नई दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) समेत पूरे भारत में इन दिनों भीषण गर्मी का प्रकोप जारी है। इसके चलते बिजली की खपत भी बढ़ गई है और पावर ग्रिड पर भी दबाव बढ़ रहा है। बीते महीने (मई में) भारत के बिजली ग्रिड में चौंकाने वाली बात सामने आई है।
21 मई को दोपहर 3:45 बजे बिजली की सबसे ज़्यादा मांग (पीक डिमांड) 270.82 GW तक पहुंच गई। यह लगातार चौथा दिन था जब मांग अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंची। इस मांग को मुख्य रूप से थर्मल (62.8%), सोलर (22%), विंड (5%) और हाइड्रोपावर (5.8%) से पूरा किया गया।
शहरों के घरों के बेडरूम कैसे बढ़ा रहे हैं पावर ग्रिड पर दबाव
ये आंकड़े हालांकि पूरी तस्वीर पेश नहीं करते हैं। दरअसल इतनी बिजली की मांग औद्योगिक उत्पादन केंद्रों से नहीं बल्कि शहरों के घरों के बेडरूम से आ रही है। भारत में कई दशकों तक भारत में बिजली की खपत मुख्य रूप से कारखानों और खेती में इस्तेमाल होने वाले पंपों पर निर्भर थी। लेकिन हाल के समय में उत्तर प्रदेश जहां कोई बड़ा औद्योगिक आधार नहीं है, बिजली की मांग के मामले में सबसे आगे है। 21 मई को बिजली की सबसे ज्यादा मांग वाले शीर्ष 10 राज्यों में से छह यूपी, तमिलनाडु, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश औद्योगिक रूप से विकसित राज्य नहीं माने जाते हैं। ये ऐसे इलाके हैं जहां गर्मी और उमस ज्यादा होती है। इसके अलावा एयर-कंडीशनर का इस्तेमाल लगातार तेजी से बढ़ रहा है।
राजधानी दिल्ली में एसी का इस्तेमाल सर्वाधिक होता है। इंडिया टुडे ने बिजली वितरण कंपनी के एक अधिकारी के हवाले से लिखा कि अकेले एयर-कंडीशनिंग (AC) से ही घरेलू और कमर्शियल बिजली की खपत का 30-50 फीसदी हिस्सा खर्च होता है।
तेजी से बढ़ता शहरीकरण है वजह?
इन दिनों तेजी से शहरीकरण हो रहा है। इसके कारण जमीन के इस्तेमाल और जमीन की सतह (Land Use and Land Cover) में बदलाव आता है। इस कारण से शहरों और कस्बों का तापमान बढ़ जाता है। इस वजह से अर्बन हीट आइसलैंड (UHI) बन जाता है। UHI के इस असर के कारण अतिरिक्त बिजली की खपत होती है। बिजली की खपत बढ़ने का एक और कारण कंक्रीट का बढ़ता इस्तेमाल और पक्की सड़कों का निर्माण है। पक्की सड़कें दिनभर गर्मी (हीट) सोंकती हैं और रात में देर तक इसका उत्सर्जन करती है।
दरअसल, कंक्रीट, डामर और कांच दिन भर सूरज की गर्मी सोखते हैं और सूरज डूबने के काफी देर बाद उसे छोड़ते हैं। भारत में जिन ग्रामीण इलाकों की जगह पर शहर या बस्तियां बनी हैं, वे इलाके अब पहले के मुकाबले 2 से 10 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रहते हैं। बिजली की मांग बढ़ने के पीछे अब UHI (अर्बन हीट आइलैंड) मुख्य वजह है। कई इलाकों में इंडस्ट्री के लिए बिजली की मांग तो लगभग एक जैसी बनी हुई है।
यह भी पढ़ें – भारतीय शेयर बाजार में क्यों नजर आया तेज उछाल, निवेशकों को 10 लाख करोड़ का फायदा; क्या रही बड़ी वजहें
इसके साथ ही घरों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ी है क्योंकि शहर बहुत ज्यादा गर्म होते जा रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक 40 प्रतिशत घरों में AC लग जाएंगे। ये AC गर्मी को बाहर सड़कों पर छोड़ते हैं जिससे शहर और भी गर्म हो जाते हैं।
2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की लगभग 31 फीसदी आबादी शहरी इलाकों में रहती है और देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इसका 63 फीसदी योगदान है। 2030 तक लगभग 40 प्रतिशत आबादी के शहरी इलाकों में रहने और GDP में 75 प्रतिशत का योगदान देने की संभावना है।
ISRO की रिसर्च में क्या पता चला?
