Home मनोरंजन आशा भोसले ने कैसे बदला बॉलीवुड संगीत का ट्रेंड

आशा भोसले ने कैसे बदला बॉलीवुड संगीत का ट्रेंड

आशा भोसले की शास्त्रीय पकड़ भी अद्भुत थी। उनसे पहले माना जाता था कि एक गायिका या तो चुलबुले गाने गा सकती है या गंभीर गजलें; आशा जी ने इस मिथक को तोड़ा। उन्होंने ओपी नय्यर के संगीत में ‘आइए मेहरबां’ जैसी मादकता बिखेरी, तो वहीं खय्याम के निर्देशन में ‘उमराव जान’ के लिए ऐसी गजलें गाईं जिन्होंने इतिहास रच दिया।

0
asha bhosle journey

भारतीय संगीत जगत का एक चमकता सितारा आज हमेशा के लिए खामोश हो गया। अपनी जादुई आवाज से 8 दशकों तक करोड़ों दिलों पर राज करने वाली दिग्गज गायिका आशा भोसले का रविवार दोपहर मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में निधन हो गया।

भारतीय प्लेबैक सिंगिंग के इतिहास में अगर किसी एक आवाज ने ‘बदलाव’ और ‘आधुनिकता’ का नेतृत्व किया है, तो वह निस्संदेह आशा भोसले की है। जहां एक समय बॉलीवुड संगीत केवल शास्त्रीय और गंभीर धुनों तक सीमित था, वहीं आशा ताई ने अपनी आवाज के जरिए ‘कैबरे’, ‘पॉप’, ‘गजल’ और ‘रॉक’ जैसे जॉनर को मुख्यधारा का हिस्सा बनाया।

8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के एक संगीत प्रेमी परिवार में जन्मीं आशा ताई को संगीत विरासत में मिला था। उनके पिता ‘स्वरसम्राट’ दीनानाथ मंगेशकर खुद एक महान शास्त्रीय गायक और नाट्य संगीतकार थे। संगीत उनके खून में था, लेकिन जीवन का सफर इतना आसान नहीं रहा।

साल 1942 में जब उनके पिता का निधन हुआ, तब आशा जी मात्र 9 साल की थीं। ऐसे कठिन समय में परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने के लिए उन्होंने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ मिलकर पेशेवर गायन की शुरुआत की। उन्होंने अपना पहला गाना 1943 में मराठी फिल्म ‘माझा बाल’ के लिए गाया, जिसके बाद उनके कभी न थमने वाले सफर की शुरुआत हुई।

गायिकी के मिथक को तोड़ा

आशा भोसले की शास्त्रीय पकड़ भी अद्भुत थी। उनसे पहले माना जाता था कि एक गायिका या तो चुलबुले गाने गा सकती है या गंभीर गजलें; आशा जी ने इस मिथक को तोड़ा। उन्होंने ओपी नय्यर के संगीत में ‘आइए मेहरबां’ जैसी मादकता बिखेरी, तो वहीं खय्याम के निर्देशन में ‘उमराव जान’ के लिए ऐसी गजलें गाईं जिन्होंने इतिहास रच दिया। उस्ताद अली अकबर खान के साथ मिलकर 1996 में ‘लीगेसी’ (Legacy) एल्बम में उन्होंने शास्त्रीयता की अद्भुत मिसाल पेश की, जिसे ग्रैमी के लिए नामांकित किया गया था।

‘उमराव जान’ की ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं’, ‘दिल चीज क्या है’ और ‘जुस्तजू जिस की थी’- सिर्फ गाने नहीं थे, बल्कि वे उर्दू शायरी, संगीत और अदायगी का एक त्रिवेणी संगम बन गए। हालांकि यह इतना आसान भी नहीं था। इसके लिए आशा भोसले को अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना पड़ा था।

कम लोग ही जानते हैं कि खय्याम साहब ने सारे गाने आशा जी को उनके सामान्य सुर से एक सुर नीचे गवाया था। वह पहले इसे लेकर थोड़ी अनमनी थीं। उन्होंने शर्त रखी कि वह तभी गाएंगी जब उनके अपने सुर में भी गीत को रिकॉर्ड किया जाएगा। हुआ वैसा ही, लेकिन खय्याम की तजवीज उनके अपने कंफर्ट पर भारी पड़ी। जो रिजल्ट सामने आया उसे देख वह खुद हैरान हो गईं। उनकी इसी विविधता की वजह से संगीतकारों ने फिल्मों में हीरोइनों के किरदारों के साथ प्रयोग करना शुरू किया।

70 के दशक में बॉलीवुड संगीत में जो ‘वेस्टर्न इन्फ्लुएंस’ आया, उसके पीछे आरडी बर्मन का संगीत और आशा भोसले की आवाज थी। ‘दम मारो दम’ और ‘पिया तू अब तो आजा’ जैसे गानों ने भारतीय फिल्म संगीत में हिप्पी संस्कृति और रॉक संगीत को जगह दी। उन्होंने गानों में ‘ब्रीदिंग साउंड्स’ और ‘हमिंग’ के ऐसे प्रयोग किए जो उस समय के लिए क्रांतिकारी थे।

जब 90 के दशक में संगीत का स्वरूप बदला, तो कई पुराने दिग्गज पिछड़ गए, लेकिन आशा जी ने एआर रहमान के साथ ‘रंगीला’ में ‘तन्हा तन्हा’ और ‘रंगीला रे’ जैसे गाने गाकर खुद को फिर से स्थापित किया। उन्होंने ‘जानम समझा करो’ जैसे इंडी-पॉप एल्बमों के जरिए स्वतंत्र संगीत के ट्रेंड को भी बढ़ावा दिया। आशा जी ने केवल हिंदी नहीं, बल्कि मराठी, बंगाली, रूसी और अंग्रेजी सहित 20 से ज्यादा भाषाओं में गाने गाए। उन्होंने साबित किया कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती। 12,000 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड करने के लिए उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। यह ट्रेंड आज के ‘पैन-इंडिया’ संगीत की आधारशिला बना।

संगीत के ट्रेंड बदलने की उनकी इस विलक्षण क्षमता और ऐतिहासिक योगदान के कारण ही उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण (2008) और सिनेमा के शिखर सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार (2000) से नवाजा गया। फिल्मफेयर पुरस्कारों की बात करें, तो उन्हें 18 बार नामांकित किया गया, जिसमें से उन्होंने 7 बार जीत हासिल की। बाद में उन्हें ‘फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ भी दिया गया। उनके गाए गाने आज भी संगीत की दुनिया के अनमोल रत्न माने जाते हैं।

author avatar
अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version