टेलीफोन की घंटी की आवाज़ सुनाई दे रही है। शायद पड़ोस के फ्लैट से आ रही है। घंटी बजती है…बजती है और फिर बजती है। फिर कुछ पल बाद बन्द हो जाती है। ऐसा लगता है नंबर दोबारा मिलाया जा रहा है। तभी घंटी फिर से बजने लगती है, फिर रुकती है, फिर बजनी शुरू हो जाती है। आख़िर रात के इस पहर में इतनी बेताबी से कोई किसी से संपर्क करने की कोशिश भला क्यों कर रहा है? क्या संपर्क करने वाले के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है, या यह भी हो सकता है कि यह प्रेम का मामला हो। लगता है यह प्रेम के सिवाय और कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं हो सकता। प्रेम ही है जो निराशा की ऐसी स्थिति पैदा कर दे। संपर्क करने की ऐसी जिद के लिए कोई भी और कारण नहीं हो सकता! ज़ाहिर है प्रेमी को छोड़ दिया गया होगा। प्रेमी जानता होगा कि दूसरी ओर उसका प्रिय बैठा है। लेकिन वह रिसीवर उठाने से इंकार कर रहा है। प्रेमी जानता होगा कि उसका प्रिय अपने फ्लैट में अकेला बैठा है।
…और यहाँ मैं अपने फ्लैट में घंटों अकेली बैठी हूँ। जानती हूँ कि मेरे पास मिलाने के लिए कोई नंबर नहीं है। जानती हूँ कि उसके सामने गिड़गिड़ाने का कोई मतलब नहीं है। और उसकी किसी भी शर्त पर झुकने का भी सवाल पैदा नहीं होता। ख़ासकर इसलिए क्योंकि कब्र से संवाद करने का कोई तरीका नहीं है। मेरे लिए हालात बहुत अंधेरे हैं-बहुत अंधेरे! लेकिन क्या सबसे अंधेरे हालात में भी हर कोई आशा की कोई किरण नहीं ढूंढ़ता? क्या फाँसी के तख्ते पर खड़ा आदमी भी यह उम्मीद नहीं करता कि बचे हुए कुछ पलों में कोई चमत्कार उसे बचा लेगा? और क्या इतिहास ऐसे चमत्कारों से भरा नहीं पड़ा है? और मैं तो सच में किसी चमत्कार की उम्मीद भी नहीं कर रही। आख़िर कोई इतनी ठोस चीज़ भला कोई कैसे मांग सकता है। कैसे किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद कर सकता है! लेकिन मुझे कोई छोटा-सा संकेत तो मिल ही सकता है, मिलना ही चाहिए कि वह कब्र के उस पार मेरे इंतज़ार में है। कोई छोटा सा संकेत बस…। इसके बाद मैं और कुछ नहीं मांगूंगी…कुछ भी नहीं। मिसाल के तौर पर, खिड़की के पास वाली छोटी मेज पर फूलदान(जिसमें नकली फूल रखे हैं)अपनी जगह से हट नहीं सकता…। कितना अच्छा हो, मैं नींद से जागकर उसे किताबों की अलमारी के ऊपर पाऊँ? बस मेरे लिए इतना संकेत ही बहुत है। यह माँगना तो बहुत छोटी-सी बात है-ना। अब टेलीफोन की घंटी की कोई आवाज़ नहीं आ रही है। तो क्या कॉल करने वाले ने अपनी नियति स्वीकार कर ली है? या यह भी हो सकता है कि उसने नींद में अस्थायी शांति तलाश कर ली हो?
