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दृश्यम: ‘द राइट टू बी’- अस्तित्व, देह और मुक्ति के बीच फँसा मनुष्य

सिनेमा जब सचमुच अपने सबसे प्रभावी रूप में होता है, तब वह केवल कहानी नहीं कहता, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रही अदृश्य हलचलों को दृश्य में बदल देता है। ‘ द राइट टू बी’ ऐसी ही एक संवेदनशील फिल्म है, जो बहुत कम संवादों और अत्यंत सघन दृश्यों के माध्यम से पहचान, अस्तित्व और आत्मस्वीकृति की जटिल यात्रा को सामने लाती है। सार्थक आर दासगुप्ता निर्देशित और ध्रुव कपिला’ के प्रभावशाली अभिनय से सजी यह फिल्म केवल एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस समाज का आईना बन जाती है; जहाँ हर व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में अपनी पहचान साबित करने की लड़ाई लड़ रहा है।

कुछ फिल्में कहानी से अधिक अपने वातावरण से याद रह जाती हैं। वे संवादों से नहीं, दृश्यों, ध्वनियों और ख़ामोशियों से अपना अर्थ रचती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है ‘द राइट टू बी’, जो ट्रांसजेंडर अनुभव को केवल पहचान की राजनीति की तरह नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मस्वीकृति और मुक्ति की गहरी आंतरिक यात्रा की तरह प्रस्तुत करती है। 

कुंभ मेले की विराट पृष्ठभूमि में यह फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी कहती है, जो समाज द्वारा दी गई पहचान से बाहर निकलकर अपने भीतर की आवाज़ तक पहुँचना चाहता है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह बहुत कम संवादों में दृश्य और ध्वनि के सहारे अपने पात्र की बेचैनी, असमंजस और अंततः उसकी मुक्ति को आकार देती है।

सिनेमा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। जिस फिल्म में संवाद दृश्य पर हावी हो जाएँ, वह फिल्म कमज़ोर है। एक अच्छी फिल्म की पहचान है कि दृश्य संवाद पर ग़ालिब हों। एक दृश्य से शुरू होती है और इसका अंत भी दृश्य पर ही होता है।

फिल्म की शुरुआत कुंभ मेले के दृश्य से होती है। अभी मेला पूरी तरह शुरू भी नहीं हुआ, लेकिन लोगों की भीड़ जमा होने लगी है। उसी भीड़ में एक व्यक्ति अकेला, ख़ामोश और भीतर से विचलित-सा घूम रहा है। कैमरा उसके चेहरे पर बहुत देर तक ठहरता है। उसकी आँखों में एक तलाश है। ऐसा लगता है जैसे वह केवल मेले में नहीं आया, बल्कि अपने भीतर किसी अनकहे प्रश्न का उत्तर खोजने आया है।

फिल्म की लोकेशन कुंभ मेले की है। मेला शुरू होने से पहले ही वहाँ लोगों की कतार लगी हुई है। उसी भीड़ में एक व्यक्ति बिल्कुल ख़ामोश इधर-उधर घूम रहा है। उसके अंदर एक यात्रा चल रही है। वह कुछ तलाश रहा है। उसका चेहरा, उसकी आँखें साफ़ यही कह रही हैं। वह बहुत सूक्ष्म अवलोकन कर रहा है। वह नदी के पुल पर खड़ा होकर पानी को देखता है। वह पानी की ध्वनि को महसूस कर रहा है। वह पानी के भीतर छोटी से छोटी आती-जाती बहती चीज़ों को ग़ौर से देख रहा है, सुन रहा है। वह नाव को देख रहा है। विशालकाय जल में छोटी-छोटी नाव का भी अस्तित्व है। वे ऊँचाई से देखने पर निम्न आकार में ही सही, मगर दिखाई दे रही हैं। उनका अपना अस्तित्व है।

फिल्म का यह शुरुआती हिस्सा अत्यंत प्रभावशाली है क्योंकि यहाँ निर्देशक किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दी में नहीं हैं। वे पात्र की आंतरिक यात्रा को धीरे-धीरे खुलने देते हैं। यही वजह है कि जब पात्र कुंभ और मोक्ष की बात करता है, तो वह धार्मिक कर्मकांड की भाषा नहीं लगती, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की भाषा लगती है जो अपने भीतर कैद किसी पहचान से मुक्त होना चाहता है।

