हर वर्ष मई-जून आते ही हिन्दी पट्टी और महानगरों में बाल रंगमंच कार्यशालाओं की बाढ़ आ जाती है। अखबारों, सोशल मीडिया और सांस्कृतिक संस्थाओं के विज्ञापनों में बच्चों के ‘व्यक्तित्व विकास’, ‘आत्मविश्वास’, ‘क्रिएटिविटी’ और ‘कम्युनिकेशन स्किल’ को विकसित करने के बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं। अभिभावक उत्साहित होते हैं। वे अपने बच्चों को रंगमंच से जोड़ना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि यह माध्यम बच्चों को मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल व्यसनों की गिरफ्त से बाहर निकालने में मदद करेगा।
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में हमारे यहाँ बाल रंगमंच को उसी गंभीरता, संवेदनशीलता और बौद्धिक तैयारी के साथ लिया जाता है, जिसकी वह माँग करता है?
कटु सत्य यह है कि हिन्दी में बाल रंगमंच आज भी गहरे अज्ञान, अव्यवस्था, अवसरवाद और सांस्कृतिक दूकानदारी का शिकार है। बच्चों के नाम पर चल रही अधिकांश गतिविधियाँ न तो बाल-मनोविज्ञान को समझती हैं, न शिक्षा को, न रंगमंच को और न ही बच्चे को। वे केवल “वर्कशॉप” आयोजित करना जानती हैं। बच्चों को समझने की जगह उन्हें ‘प्रोडक्ट’ की तरह प्रस्तुत करने की मानसिकता तेजी से बढ़ी है।
बच्चे उपभोक्ता नहीं, संवेदनशील मनुष्य हैं
हम जिस समय में जी रहे हैं, वह बच्चों के लिये अत्यंत जटिल और खतरनाक समय है। मोबाइल फोन, इंटरनेट, वीडियो गेम, यूट्यूब, ओटीटी और सोशल मीडिया ने बच्चों की दुनिया को असम्पादित सूचनाओं, कृत्रिम उत्तेजनाओं और बाज़ारू मनोरंजन से भर दिया है। बचपन तेजी से सिकुड़ रहा है। संवेदनाएँ कृत्रिम हो रही हैं। कल्पनाशक्ति कम हो रही है। एकाग्रता टूट रही है। हिंसा और आक्रामकता सामान्य व्यवहार का हिस्सा बनती जा रही हैं।
आज परिवार की संरचनाएँ बदल चुकी हैं। संवाद कम हुआ है। माता-पिता के पास समय नहीं है। शिक्षा प्रणाली प्रतिस्पर्धा और परीक्षा के बोझ तले दब चुकी है। स्कूल बच्चों को मनुष्य नहीं, ‘परफॉर्मर’ और ‘अचीवर’ बनाने में व्यस्त हैं। ऐसे समय में बच्चे भावनात्मक और मानसिक स्तर पर गहरे अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। यहीं बाल रंगमंच की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
बाल रंगमंच क्यों जरूरी है?
बाल रंगमंच केवल अभिनय सिखाने का माध्यम नहीं है। उसका उद्देश्य ‘छोटे कलाकार’ तैयार करना भी नहीं है। वास्तव में बाल रंगमंच बच्चों के भीतर संवेदना, कल्पनाशक्ति, सामूहिकता, संवाद और अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करने की प्रक्रिया है।
रंगमंच बच्चों को सुनना सिखाता है। दूसरों के साथ काम करना सिखाता है। असहमति के साथ जीना सिखाता है। अनुशासन और समयबद्धता सिखाता है। सही और गलत के बीच विवेक पैदा करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि रंगमंच बच्चे को आत्मविश्वास देता है और उसे एक स्वतंत्र, जिज्ञासु और संवेदनशील मनुष्य के रूप में विकसित होने में मदद करता है।
किसी लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद ऐसे ही गुणों पर टिकी होती है। आज हमारे सामाजिक जीवन में इन्हीं गुणों का सबसे अधिक अकाल दिखाई देता है। इस अर्थ में बाल रंगमंच केवल सांस्कृतिक गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक हस्तक्षेप भी है।