कितना समय बीत गया है। रात के कालेपन में अब सलेटी लकीरें दिखाई देने लगी हैं। काहिरा में आने वाले कुछ घंटे ही ऐसे होते हैं जब कुछ देर के लिए शांति मिलती है। समय का यह ऐसा टुकड़ा है जब सड़क पर चलने वाली इक्का-दुक्का गाड़ियों को भी हॉर्न बजाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। मैंने खिड़की के बाहर झांककर देखा। हाँ, सड़क पर कुछ बिल्लियाँ हैं, जो शायद खाना तलाश कर रही हैं। ये रात में चैन से खाना तलाशती हैं और दिन में सोकर अपनी नींद पूरी करती हैं। एकदम उलट जीवन।
लेकिन मेरी नींद…। मुझे लगा, जल्द ही फज्र की अज़ान इस सोते हुए शहर पर बादलों की तरह तैरती दिखाई देगी। मेरी बिल्डिंग को तीन तरफ़ से मस्जिदें घेरे हुए हैं। यानी मैं तीनों मस्जिदों से अजानें सुन पाऊँगी। बेशक ये अज़ानें पूरी तरह एक साथ नहीं होंगी, इसलिए जब एक में शहादा (इस्लाम का आस्था-वाक्य, “अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं) पढ़ा जा रहा होगा, दूसरी मुझे बता रही होगी कि ‘नमाज़ नींद से बेहतर है’-ख़ासकर मेरे लिए, जो अपनी रातें जागकर बिताती है। मेरे चारों ओर की रात एक ऐसे सन्नाटे से घिरी हुई है जो यादों की बात करती है-स्मृतियों की बात। पहचान की चीज़ें मुझे उस ज़िन्दगी की ओर ले जाती हैं जो मैंने पूरी तरह जी है। जो, उसकी मौत के साथ, अचानक रुक गई थी। तब से मैं इंतज़ार कर रही हूँ। वरना, मौत के बाद के चालीस दिनों का क्या मतलब है? क्या यह हमें फिरऔन (मिस्र के प्राचीन राजा) की मान्यता है कि चालीस दिनों तक मृतक हमारे आस-पास मंडराते रहते हैं और बाद में कहीं और चले जाते हैं? अगर ‘उसे’ मुझसे संवाद करना है, तो यह निश्चित रूप से इसी अवधि में करना होगा, क्योंकि इसके बाद हम सचमुच दो अलग दुनियाओं में होंगे। जहाँ हम एक-दूसरे से कभी संवाद नहीं कर पाएँगे। मुझे ख़ुद को उस चेहरे और शरीर में हो रहे भयानक बदलावों के बारे में सोचने से रोकना होगा, जिसे मैंने इतना प्यार किया है। मैंने कितनी बार दुआ की थी कि काश मैं पहले मर जाऊँ और उसके बिना ज़िन्दगी जीने के संघर्ष से बच जाऊँ। हमेशा की तरह मैं फज्र की अज़ान का इंतज़ार कर रही हूँ, जिसके बाद मैं अपने कमरे में जाकर कुछ घंटों के लिए सो जाऊँगी। नौकरानी अपनी चाबी से फ्लैट में आएगी, सफाई करेगी, रोजमर्रा की ज़रूरी चीज़ें लाकर फ्रिज में रखेगी, जो पैसे मैं उसके लिए छोड़ती हूँ वो लेगी, और चली जाएगी। फिलहाल जीने का यही एक तरीका है, ज़िंदगी को उलट-पुलट देना, नींद की गोलियों की मदद से उन घंटों में सोना जब ज़िंदगी चल रही होती है, और जब मेरे चारों ओर की दुनिया सो रही हो तब उसके ख्यालों के साथ जागना: ज़िंदगी को उलट-पुलट देना और इस तरह उसके लिए आंशिक रूप से मर जाना। सन्नाटा टेलीफोन की घंटी से एक बार फिर टूटता है।