वह कहता है—

“कुंभ, जहाँ लोग मोक्ष प्राप्त करने आते हैं यानी कि लिब्रेशन, आज़ादी।
जीवन-मृत्यु की अविरल बहती धारा से मुक्ति।
कुंभ लगने वाला है।
लोग यहाँ अपने पापों की गठरी धुलने आएँगे।
इस बार तो 144वाँ कुंभ है।
सातों सितारों को करवट लेते हुए, आसमान की पेशानी चूमते हुए देखना लाइफ का सबसे बड़ा जादू है।
कुंभ!
कुंभ… कुछ तो है।”
और कहते-कहते नदी के बीचों-बीच जाकर नाव में बैठकर पानी को क़रीब से देखकर, छूकर महसूस करता है।
वह देखता है-

पक्षी उड़ रहे हैं।
नाव धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है।
बहुत-सी ध्वनियाँ मिलकर एक संगीत रच रही हैं।
वह पानी की लहरों में अपने हाथ फेरता है।
अंततः वह पानी में स्नान करता है। अब उसकी पूरी देह पानी की आगोश में है।
वह फिर से संवाद करता है—
“मैं घर से चला आया था।
जीवन क्या है?
जहाँ से शुरुआत हो
या जहाँ से अंत हो
मुझे अंत की तलाश है।”

फिर उसके बाद वह साधुओं के बीच जाता है। उसके माथे पर रोली से बड़ी-सी बिंदी लगा दी गई है। बिंदी लगते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आती है। वह मेले से थोड़ा हटकर बाज़ार में जाता है। बाज़ार में बिंदी के पैकेट को बहुत ग़ौर से देखता है। वह बड़ी-सी बिंदी का पैकेट ख़रीदता है और एक लिपस्टिक भी। वह अब उत्साह से भर गया है। उसके चेहरे पर ऐसा भाव है मानो उसे कुछ मिल गया हो। उसके पैरों की गति से मालूम होता है कि उसको वह मिल गया जिसकी उसे तलाश थी। वह ऐसे आगे बढ़ रहा है, अपने आप में मग्न, जैसे उसे उसकी मंज़िल मिल गई हो।

उसने जान लिया है कि वह वह नहीं है जो दिखता है, बल्कि वह वह है जो उसके अंदर की आवाज़ उसे बताती है। उसको एक पुरुष की तरह लोग देखते हैं और वह अपने आप को एक स्त्री की तरह महसूस करता है। उसने अपने व्यक्तित्व से वह हर चीज़ अलहदा कर दी है जिससे वह पुरुष दिखाई देता था। उसने अब स्त्री वाले वस्त्र धारण कर लिए हैं और माथे पर बड़ी-सी बिंदी लगा ली है, होंठों पर लिपस्टिक लगा ली है। चोली-घाघरा पहने हुए, दोनों हाथों से घाघरे को थामे हुए, वह भीड़ के बीचों-बीच से कुंभ मेले की ओर आ रहा है।

उसके चेहरे और आँखों से उदासी, ख़ामोशी ग़ायब है अब। उसके अस्तित्व में जो पुरुष दिखाई देता था, उसको उसने मार दिया है, उसका अंत कर दिया है। और इस अंत के बाद एक स्त्री ने जन्म लिया है। उसे इस पुरुष का अंत करना था और इसी अंत की उसे तलाश थी। इस अंत से उसके भीतर से एक स्त्री ने जन्म लिया है। यही स्त्री-जीवन उसके नए जीवन की शुरुआत है। उसके नए सृजन की नई यात्रा की शुरुआत है। उसको मोक्ष की प्राप्ति हो चुकी है—मोक्ष यानी आज़ादी। उस ग़ुलामी से आज़ादी जिसके तहत वह स्त्रीत्व को महसूस करते हुए भी पुरुष की तरह दिख रहा था। अब वह अपनी आज़ादी और अपने स्त्रीत्व को महसूस कर रहा है, सेलिब्रेट कर रहा है।

‘मुझे अंत की तलाश है’- यह संवाद फिल्म का केंद्रीय भाव बन जाता है। यहाँ अंत मृत्यु का अंत नहीं है, बल्कि उस झूठी सामाजिक पहचान का अंत है जिसे पात्र अब तक ढोता आया है। फिल्म बहुत सूक्ष्मता से दिखाती है कि उसके भीतर स्त्रीत्व पहले से मौजूद था, लेकिन समाज द्वारा आरोपित पुरुष पहचान उसे लगातार दबा रही थी।

फिल्म का सबसे सुंदर दृश्य शायद वही है, जब उसके माथे पर रोली की बड़ी-सी बिंदी लगाई जाती है। यह बहुत साधारण दृश्य है, लेकिन निर्देशक उसे एक आत्मिक क्षण में बदल देते हैं। उस बिंदी के साथ उसके चेहरे पर जो हल्की मुस्कान आती है, वह किसी बाहरी सजावट की खुशी नहीं है। वह स्वयं को पहली बार पहचान लेने की राहत है।