लेकिन विडम्बना देखिये कि जिस माध्यम में बच्चों के भीतर मनुष्यता और लोकतांत्रिक चेतना के बीज बोने की क्षमता है, उसी को हमारे यहाँ ग्रीष्मकालीन मनोरंजन और प्रमाणपत्र बाँटने की गतिविधि में बदल दिया गया है।
सबसे बड़ी समस्या : वयस्क केन्द्रित दृष्टिकोण
हमारे यहाँ बाल रंगमंच को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसे वयस्क रंगमंच की मानसिकता से देखा जाता है। यह मान लिया गया है कि जो व्यक्ति थोड़ा-बहुत अभिनय या निर्देशन जानता है, वह बच्चों को भी रंगमंच सिखा सकता है। यहीं से त्रासदी शुरू होती है।
बच्चों के साथ काम करना वयस्कों के साथ काम करने से बिल्कुल भिन्न प्रक्रिया है। उसमें शिक्षा, बाल-मनोविज्ञान, व्यवहार, संवेदनशीलता, धैर्य और बाल अधिकारों की समझ अनिवार्य है। बच्चे आदेश से नहीं, विश्वास से सीखते हैं। वे प्रदर्शन की वस्तु नहीं हैं। वे अपने भीतर एक स्वतंत्र सृजनात्मक संसार लेकर आते हैं।
लेकिन हमारे यहाँ अधिकांश प्रशिक्षक बच्चों को ‘मैनेज’ करने की वस्तु की तरह देखते हैं। उन्हें चिल्लाकर नियंत्रित किया जाता है। संवाद रटवाये जाते हैं। मंच पर दौड़ाया जाता है। प्रशिक्षक की अधकचरी महत्वाकांक्षाओं को बच्चों पर लाद दिया जाता है।

यदि प्रशिक्षक बच्चे की दुनिया को समझने में असफल रहता है, तो रंगमंच बच्चों के लिये आनंद और विकास का माध्यम बनने के बजाय भय, दबाव, अपमान और ऊब का कारण बन जाता है।
ग्रीष्मकालीन कार्यशालाएँ : प्रशिक्षण या तमाशा?
हर साल गर्मियों में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएँ बड़ी संख्या में बाल रंगमंच कार्यशालाएँ आयोजित करती हैं। दिल्ली की साहित्य कला परिषद, हिन्दी अकादमी, उर्दू अकादमी जैसी संस्थाएँ वर्षों से यह काम कर रही हैं। लेकिन गंभीर प्रश्न यह है कि इन कार्यशालाओं का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
क्या इनके पास कोई दीर्घकालिक दृष्टि है? क्या इनके पास बाल रंगमंच की कोई शैक्षिक रूपरेखा है? क्या प्रशिक्षकों के चयन के लिये कोई स्पष्ट मानदंड है? क्या बच्चों की सुरक्षा और मानसिक गरिमा को लेकर कोई नीति है? अधिकांश मामलों में उत्तर है- नहीं।
सच तो यह है कि इनमें से कई कार्यशालाएँ केवल बजट खर्च करने और सांस्कृतिक उपस्थिति दर्ज कराने की औपचारिकता बनकर रह गयी हैं। बच्चों को कुछ दिनों तक व्यस्त रखा गया, अंत में एक प्रस्तुति करा दी गयी, कुछ तस्वीरें और प्रमाणपत्र बाँट दिये गये और कार्यक्रम समाप्त। यह बाल रंगमंच नहीं, बाल रंगमंच की नौटंकी है।
स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब बच्चों को ऐसे लोगों के हवाले कर दिया जाता है जिन्हें न रंगमंच की गहरी समझ है, न बच्चों की। हिन्दी क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसे लोग बाल रंगमंच प्रशिक्षक बने हुए हैं जो स्वयं बुनियादी रंग प्रशिक्षण से वंचित हैं। वे बच्चों पर वही तकनीकें थोपते हैं जो वयस्क अभिनेताओं पर लागू होती हैं।
मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है कि कई स्थानों पर बच्चों को प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया अपमानजनक और हिंसक तक हो जाती है। बच्चों की असफलता पर डाँटना, तुलना करना, सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना, उनकी भावनाओं का मज़ाक उड़ाना- ये सब सामान्य व्यवहार बन चुके हैं। परिणाम यह होता है कि बच्चों के भीतर रंगमंच के प्रति रुचि विकसित होने से पहले ही मर जाती है।
विशेषज्ञता की सुनियोजित उपेक्षा