जब से उसकी मृत्यु हुई है, टेलीफोन चुप है, टेलीफोन भी चुप है। दिन में नौकरानी फोन उठाती है और कॉल करने वाले को बताती है कि उसकी मालकिन उपलब्ध नहीं हैं और कोई कॉल नहीं चाहतीं। लेकिन इस पहर कौन फोन करेगा? जैसे ही शोर मेरे कानों में चुभा, मुझे अचानक कॉल का महत्व समझ आ गया। नहीं, दूसरी ओर उसकी आवाज़ नहीं होगी; चीज़ें इतनी सीधी नहीं होतीं। मुझे ठीक-ठीक पता था कि क्या होगा। मैं छोटी मेज की ओर बढ़ी, वही मेज जिसे हमने साथ खरीदा था, और स्थिर हाथ से रिसीवर उठाकर कान से लगाया। जैसा मैंने सोचा था, किसी आवाज़ ने खामोशी नहीं तोड़ी। मैंने उसे कान के और पास लगाया, यह सोचकर कि शायद उसकी साँसों की आवाज़ आए, लेकिन मैंने ख़ुद से कहा कि ऐसा भी नहीं होगा। जो हो रहा था उसके लिए मेरी ओर से बहुत गहरे विश्वास की ज़रूरत थी। जीवन और मृत्यु दोनों ही आस्था का मामला थे। जैसे ही मैंने रिसीवर को कान से सटाकर पकड़ा, ऐसा लगा मानो, सूफी छवि की तरह जहाँ पानी अपने पात्र का रंग ले लेता है, मैं काली निराशा के पात्र से उजली आशा और भरोसे के पात्र में उँडेली जा रही हूँ। और इस तरह मैं शायद मिनटों या घंटों तक बिना आवाज़ वाले रिसीवर को कान से लगाए बैठी रही। ऐसी हालत में समय का क्या मोल? फिर, अचानक, वह तिलिस्म टूटा और लाइन कट गई। मैं अपनी तंद्रा से जागी और कमरे में रिसती हुई फज्र की अज़ान के पहले शब्द सुने। मैं उठी और वुज़ू किया, फिर बैठक में लौटी, अपनी नमाज़ की दरी बिछाई और फज्र की नमाज़ अदा की। जैसे ही मैं तस्बीह (अल्लाह की महिमा का गुणगान करते समय हाथ में ली जाने वाली माला) लेकर बैठी, मैंने ख़ुद को संतोष और कृतज्ञता की चादर में लिपटा हुआ महसूस किया। मैं निश्चित रूप से जानती थी कि सब ठीक है। सब कुछ ठीक है। चारों ओर फैला सन्नाटा फिर से टेलीफोन की घंटी से टूट गया, पहली बार से भी ज़्यादा तेज़ और आग्रही। मैंने मन ही मन चाहा कि यह थम जाए, क्योंकि मुझे इसे उठाने में एक सहज हिचकिचाहट महसूस हुई। इतनी देर तक तस्बीह के साथ बैठने से मेरे पैर अकड़ गए थे और जब मैं कमरे के पार टेलीफोन तक गई तो थकान से काँप रहे थे। डरते-डरते मैंने रिसीवर उठाया और ऑपरेटर की आवाज़ ने तुरंत मेरा अभिवादन किया: ‘गुड मॉर्निंग, मैडम। कुछ देर पहले आपको जो कॉल आई थी उसके लिए मुझे ख़ेद है…’
कुछ मिनट पहले। यह विदेश से आई एक कॉल थी और ग़लती से आपसे जोड़ दी गई थी। इस वक्त आपको जगाने के लिए हम माफ़ी चाहते हैं।’ ‘कोई बात नहीं,’ मैंने कहा और रिसीवर रख दिया। मैं वापस गई और फिर से नमाज़ की दरी पर बैठ गई। तस्बीह मेरी उँगलियों में फिसल रही थी और मेरा हाथ काँप रहा था, और मैं लगातार ख़ुदा से माफी माँगती रही। अब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मैंने उससे क्या माँग लिया था और अपनी सादगी में मैंने सोच लिया था कि उसने मुझे दे दिया: परलोक से एक संकेत! तब मुझे याद आया कि जब पैगंबर, जिन पर अल्लाह की रहमत और सलाम हो, का इंतकाल हुआ था, तो मुसलमान इस ख़बर से घबराहट और अविश्वास में डूब गए थे और अबू बक्र ने उनसे कहा था: ‘तुममें से जो मुहम्मद की इबादत करते थे, मुहम्मद मर चुके हैं; और जो अल्लाह की इबादत करते हैं, अल्लाह ज़िंदा है और कभी नहीं मरता(यह इस्लाम का एक सूत्र वाक्य है)।’ हालाँकि आँसू मेरे गालों पर बह रहे थे, आख़िरकार मैंने ख़ुदा के तय किए हुए फ़ैसले के आगे झुककर अपने आप से सुलह महसूस की।
(कहानी अलीफा रिफ़ात की है जिसका अनुवाद सुधांशु गुप्त ने किया है।)
ये भी पढ़ेंः कहानीः रेगिस्तान के हिमालय की पार्वती