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के 2024 के एक अध्ययन के मुताबिक, 32 शहरों में शहरी तापमान और हीटवेव (लू) में काफी बढ़ोतरी देखी गई है। खासकर इंडो-गैंगेटिक मैदानी इलाकों में जिसका मुख्य कारण जमीन के इस्तेमाल में बदलाव है यानी बिना निर्माण वाली जगहों का निर्माण-युक्त इलाकों में बदलना।
नमी (आर्द्रता) इस स्थिति को और मुश्किल बना देती है। शरीर पसीना सुखाकर खुद को ठंडा रखता है लेकिन जब हवा में पहले से ही बहुत ज्यादा नमी हो तो यह प्रक्रिया काम नहीं करती। ‘हीट इंडेक्स’ यानी तापमान का ‘असली अहसास’ थर्मामीटर की रीडिंग से कई डिग्री सेल्सियस ज्यादा हो सकता है।
पहले रात के समय ग्रिड को थोड़ी राहत मिलती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। दिन भर गर्मी सोखने वाला कंक्रीट रात के समय उस गर्मी को वापस छोड़ता है। ऐसे में जिन बेडरूम में पहले आधी रात तक ठंडक हो जाती थी वे अब सुबह 4 बजे तक गर्म रहते हैं। भीषण गर्मी के चलते कूलिंग उपकरण ज्यादा देर तक चलते हैं और अगले दिन की शुरुआत ही ज्यादा तापमान से होती है। काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के डेटा के मुताबिक 2010 से रात के तापमान में हर दशक में लगभग 0.21 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। इससे 35 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश प्रभावित हुए हैं।
सिक्किम में हाल के समय में रात के तापमान में बढ़ोतरी के सबसे साफ संकेत मिले हैं। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गोवा, उत्तराखंड और बिहार में भी तापमान में काफी बढ़ोतरी देखी गई है।
घनी आबादी वाले शहरों में हीटवेव और गर्मी से होने वाली मौतों से जुड़े UHI (अर्बन हीट आइलैंड) की गंभीरता अब एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है। देश भर में UHI की तीव्रता 2 से 10 डिग्री सेल्सियस के बीच अलग-अलग होती है। इसमें उत्तर-पश्चिम भारत में तापमान का अंतर ज्यादा साफ तौर पर देखा जाता है।
क्या पूरी हो पाएगी बिजली की मांग?
अब सवाल उठता है कि क्या बिजली की बढ़ती खपत और मांग पूरी कर पाना संभव है। इसे सिर्फ कागजी तौर पर देखें तो यह संभव है लेकिन असल में इस बढ़ती मांग को पूरा कर पाना बड़ी चुनौती है। मार्च 2026 तक भारत की इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 533 GW से ज्यादा हो गई।
इसमें कुल क्षमता का लगभग 53 प्रतिशत हिस्सा नॉन-फॉसिल स्रोतों से आया। लेकिन इंस्टॉल्ड पावर और उपलब्ध पावर एक ही बात नहीं है। अप्रैल 2026 में पीक डिमांड के समय, सोलर और हाइड्रो ने 30 प्रतिशत मांग पूरी की और कोयले से बिजली बनाने की क्षमता को उसकी तकनीकी लिमिट (55 प्रतिशत) तक इस्तेमाल किया गया जबकि गैस ने ज्यादा लागत पर मांग में अचानक आए अंतर को पूरा किया।
दोपहर के समय जो 80 GW सोलर पावर बिजली की जरूरत को पूरा करती है वह सूरज ढलते ही खत्म हो जाती है। ठीक उसी समय घरों में कूलिंग (ठंडा रखने) की जरूरत शाम को बढ़ने लगती है। अब यह जरूरत आधी रात के बाद तक बनी रहती है यानी उन घंटों में जब रिन्यूएबल एनर्जी उपलब्ध नहीं होती और पावर ग्रिड को सबसे ज्यादा कोयले पर निर्भर रहना पड़ता है।
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) की रिसोर्स-एडिक्वेसी मॉडलिंग का अनुमान है कि अगर सभी प्लान की गई क्षमता समय पर तैयार हो जाती है तब भी 2034 तक उत्तर प्रदेश में 14.9 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 11 प्रतिशत और असम में 30 प्रतिशत तक बिजली की कमी (unserved energy) हो सकती है। बड़े पैमाने पर स्टोरेज की सुविधा अभी नहीं है और इसे बनने में अभी कई साल लगेंगे।



