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चीन के सहयोग से आगे बढ़ रही बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना, भारत ने क्या प्रतिक्रिया दी?

भारत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पिछले हफ्ते बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान चीन दौरे पर गए थे। वहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से हुई। दोनों देशों ने अपने संबंधों को और मजबूत करने का फैसला किया।

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New Delhi: Ministry of External Affairs spokesperson Randhir Jaiswal briefs the media, in New Delhi on Thursday, July 17, 2025. (Photo: IANS/Video Grab)

नई दिल्लीः बांग्लादेश में चीन की बढ़ती सक्रियता पर भारत ने पहली बार खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। खासकर तीस्ता नदी परियोजना और प्रस्तावित चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CBMEC) को लेकर विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह पड़ोस में हो रहे हर घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है और जरूरत पड़ने पर उचित कदम उठाएगा।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को साप्ताहिक प्रेस वार्ता में कहा कि भारत की ओर से बांग्लादेश में विकास परियोजनाओं के लिए दी जाने वाली सहायता दोनों देशों के बीच तय रोडमैप के अनुसार होती है। इसकी समय-समय पर समीक्षा भी की जाती है। उन्होंने कहा कि तीस्ता परियोजना पर भारत अपने विचार पहले ही बांग्लादेश को बता चुका है और अब इस मुद्दे से जुड़े सभी नए घटनाक्रमों को ध्यान में रखकर आगे की रणनीति बनाई जाएगी।

चीन दौरे में तीस्ता परियोजना पर बनी सहमति

भारत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पिछले हफ्ते बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान चीन दौरे पर गए थे। वहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से हुई। दोनों देशों ने अपने संबंधों को और मजबूत करने का फैसला किया। संयुक्त बयान में चीन ने तीस्ता नदी के व्यापक प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना (TRCMRP) को अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग देने और इसकी व्यवहार्यता अध्ययन (फिजिबिलिटी स्टडी) को तेजी से पूरा कराने का भरोसा दिया।

चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग ने भी बांग्लादेश को जल संसाधन प्रबंधन में “पूर्ण सहयोग” देने का आश्वासन दिया। चीनी विशेषज्ञ पहले ही इस परियोजना का प्रारंभिक अध्ययन कर चुके हैं।

सिर्फ तीस्ता नहीं, CBMEC भी चिंता की वजह

चीन ने चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CBMEC) को आगे बढ़ाने की भी प्रतिबद्धता जताई है। यह गलियारा बनता है तो चीन को बंगाल की खाड़ी तक सीधी पहुंच मिल सकती है। यही वजह है कि भारत इसे केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक नजरिए से भी देख रहा है।

भारत की एक और चिंता यह है कि तीस्ता परियोजना का इलाका सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ के करीब है। यही संकरा भूभाग भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। ऐसे में वहां चीन की मौजूदगी भारत के लिए संवेदनशील सुरक्षा मुद्दा मानी जाती है।

तीस्ता परियोजना में चीन की भागीदारी नई बात नहीं है। वर्ष 2020 में बांग्लादेश ने करीब एक अरब डॉलर की इस परियोजना के लिए चीन से 72.5 करोड़ डॉलर का रियायती ऋण मांगा था। मार्च 2025 में तत्कालीन अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस की चीन यात्रा के दौरान भी इस परियोजना में चीनी सहयोग का स्वागत किया गया। बाद में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार ने भी चीन की भागीदारी को औपचारिक मंजूरी दे दी।

भारत ने इससे पहले खुद इस परियोजना में निवेश की इच्छा जताई थी। जून 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि भारतीय तकनीकी टीम बांग्लादेश जाकर तीस्ता नदी के संरक्षण और प्रबंधन की संभावनाओं का अध्ययन करेगी। इस वर्ष मई में विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भी कहा था कि भारत इस परियोजना पर ढाका से बातचीत के लिए तैयार है।

जल बंटवारा समझौता अब भी अधूरा

विशेषज्ञों का कहना है कि तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना और भारत-बांग्लादेश के बीच लंबित तीस्ता जल बंटवारा समझौता दो अलग-अलग मुद्दे हैं। जल बंटवारा समझौता 2011 से अटका हुआ है। उस समय पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के किसानों के हितों का हवाला देते हुए प्रस्तावित समझौते पर आपत्ति जताई थी।

बांग्लादेश के अधिकारियों का कहना है कि तीस्ता परियोजना पूरी तरह उसके क्षेत्र में है, इसलिए इससे भारत को कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी माना है कि सूखे मौसम में पर्याप्त पानी सुनिश्चित करने के लिए भारत के साथ जल बंटवारा समझौता अब भी जरूरी है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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