संपादक ने उस पते पर, जिससे खत भेजा गया था, पत्र `लेखिका’ को लिखा कि जरा अपना फोटो भेजो ताकि पता चल सके कि लिखने वाली सच में कोई लड़की ही है। अब अब्बास के सामने समस्या थी कि क्या किया जाए? फिर अपने एक दोस्त की गर्लफ्रेंड की तस्वीर जुगाड़ की। उसमें लड़की स्कूली ड्रेस में थी। अब्बास ने उस फोटो पर कलम से कुछ नक्कासीनुमा किया और लड़की को साड़ी में दिखाया। फिर उस फोटो को चार टुकड़ों में काटा, उन टुकड़ों को फिर से जोड़ा और अपने कैमरे से उसका फोटो लिया। इसलिए कि लड़की का चेहरा कुछ बदल जाए और उसकी वास्तविक पहचान सामने न आए क्योंकि ऐसा हुआ तो एक दूसरा बवाल हो जाएगा। फिर ये भी पता लगा लिया कि वो लड़की (तब के) कलकत्ता में रहती है जहां `पॉयोनियर’ नहीं जाता था। यानी यह उस बात की तस्दीक थी कि लड़की या उसके परिवार को यह सच्चाई कभी मालूम नहीं हो सकेगी। ये सब पक्का कर चुकने के बाद अब्बास ने संपादक को लौटती डाक से फोटो भेजते हुए जवाब दे दिया – `मैं हूं जहांनारा’।
आगे चलकर अलीगढ़ में स्नातक स्तर पर लड़कियों की पढ़ाई शुरू हो गई थी। यहीं से रशीद जहां और इस्मत चुगतई जैसी लेखिकाएं भी आईं। दरअसल लेखिका तो वे बाद में हुईं पर उससे पहले वे यहां की विधार्थी हुईं। खैर जो भी हो इसी बहाने मुसलिम लड़कियों के लिए शिक्षा के द्वार तो खुल ही गए। हो सकता है कि इस द्वार के खुलने में अब्बास के इन पत्रों की सीमित ही भूमिका रही हो औऱ दूसरे कारण भी रहे हों। पर इतना होना भी क्या कम है? वैसे यहां ये भी बता देना जरूरी है कि ल़ड़कियों के लिए स्नातक स्तर पर पढ़ाई की शुरुआत के लिए जिस आर्थिक संसाधन की जरूरत थी, वो वहां के स्थानीय व्यवसायी शेख अब्दुल्ला ने मुहैया करवाए। उनकी बेटी भी वहां पढ़ने आई, जो आगे चलकर फिल्मों में काम करने गई और रेणुका देवी के नाम से उन्होंने कुछ भूमिकाएं भी निभाई।
इसी कड़ी में एक और वाकये को भी यहां बताना जरूरी है जिससे अब्बास के स्वाधीनता प्रेम और फितूर व्यक्तित्व का पता चलता है। तब भगत सिंह को फांसी दी गई थी जिसे लेकर देश के हर तबके में आक्रोश था। नौजवानों में खासकर के। अब्बास तब भी अलीगढ़ में पढाई कर रहे थे। उन्होंने और कुछ मित्रों ने तय किया कि विश्वविद्लाय परिसर में क्वीन विक्टोरिया की जो तस्वीर लगी है, उसे उतार फेंका जाए। दास्तानगोई में बताया गया कि कैसे कि अब्बास सीढ़ी लगाकर छिपते हुए उस जगह पर पहुंचे जहां क्वीन विक्टोरियां फ्रेम में मुस्कुरा रही थीं, तस्वीर को उतारा, उसे क्षत-विक्षत किया और जाकर विश्वविद्यालय के अधिकारियों के दफ्तर के सामने रख दिया। बवाल मचा लेकिन कोई जान न पाया कि ऐसा आखिर किसने किया।
ऐसे फितरती फितूरी थे अब्बास अपनी जवानी के दिनों में।
अब्बास का पंडित जवाहर लाल नेहरू से पहली बार मिलना भी एक ड्रामा की तरह ही था। आजादी के पहले की बात है। अलीगढ़ में अब्बास की पढाई के दौरान की ही। पंडित नेहरू ट्रेन से जा रहे थे और खुर्जा स्टेशन पर अब्बास और उनके साथी उस पर सवार हो उनसे बात करने लगे। उनलोगों के बीच कई तरह की बातें हुई जिनमें सबसे अहम ये थी कि नेहरू ने उनसे कहा- ‘सबसे सवाल करो, अपने आप से भी और दूसरों से भी।’ अब्बास के अनुरोध पर पंडित नेहरू वे एक कागज पर उन्हें लिख कर दिया – `लिव डेंजरसली’।
ख्वाजा अहमद अब्बास ने पूरी दुनिया की सैर की। इस प्रक्रिया में जाना कि कहाँ क्या हो रहा है और दुनिया में कैसी तब्दीलियाँ आ रही हैं। इससे उनके भीतर वह विश्वबोध निर्मित हुआ जो जमाने की माँग थी। यही दृष्टि उनकी फिल्मों में भी दिखाई देती है। वे उन फिल्मकारों में थे जो सिनेमा को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं मानते थे, बल्कि उसे सामाजिक हस्तक्षेप का औजार भी समझते थे।
