कहते हैं कि एक पिता का प्यार नारियल की तरह होता है- ऊपर से सख्त, भीतर से बेहद नरम। भारतीय समाज में पिता अक्सर अपनी भावनाओं को खुलकर जाहिर नहीं कर पाते; वे अनुशासन के पीछे अपना अनुराग और जिम्मेदारियों के बोझ तले अपना सारा संताप छुपा लेते हैं। आज ‘फादर्स डे’ के इस खास मौके पर आइए भारतीय सिनेमा के उस सफरनामे पर नजर डालते हैं, जिसने समय के साथ पिता और बच्चों के बदलते, उलझते और गहरे होते रिश्तों को बेहद संजीदगी से बड़े पर्दे पर उतारा है।
जब कड़वाहट और नोकझोंक ही बन गई अटूट प्रेम की परिभाषा
पीकू (2015): आधुनिक सिनेमा ने पिता-पुत्र और पिता-बेटी के रिश्तों को आदर्शवादी ढर्रे से बाहर निकालकर असल जिंदगी के करीब लाने का काम किया है. इस बदलाव का सबसे बेहतरीन उदाहरण शूजीत सरकार की यह फिल्म है. यह कहानी है एक अड़ियल, जिद्दी, खुद को हमेशा बीमार समझने वाले बुजुर्ग पिता भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) और उनकी कामकाजी, आत्मनिर्भर बेटी पीकू (दीपिका पादुकोण) की. फिल्म की खूबसूरती इस बात में है कि पीकू की अपने पिता के प्रति झुंझलाहट और रोज-रोज की तीखी नोकझोंक के पीछे कोई शिकायत नहीं, बल्कि अगाध प्रेम है. यहाँ बेटी को अपने प्यार को साबित करने के लिए विनम्रता का मुखौटा नहीं पहनना पड़ता, बल्कि उनका आपसी झगड़ा ही उनके गहरे जुड़ाव की गवाही देता है।
कपूर एंड संस (2016): पिता-पुत्र के रिश्तों के उलझे और परिपक्व पहलुओं को इस फिल्म में बेहद संजीदगी से दिखाया गया है। यहाँ पिता कोई भगवान नहीं, बल्कि कमियों से भरा एक साधारण इंसान है। जब बेटे को अपने पिता के किसी अन्य महिला के साथ चल रहे अफेयर का पता चलता है, तो वह गुस्से में उनसे टकराता है। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि माता-पिता भी आखिरकार इंसान हैं और अपनी तमाम खामियों के बावजूद वे अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ते।
वेक अप सिड (2009): यह एक सफल कारोबारी पिता और उसके लापरवाह, भटके हुए बेटे की कहानी है। पिता को लगता है कि उसका बेटा किसी काम का नहीं है, लेकिन जब एक संजीदा बातचीत के बाद पिता को अपने बेटे के फोटोग्राफी के हुनर का पता चलता है, तो वह उसे नम आंखों से गले लगा लेता है। यह फिल्म पीढ़ीगत फासलों को पाटने का एक खूबसूरत जरिया बनती है।
बच्चों के सपनों के लिए अपनी दुनिया उलट देने वाले पिता
दंगल (2016): इसे आप एक स्पोर्ट ड्रामा कह सकते हैं, लेकिन यह एक ऐसे पिता की कहानी कहती है जो अपनी बेटियों के लिए समाज की रूढ़ियों और सिस्टम से लड़ जाता है। फिल्म में महावीर सिंह फोगाट (आमिर खान) रूढ़िवादी ताने-बाने को तोड़कर अपनी बेटियों गीता और बबीता को विश्व स्तरीय पहलवान बनाने का सपना देखता है। फिल्म का एक दृश्य इस रिश्ते की पूरी आत्मा को बयां करता है, जब दोनों बेटियां एक सहेली से अपने पिता की सख्ती की शिकायत करती हैं, और वह सहेली (जिसकी कम उम्र में शादी हो रही है) कहती है कि ‘काश मुझे भी ऐसा पिता मिला होता, जो मुझे चूल्हे-चौके से अलग कुछ बनाने की सोचता।’ महावीर सिंह फोगाट के तरीके भले ही कठोर थे, लेकिन उनकी यही जिद बेटियों के लिए सफलता का रास्ता खोलती है।
अंग्रेजी मीडियम (2020): इसी कड़ी में दिवंगत अभिनेता इरफान खान की यह फिल्म पिता के प्यार का एक बेहद कोमल और भावुक चेहरा सामने लाती है। अपनी बेटी को विदेश में पढ़ाने के सपने को पूरा करने के लिए एक अदना सा पिता पूरी दुनिया से टकरा जाता है। वह पढ़ा-लिखा नहीं है, उसे दुनियादारी के सारे जवाब नहीं पता, वह गलतियां करता है, लेकिन अपनी बेटी की खुशी के लिए वह अपनी पूरी दुनिया को उलट-पुलट करने से भी पीछे नहीं हटता।
गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल (2020): यह फिल्म यह दिखाती है कि जब पूरी दुनिया एक बेटी की काबिलियत पर शक करती है, तब एक पिता का मूक समर्थन उसे आसमान छूने के पंख दे देता है। विपरीत परिस्थितियों में भी पिता का अपनी बेटी के हुनर पर अटूट विश्वास इस फिल्म की असली जान है।
थप्पड (2020): अनुभव सिन्हा की इस फिल्म में मुख्य विषय वैसे तो महिला के आत्मसम्मान का है, लेकिन उस पूरी लड़ाई में बैकग्राउंड में खड़ा पिता अपनी बेटी के हर फैसले का सम्मान करते हुए उसकी मूक ताकत बनकर उभरता है। वह समाज की परवाह किए बिना अपनी बेटी को गरिमा से जीने का हौसला देता है।
