Home विश्व ईरान-अमेरिका युद्ध में मध्यस्थ बना पाकिस्तान, कौन-कौन हो रहा शामिल?

ईरान-अमेरिका युद्ध में मध्यस्थ बना पाकिस्तान, कौन-कौन हो रहा शामिल?

शनिवार को जारी एक प्रेस रिलीज में विदेश मंत्रालय ने कहा कि डिप्टी पीएम और विदेश मंत्री इशाक डार के बुलावे पर सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद, तुर्किए के विदेश मंत्री हकन फिदान और मिस्र के विदेश मंत्री डॉ. बद्र अब्देलती 29 मार्च से 30 मार्च तक इस्लामाबाद आएंगे।

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पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका, इजराइल-ईरान के बीच लगातार हवाई हमले जारी हैं। इस भीषण संघर्ष को रोकने के लिए पाकिस्तान इस सप्ताहांत एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल की मेजबानी करने जा रहा है। इसे अमेरिका-ईरान टकराव के बीच संभावित मध्यस्थता प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्री रविवार से शुरू होने वाली दो-दिवसीय यात्रा पर इस्लामाबाद पहुंच रहे हैं। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को कम करना और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक ठोस तंत्र विकसित करना है।

विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक, यह बैठक रविवार और सोमवार को होगी, जिसमें चारों देशों के विदेश मंत्री क्षेत्रीय हालात, तनाव कम करने के उपाय और कूटनीतिक रास्तों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा कि इस बैठक में यह समझने की कोशिश की जाएगी कि युद्ध किस दिशा में जा रहा है और बातचीत के जरिए समाधान की क्या संभावनाएं हैं।

यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब 28 फरवरी से अमेरिका और इजराइल द्वारा शुरू किया गया संघर्ष दूसरे महीने में प्रवेश कर चुका है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक मार्गों को लेकर चिंता बढ़ गई है।

कौन-कौन होगा शामिल?

विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस्लामाबाद में होने वाली इस बैठक में पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्री शामिल होंगे। पाकिस्तान की ओर से विदेश मंत्री इशाक डार इस वार्ता का नेतृत्व करेंगे।

बयान में कहा गया कि मंत्री इशाक डार के बुलावे पर सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद, तुर्किए के विदेश मंत्री हकन फिदान और मिस्र के विदेश मंत्री डॉ. बद्र अब्देलती 29 मार्च से 30 मार्च तक इस्लामाबाद आएंगे।

इसके अलावा, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बैकचैनल कूटनीति से जुड़े प्रतिनिधियों के भी शामिल होने की संभावना है, हालांकि ईरान की ओर से आधिकारिक प्रतिनिधित्व को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर सकते हैं, हालांकि इस पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। वहीं, तेहरान ने संकेत दिया है कि स्टीव विटकॉफ या जेरेड कुशनर के नेतृत्व में वार्ता सफल होने की संभावना कम है, क्योंकि भरोसे की कमी बनी हुई है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता भूमिका

पाकिस्तान इस पूरे विवाद में खुद को एक अहम मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बैठक से ठीक पहले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से एक घंटे से अधिक लंबी बातचीत की। यह बातचीत तुर्किए, मिस्र, सऊदी अरब और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की बैठक से एक दिन पहले हुई।

शरीफ ने ईरान को “भाईचारा देश” बताते हुए कहा कि पाकिस्तान विभिन्न पक्षों के साथ मिलकर संवाद को आगे बढ़ाने और संघर्ष कम करने की दिशा में काम कर रहा है। ईरानी राष्ट्रपति ने भी पाकिस्तान की इस मध्यस्थता पहल की सराहना की और इसके लिए धन्यवाद दिया।

इस बीच, अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक स्तर पर प्रस्तावों का आदान-प्रदान जारी है। ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान को 15 बिंदुओं का प्रस्ताव सौंपा है, जिसमें उसके परमाणु कार्यक्रम पर सीमाएं और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। कूटनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यह प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए ही तेहरान तक पहुंचाया गया।

हालांकि, ईरान ने इस प्रस्ताव को “एकतरफा और अनुचित” बताते हुए खारिज कर दिया और इसके जवाब में पांच सूत्रीय प्रस्ताव पेश किया है, जिसमें मुआवजे और रणनीतिक जलमार्ग पर अपनी संप्रभुता की मान्यता की मांग शामिल है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने संघर्षविराम से जुड़े अपने जवाब भी इस्लामाबाद के जरिए ही भेजे हैं, हालांकि उसने सीधे तौर पर अमेरिका के साथ बातचीत की पुष्टि नहीं की है।

पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ के अनुसार, यह बैठक पहले तुर्की में प्रस्तावित थी, लेकिन बाद में इसे इस्लामाबाद में आयोजित करने का फैसला लिया गया। इससे साफ है कि ईरान-अमेरिका संवाद प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

संदेह और सैन्य तनाव बरकरार

उधर, कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद अविश्वास बना हुआ है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका पर अवास्तविक मांगें रखने और विरोधाभासी रुख अपनाने का आरोप लगाया है।

वहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका अपने उद्देश्यों को बिना जमीनी सैनिकों के भी हासिल कर सकता है।

इसी बीच, करीब 3,500 अमेरिकी मरीन और नौसैनिकों के साथ अमेरिकी युद्धपोत क्षेत्र में पहुंच चुके हैं, जिसे पिछले दो दशकों में अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती में से एक बताया जा रहा है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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