इसके बाद बाज़ार में बिंदी और लिपस्टिक ख़रीदने वाला दृश्य भी बहुत अर्थपूर्ण है। यहाँ कोई नाटकीय उद्घोषणा नहीं है। कोई बड़ा संवाद नहीं। केवल एक व्यक्ति है, जो धीरे-धीरे अपने भीतर की पहचान को स्वीकार कर रहा है। फिल्म की खूबी यही है कि वह ट्रांसजेंडर अनुभव को सनसनी या करुणा का तमाशा नहीं बनाती। वह उसे मनुष्य की एक गहरी निजी अनुभूति की तरह प्रस्तुत करती है।

जब पात्र स्त्री-वस्त्र पहनकर भीड़ के बीच लौटता है, तब उसके चेहरे की उदासी गायब हो चुकी होती है। यहाँ फिल्म एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहती है—मुक्ति हमेशा बाहर से नहीं आती, कई बार वह स्वयं को स्वीकार कर लेने से आती है। पात्र ने किसी और को नहीं मारा, उसने अपने ऊपर थोपी गई पहचान को ख़त्म किया है। उसी “अंत” से उसका नया जन्म संभव हुआ है।

 इस फिल्म की सबसे बड़ी शक्ति उसका दृश्य-संसार है। नदी, नाव, जल, भीड़, ध्वनि, रंग- सब मिलकर पात्र की मानसिक स्थिति का रूपक बन जाते हैं। कुंभ यहाँ केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि आत्मशुद्धि और पुनर्जन्म का प्रतीक बन जाता है। निर्देशक ने बहुत कम समय में दृश्य और ध्वनि के सहारे एक जटिल भावनात्मक अनुभव रचा है।

लेकिन फिल्म की प्रासंगिकता केवल यहीं तक सीमित नहीं रहती। यह अपने समय के उस बड़े संकट की ओर भी संकेत करती है, जहाँ मनुष्य की पहचान लगातार संदेह के घेरे में डाल दी गई है। ट्रांसजेंडर समुदाय का संघर्ष केवल लैंगिक पहचान का संघर्ष नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीने के अधिकार का संघर्ष भी है। समाज आज भी व्यक्ति को उसकी पसंद, उसकी देह, उसके पहनावे और उसके जीवन-निर्णयों के आधार पर कठघरे में खड़ा करता है।

फिल्म इसी सामाजिक हिंसा की ओर बहुत शांत ढंग से संकेत करती है। यह उसकी खूबी है कि वह नारेबाज़ी नहीं करती। वह केवल एक व्यक्ति की यात्रा दिखाती है और उसी के भीतर पूरा सामाजिक यथार्थ दिखाई देने लगता है।

आज के समय में, जब नागरिकता, पहचान और अस्तित्व के प्रश्न लगातार जटिल होते जा रहे हैं, यह फिल्म और अधिक महत्वपूर्ण हो उठती है। हर व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में अपनी पहचान साबित करने के दबाव में है। लेकिन ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए यह दबाव कई गुना अधिक हिंसक हो जाता है, क्योंकि उन्हें अपने अस्तित्व के सबसे निजी हिस्से तक को सामाजिक स्वीकृति के लिए साबित करना पड़ता है। फिल्म इस पीड़ा को बहुत संवेदनशील ढंग से छूती है। वह यह नहीं कहती कि संघर्ष समाप्त हो गया है। लेकिन वह यह ज़रूर दिखाती है कि आत्मस्वीकृति किसी भी मुक्ति की पहली शर्त है।

किसी पर भी कोई भाषा, कोई विचार, कोई संस्कृति, कोई पहचान थोपना शोषण है। यह ऐसा समय है जिसमें हर किसी की पहचान को संदिग्ध बना दिया गया है। हर कोई अपने अस्तित्व की पहचान को साबित करने के लिए ख़्वार होता फिर रहा है। किसी को अपनी देशभक्ति साबित करनी है, किसी को अपनी राष्ट्रीयता साबित करनी है, किसी को अपनी नागरिकता साबित करनी है। तरह-तरह के दस्तावेज़ फोल्डर में इकट्ठा करने हैं और फलाँ-ढिमकाँ को दिखाने हैं।

