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केरल सरकार को बड़ा झटका, हाईकोर्ट ने ‘नवा केरल सिटीजन्स रिस्पॉन्स प्रोग्राम’ को किया रद्द; अदालत ने पूछा- पैसा कहां से आया?

सर्वे जनवरी 2026 में शुरू हुआ था और इसका लक्ष्य राज्य के लगभग 80 लाख घरों तक पहुंचकर कल्याणकारी योजनाओं और विकास पहलों पर प्रतिक्रिया जुटाना बताया गया था। सरकार ने इसे नीति निर्माण में मदद करने वाला अध्ययन बताया, लेकिन…

कोच्चिः केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार को बड़ा झटका लगा है। उच्च न्यायालय ने मंगलवार को ‘नवा केरल सिटिजन रिस्पॉन्स प्रोग्राम’ के तहत चल रहे विवादास्पद घर-घर सर्वे को रद्द कर दिया। अदालत ने परियोजना को वित्तीय और प्रशासनिक आधार पर गैरकानूनी मानते हुए इसके क्रियान्वयन और धन के स्रोत पर गंभीर सवाल उठाए।

मुख्य न्यायाधीश सोमेन सेन और न्यायमूर्ति वी एम श्याम कुमार की खंडपीठ ने केएसयू नेता अलोशियस जेवियर और पेरुंबवूर निवासी एमएच मुबास की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। न्यायालय ने अपने अवलोकन में विशेष रूप से इस परियोजना के वित्तीय पहलुओं पर असंतोष व्यक्त किया।

लगभग 20 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना के लिए न तो कोई उचित बजट आवंटन किया गया था और न ही कोई औपचारिक वित्तीय मंजूरी ली गई थी। अदालत ने सरकार से तीखे सवाल पूछे कि बिना किसी बजटीय प्रावधान के इस भारी-भरकम खर्च के लिए पैसा कहाँ से जुटाया गया।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि जनता की जरूरतों को समझने के लिए सर्वेक्षण करने में कुछ गलत नहीं है, लेकिन मानक प्रशासनिक प्रक्रियाओं और वित्तीय नियमों को दरकिनार कर आधिकारिक आवरण के तहत राजनीतिक गतिविधि करना अस्वीकार्य है। अदालत के इस फैसले से राज्य में 2026 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच चल रहा बड़े पैमाने का घर-घर सर्वेक्षण प्रभावी रूप से रुक गया है।

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राजनीतिक उद्देश्य के आरोप

बता दें कि सर्वे जनवरी 2026 में शुरू हुआ था और इसका लक्ष्य राज्य के लगभग 80 लाख घरों तक पहुंचकर कल्याणकारी योजनाओं और विकास पहलों पर प्रतिक्रिया जुटाना बताया गया था। सरकार ने इसे नीति निर्माण में मदद करने वाला अध्ययन बताया, लेकिन विपक्ष और छात्र संगठन केएसयू ने आरोप लगाया कि यह सरकारी मशीनरी के जरिए जनता की राय जानकर चुनावी घोषणापत्र तैयार करने का प्रयास था।

अदालत ने यह माना कि जनमत समझने के लिए सर्वे करना गलत नहीं, लेकिन यह जांचना जरूरी है कि कहीं इसे आधिकारिक आवरण में राजनीतिक अभ्यास के रूप में तो नहीं चलाया गया।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा था कि सर्वे के लिए लगाए गए सामाजिक स्वयंसेवक दरअसल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के कार्यकर्ता थे। सरकार ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कार्यक्रम को प्रशासनिक सुधार और कल्याण अध्ययन बताया, लेकिन अदालत ने इसकी कानूनी और प्रशासनिक नींव को टिकाऊ नहीं माना।

विपक्ष ने क्या कहा?

विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे सरकार के लिए कड़ी फटकार बताया। उन्होंने कहा कि जनहित के नाम पर जनता का पैसा खर्च करना अस्वीकार्य है और आरोप लगाया कि अन्य विभागों में भी इसी तरह की गतिविधियां चल रही हो सकती हैं। उन्होंने दावा किया कि वन विभाग के कर्मचारी भी घर-घर जाकर सर्वे कर रहे हैं और चेतावनी दी कि यदि इसे नहीं रोका गया तो विपक्ष हस्तक्षेप करेगा।

अदालत का आदेश उन याचिकाओं पर आया जिनमें सर्वे रोकने की मांग की गई थी और सरकार से फंडिंग का स्पष्ट रिकॉर्ड प्रस्तुत करने को कहा गया था। केएसयू के प्रदेश अध्यक्ष अलोशियस जेवियर और एमएच मुबास ने यह याचिका दायर किया था।। इस फैसले से पहले भी ‘नवा केरल सदस’ जैसे कार्यक्रमों पर सरकारी संसाधनों के राजनीतिक उपयोग के आरोप लग चुके हैं।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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