फिल्मी दुनिया में उनकी पहचान केवल राज कपूर के सहयोगी या सफल पटकथा-लेखक भर की नहीं थी। उनमें नए लोगों को अवसर देने का साहस भी उनमें था। इसका सबसे चर्चित उदाहरण अमिताभ बच्चन हैं। जब उन्होंने अपनी फिल्म सात हिंदुस्तानी के लिए कलाकारों का चयन किया तो एक लंबे, दुबले-पतले युवक को भी चुना, जिसकी आवाज़ तक को उस समय कई लोग फिल्मी परदे के लिए अनुपयुक्त मानते थे। वह युवक आगे चलकर अमिताभ बच्चन के नाम से भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सितारा बना। अब्बास ने बाद में लिखा भी कि उनमें प्रतिभा तो दिखी थी, लेकिन शायद यह अनुमान उन्हें भी नहीं था कि यह नौजवान एक दिन इतनी बड़ी सांस्कृतिक घटना बन जाएगा।

अब्बास की हर पसंद या भविष्यवाणी सही ही साबित हुई हो, ऐसा भी नहीं था। दास्तानगोई में सुनाया गया एक दिलचस्प किस्सा इसका प्रमाण है। अपने मुंबई के शुरुआती दिनों में वे चेतन आनंद, बलराज साहनी और देवानंद जैसे युवाओं के बीच उठते-बैठते थे। तब बलराज साहनी मज़ाक में देवानंद से कहा करते थे- “तू कभी अभिनेता नहीं बन पाएगा।” इतिहास ने साबित किया कि यह आकलन गलत था। देवानंद न केवल अभिनेता बने बल्कि हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय सितारों में गिने गए। यह प्रसंग याद दिलाता है कि प्रतिभा को पहचानने वाले लोग भी हमेशा भविष्य को पूरी तरह नहीं पढ़ पाते। शायद यही मानवीयता उन्हें और दिलचस्प बनाती है।
उनकी जिंदगी में ऐसे लम्हे भी आए जब उनकी भावनाओं हताहत हुईं। मानसिक सदमें लगे। फिर भी उनकी वैचारिक आस्था बरकरार रही। सबसे बड़ी चोट तो तब लगी जब भारत की आजादी के समय जो दंगे हुए उनमें उनके पानीपत वाले आवास को जला दिया गया, उनकी मां को किसी तरह बचाया गया। परिवार को और भी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन अब्बास अपनी निष्ठा से डिगे नहीं। तब वे मुंबई में थे। इप्टा (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) में सक्रिय़ थे। प़ृथ्वीराज कपूर भी इप्टा में थे। उनके नेतृत्व ने इप्टा, उससे जुड़े कलाकारों और दूसरे लोगों ने सांप्रदायिता के खिलाफ गाते बजाते हुए एक लंबा जुलूस निकाला। अब्बास उसमें अग्रिम पंक्ति में थे। उनका घर जला मगर भारत के लिए उनका प्रेम नहीं बदला। आजादी के बाद मृत्युपर्यंत वे उस भारत के वैचारिक निर्माण में लगे रहे जिसका सपना भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों ने देखा था।
यह दास्तान खत्म हुई तो लगा कि यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं थी। यह उस पीढ़ी की कहानी थी जिसने आजादी का सपना देखा, उसके लिए संघर्ष किया और फिर कला, साहित्य, पत्रकारिता और सिनेमा के माध्यम से उस सपने को आकार देने की कोशिश की। ख्वाजा अहमद अब्बास उसी पीढ़ी के प्रतिनिधि थे। आज जब सार्वजनिक जीवन में सपनों की जगह संदेह और विभाजन अधिक दिखाई देता है, तब अब्बास की याद केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को याद करना भी है जिन पर आधुनिक भारत की नींव रखी गई थी।
अब्बास अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन जैसा कि मजरूह ने लिखा है उनके अफसाने हमारे बीच अब भी मौजूद है। और इनमें वो सपने भी मौजूद है जो अब्बास के थे लेकिन सिर्फ उनके भर नहीं थे। उस पीढ़ी के भी थे जो भारत की आजादी के लिए लड़ रही थी और फिर स्वतंत्रता मिलने के बाद वो सांस्कृतिक दुनिया बना रही थी जिसमें हर भारतीय विश्वनागरिक बन रहा था, अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान बना रहा था। अब्बास की जीवनी लिखी जानी चाहिए जिससे आज की पीढ़ी को पता चले और भविष्य की पीढ़ियों को याद रहे कि किन स्वप्नों के साथ भारत आजाद हुआ था।
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