विडम्बना यह है कि जिन्होंने अपना पूरा जीवन बाल रंगमंच को समर्पित किया, उन्हें ही संस्थागत प्रक्रियाओं से बाहर रखा जाता रहा है।
दिल्ली में समर चटर्जी, शांता गांधी, ब.व. कारंत, रेखा जैन, वी.के. शर्मा, बैरी जॉन, अब्दुल लतीफ़ खटाना और अरविन्द गौड़ जैसे रंगकर्मियों ने बाल रंगमंच को गंभीर वैचारिक और व्यावहारिक आधार दिया। विशेष रूप से रेखा जैन और वी.के. शर्मा ने दशकों तक बच्चों के साथ काम करते हुए यह सिद्ध किया कि बाल रंगमंच एक स्वतंत्र अनुशासन है।
लेकिन सरकारी संस्थाओं की सलाहकार समितियों और चयन प्रक्रियाओं में ऐसे विशेषज्ञों की उपेक्षा लगातार होती रही है। कारण स्पष्ट है- विशेषज्ञता जवाबदेही माँगती है और जवाबदेही सांस्कृतिक दूकानदारी के लिये सबसे बड़ा खतरा है।
सरकारी संस्थानों को ऐसे लोग अधिक प्रिय होते हैं जो ‘हाँ सर’, ‘जी सर’ करते हुए हर साल औपचारिक कार्यशालाएँ निपटाते रहें और कभी कोई गंभीर सवाल न उठायें।
एनएसडी और टीआईई की सीमित लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की थियेटर इन एजुकेशन कंपनी (TIE) ने सीमित संसाधनों के बावजूद बाल रंगमंच और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। उसने यह समझ विकसित करने की कोशिश की कि रंगमंच बच्चों के व्यक्तित्व, शिक्षा और सामाजिक विकास से कैसे जुड़ सकता है।
लेकिन विडम्बना यह है कि स्वयं संस्थागत ढाँचे की सीमाओं के कारण यह पहल व्यापक स्तर पर विस्तार नहीं पा सकी। भारत जैसे विशाल देश में बाल रंगमंच के लिये स्वतंत्र शोध, प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम निर्माण की आवश्यकता थी, जो आज तक नहीं हो पाया।
बाल रंगमंच बनाम सांस्कृतिक कारोबार
आज बाल रंगमंच का बड़ा हिस्सा ‘पर्सनैलिटी डेवलपमेंट’ उद्योग में बदलता जा रहा है। अभिभावकों की चिंताओं और आकांक्षाओं को बाज़ार में बदल दिया गया है। रंगमंच को एक ‘स्किल पैकेज’ बनाकर बेचा जा रहा है। यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे रंगमंच का मानवीय, सामाजिक और सृजनात्मक पक्ष नष्ट हो जाता है। बच्चे को एक संवेदनशील मनुष्य नहीं, बल्कि ‘परफॉर्मर’ में बदलने की कोशिश शुरू हो जाती है।
सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि बाल रंगमंच कोई हल्की या गौण गतिविधि नहीं है। इसके लिये स्पष्ट मानदंड बनने चाहिए। प्रशिक्षकों की न्यूनतम योग्यता तय हो। बाल-मनोविज्ञान और शिक्षा की समझ अनिवार्य हो। बच्चों की सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने की ठोस व्यवस्था हो।
सरकारी संस्थाओं को केवल खानापूर्ति और बजट खर्च करने की मानसिकता से बाहर आना होगा। बाल रंगमंच को ग्रीष्मकालीन तमाशे के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सांस्कृतिक-शैक्षिक प्रक्रिया के रूप में देखना होगा।
बच्चे किसी भी समाज का भविष्य होते हैं- यह वाक्य हम बार-बार दोहराते हैं। लेकिन यदि सचमुच ऐसा मानते हैं, तो हमें उनके साथ होने वाले इस सांस्कृतिक छल को भी पहचानना होगा।
बाल रंगमंच बच्चों के भीतर मनुष्य को बचाने और उसे मूल्यसम्पन्न बनाने की कला है। उसे अयोग्यता, अवसरवाद और सांस्कृतिक व्यापार का शिकार नहीं बनने दिया जा सकता।
आज आवश्यकता केवल कार्यशालाओं की नहीं, चेतना की है। यदि इस दिशा में कोई गंभीर और सुचिंतित प्रयास हुआ होता, तो शायद आज हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में संवेदनाओं का इतना भयावह अकाल दिखाई नहीं देता।
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