अभी तक तो जो काग़ज़ तय करते थे नागरिकता, फिर नए-नए काग़ज़ बनाओ। यह अपडेट करो, वह अपडेट करो। देश का नागरिक बारहों महीने किस्म-किस्म की लाइनों में खड़ा कर दिया गया है। वह धूप, तपिश, जाड़ा, शीतलहर, बरसात में कहीं बैंक की लाइन में खड़ा है, कहीं सरकारी स्कूलों में खड़ा है, कहीं वकीलों के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहा है। इतना काफ़ी नहीं था। अब वह हॉस्पिटल की ओपीडी में भी अपनी पहचान की शिनाख़्त के लिए लाइन में खड़ा होगा और एक तकलीफ़देह मेडिकल जाँच प्रक्रिया से गुज़रेगा। तब जाकर उसे कुछ समझा जाएगा। अब प्राथमिक भागदौड़ पेट की आग बुझाने के लिए नहीं है, बल्कि अपनी शिनाख़्त के लिए काग़ज़ इकट्ठा करने और फलाँ-ढिमकाँ प्रक्रिया से गुज़रने के लिए है।

देश तो आज़ाद हो गया था। सिस्टम में कोई बदलाव नहीं आया, सिर्फ़ चेहरे बदले। प्रगतिशीलता सिर्फ़ दिखावे के लिए है। आज भी लोग मध्यकालीन सामंती सोच को ढो रहे हैं। लोगों में मनुष्यता का अभाव पहले ही से था, रही-सही कमी इस पूँजीवादी व्यवस्था ने, फ़ासीवादी सांप्रदायिक ताक़तों ने पूरी कर दी है।

राजनीतिक दल चुनाव में मेनिफेस्टो जनता के सामने पेश करते हैं। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सुरक्षा अब चुनाव के केंद्र में हैं ही नहीं। जनता भी धर्मांधता में अंधी, बहरी, ज़हरीली हो गई है। मीडिया लगातार झूठा प्रोपेगंडा परोस रहा है। जनता और सत्ता के बीच संवाद स्थापित नहीं करता मीडिया। सत्ताधारी पार्टी से सवाल नहीं पूछता।

लोगों की सिलेक्टिव सोच, सिलेक्टिव संवेदना, नफ़रत, विभाजनकारी सोच और विवेकहीनता का फ़ायदा पूँजीपति और पूँजीवादी व्यवस्था उठा रही है। वह अच्छी तरह समझ गई है कि लोगों को विकास नहीं चाहिए। इसलिए सत्ता को अब जनता के अस्तित्व और उसकी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने से कोई सरोकार नहीं है। वह समय-समय पर नई-नई सियासत करती है। जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर न टीवी स्क्रीन पर बात होती है, न सिनेमा में, न अख़बारों के संपादकीय पृष्ठों पर। कुछ गिने-चुने ही हैं जो जनसरोकार की बातें करते हैं, सवाल करते हैं।

आज देश का युवा दो भागों में विभाजित हो गया है। एक जो रोजगार की लड़ाई लड़ रहा है-निराश है, हताश है। यूनिवर्सिटी के छात्र अपने अस्तित्व को बचाने के लिए, समतामूलक समाज की स्थापना के लिए, न्याय और शोषण के ख़िलाफ़ जनांदोलन कर रहे हैं। दूसरी ओर विवेकहीन ज़हर में तब्दील युवा उन्मादी भीड़ में कन्वर्ट हो चुका है। देश की महिलाएँ सड़कों पर हैं न्याय और सुरक्षा की माँग के लिए। देश का युवा सड़कों पर है न्याय, ग़रीबी, आर्थिक-सामाजिक असमानता दूर कर समतामूलक समाज की स्थापना और रोजगार के लिए। देश का अध्यापक सड़कों पर है, मज़दूर वर्ग सड़कों पर है। अब देश का थर्ड जेंडर और ट्रांसजेंडर भी सड़कों पर है अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए।

लोगों के पास दो काम मुख्य रह गए हैं अब। एक तो अपनी नागरिकता, देशभक्ति साबित करते फिरें, तरह-तरह के दस्तावेज़ इकट्ठा करते फिरें। दूसरे अपने अधिकार, न्याय, अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई लड़ते रहें।

ये कैसी आज़ादी है? अपनी इच्छा से खा-पी नहीं सकते, अपनी वेशभूषा अपनी पसंद और भौगोलिक स्थिति के अनुसार चुन नहीं सकते। अपनी इच्छा से अपनी प्रोफेशनल लाइफ़ नहीं चुन सकते। अपनी इच्छा से अपने लाइफ़-पार्टनर नहीं चुन सकते। सुकून से कोई भी नहीं है। अपने-अपने हिस्से की लड़ाई हर कोई लड़ रहा है।

हमारे देश में महिलाएँ, मज़दूर, अशिक्षित, थर्ड जेंडर और ट्रांसजेंडर—कोई भी सुरक्षित नहीं हैं। ये सब किसी-न-किसी रूप में विरोधी परिस्थितियों को झेल रहे हैं।

कितने लोगों ने ट्रांसजेंडर, थर्ड जेंडर, मज़दूर, ग़रीब और बेरोज़गारों के लिए अपनी आवाज़ बुलंद की है? आधे से ज़्यादा साहित्यकार, कलाकार, संपादक, पत्रकार भी मुनाफ़िक़ हैं, अवसरवादी हैं। फ़र्ज़ी प्रेम कविताएँ, फ़र्ज़ी प्रगतिशील कविताएँ इधर-उधर भेजते रहते हैं। एक-एक करके बारी तो सबकी आ रही है। शोषण की चक्की सब पर चलती है धीरे-धीरे।

इतनी जटिलताओं के बीच कोई ट्रांसजेंडर की फ़ीलिंग और दुःख को कैसे समझे? अपने बच्चों को लोग स्कूल में रहने का तौर-तरीक़ा सिखाते हैं, मगर इंसानों के साथ इंसानों की तरह रहने का तरीक़ा नहीं सिखाते।

रोजगार और आत्मनिर्भरता को बहुओं, बेटियों, पत्नियों के लिए ज़रूरी नहीं समझा जाता, तो फिर थर्ड जेंडर और ट्रांसजेंडर के लिए कैसे समझा जा सकता है? ये हमेशा से हाशिए पर धकेले जाते रहे हैं। अब तो हद ही हो गई। नए-नए क़ानून पास किए जा रहे हैं। देश का बूढ़ा, बच्चा, नौजवान, औरतें, थर्ड जेंडर, ट्रांसजेंडर-हर कोई ग़ैर-बराबरी से दो-चार होता रहता है। बिना सड़क पर आए अब किसी को सम्मान नहीं मिलता, न्याय नहीं मिलता, मेहनताना नहीं मिलता।

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कितना सुखद होता अगर सरकारें थर्ड जेंडर और ट्रांसजेंडर की मूलभूत सुविधाओं, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और रोजगार के बारे में भी सोचतीं। महिलाओं की सुरक्षा के बारे में गंभीरता से कुछ करतीं। मगर सरकारें हमेशा पूँजीपतियों और फ़ासीवादी सांप्रदायिक ताक़तों के साथ खड़ी दिखाई देती हैं।

आज का मुख्यधारा सिनेमा अक्सर हाशिये के समुदायों को या तो दया का विषय बना देता है या फिर केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित कर देता है। लेकिन यह फिल्म अपने पात्र को मनुष्य की तरह देखती है। उसकी इच्छा, भय, असमंजस और खुशी- सबको बराबर महत्व देती है।

यही वजह है कि फिल्म का असर उसके समाप्त होने के बाद भी बना रहता है। वह किसी बड़े नाटकीय निष्कर्ष पर खत्म नहीं होती। वह एक अनुभव की तरह हमारे भीतर रह जाती है।

अफ़सोस यह है कि इस तरह का जनसरोकार से जुड़ा सिनेमा बहुत दूर तक अपनी पहुँच नहीं बना पाता। मुख्यधारा मीडिया भी अक्सर ऐसी फिल्मों को वह जगह नहीं देता, जिसकी वे हक़दार हैं। बाज़ार-केन्द्रित सिनेमा के बीच ऐसी फिल्में हमें याद दिलाती हैं कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य को समझने का माध्यम भी हो सकता है।

इन अर्थों में देखें तो ‘द राइट टू बी’ एक महत्वपूर्ण फिल्म है। यह हमें केवल ट्रांसजेंडर अनुभव के बारे में सोचने पर मजबूर नहीं करती, बल्कि यह भी पूछती है कि क्या सचमुच हमारा समाज मनुष्य को उसकी अपनी शर्तों पर जीने की आज़ादी देता है?

और शायद यही प्रश्न इस फिल्म को लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखेगा।

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मेहजबीं
पैदाइश- नई दिल्ली रिहाइश- नई दिल्ली शिक्षा- एम ए हिन्द दिल्ली विश्वविद्यालय पत्रकारिता- जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय बीएड चौधरी रणवीर सिंह यूनिवर्सिटी जिंद स्वतंत्र लेखन नज्म कविता संस्मरण फिल्म समीक्षा लेख
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