गलतियां, गिल्ट और…
मासूम (1983): शेखर कपूर की यह क्लासिक फिल्म एक ऐसे पिता की कहानी है, जिसे अचानक पता चलता है कि पिछली जिंदगी की एक भूल के कारण उसका एक बेटा भी है। एक अवांछित बच्चे को स्वीकार करने और अपने वर्तमान परिवार को बिखरने से बचाने के बीच झूलते पिता की यह दास्तान आज भी दर्शकों का दिल छू लेती है।
ये है जलवा (2002): यही तड़प निर्देशक अनीस बज्मी की इस फिल्म में भी दिखती है, जहाँ शादी के बाहर जन्मा एक बेटा अपने पिता के गौरव को ठेस पहुंचाए बिना सिर्फ उसका नाम और प्यार पाने के लिए जद्दोजहद करता है। अंत में पिता द्वारा उसे स्वीकार करना फिल्म का सबसे भावुक क्षण है।
दृश्यम (2015): रचनात्मकता से परे, थ्रिलर शैली में बनी यह फिल्म पिता के सुरक्षात्मक रूप की एक चरम सीमा को प्रदर्शित करती है। यहाँ विजय सालगॉंवकर (अजय देवगन) का अपनी बेटी के साथ कोई पारंपरिक भावनात्मक ड्रामा नहीं है, बल्कि यह एक साधारण, कम पढ़े-लिखे पिता की वह असाधारण कहानी है जो अपनी बेटी को एक खौफनाक हादसे के बाद कानून और व्यवस्था के शिकंजे से बचाने के लिए पूरी दुनिया के खिलाफ एक अभेद्य चक्रव्यूह रच देता है।
एनिमल (2023): हालिया दौर की यह फिल्म पिता-पुत्र के रिश्ते के एक डार्क और जुनून से भरे रूप को दिखाती है, जहाँ बचपन में पिता का पर्याप्त ध्यान न मिल पाने के कारण एक बेटा इस कदर अशांत हो जाता है कि वह बड़ा होकर अपने पिता की जान के दुश्मनों से बदला लेने के लिए किसी भी हद तक गिरने को तैयार हो जाता है।
तनाव, अलगाव और फिर से गले मिलने का सफर
उड़ान (2010): भारतीय सिनेमा ने पिता-पुत्र के बीच के वैचारिक मतभेदों और उसके कारण पैदा होने वाले तनावों को भी बखूबी दिखाया है। विक्रम आदित्य मोटवाने की यह फिल्म इसका सबसे सटीक और कड़वा उदाहरण है। यह एक सख्त, अनुशासन के नाम पर प्रताड़ित करने वाले पिता (रोनित रॉय) और एक कवि बनने की चाहत रखने वाले किशोर बेटे (रजत बरमेचा) के बीच के दमघोंटू माहौल की कहानी है।
तारे जमीं पर (2007): इस फिल्म के पिता अपने बेटे से नफरत नहीं करते, बल्कि उसकी कमियों से अनजान होकर उस पर लगातार बेहतर करने का दबाव बनाते हैं। लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि उनका बेटा ‘डिस्लेक्सिया’ नाम की बीमारी से पीड़ित है, तो ग्लानि और आंसुओं से भरा उनका पश्चाताप हर माता-पिता की आंखें खोल देता है।
राजमा चावल (2018): ऋषि कपूर स्टारर यह एक बेहद मर्मस्पर्शी और आधुनिक फिल्म है, जिसमें नई पीढ़ी की तकनीक के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश दिखाई गई है। इसमें एक पिता अपने दूर हो चुके बेटे से संवाद स्थापित करने और उसकी जिंदगी में दोबारा शामिल होने के लिए सोशल मीडिया पर एक लड़की की फर्जी आईडी तक बना लेता है।
कभी खुशी कभी गम (2001): करण जौहर की यह ब्लॉकबस्टर फिल्म पिता-पुत्र के बीच के उस स्वाभिमान और मूल्यों की कहानी है, जहाँ पिता अपने आदर्शों के कारण बेटे को खुद से दूर तो कर देता है। लेकिन दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति सम्मान हमेशा बना रहता है। छोटा बेटा इस बिखरे परिवार को जोड़ने में अहम भूमिका निभाता है।
वक्त: द रेस अगेंस्ट टाइम (2005): यश चोपड़ा की परंपरा को आगे बढ़ाती यह फिल्म पिता के उस कठिन फैसले को दर्शाती है, जहाँ वह अपने गैर-जिम्मेदार बेटे को जिंदगी के कड़वे सबक सिखाने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए खुद से दूर और क्रूर होने का नाटक करता है।
आ अब लौट चलें (1999): इसमें अमेरिकी चकाचौंध में अपने परिवार को भूल चुके पिता (राजेश खन्ना) को जब वर्षों बाद अपने बेटे (अक्षय खन्ना) का अहसास होता है, तो भारतीय मूल्यों, संस्कृति और पश्चाताप का एक बेहद भावुक दृश्य सामने आता है।
अपने (2007): यह फिल्म एक पूर्व-बॉक्सर पिता (धर्मेंद्र) के अधूरे सपनों को पूरा करने की उनके बेटों की जद्दोजहद है। पिता पर लगे डोपिंग के गलत आरोपों का बदला लेने और खोया सम्मान वापस पाने के लिए बेटा अपनी जान की परवाह किए बिना रिंग में उतरता है।
छिछोरे (2019): यह फिल्म न केवल एक पिता और बेटे के रिश्ते को दिखाती है, बल्कि विफलता से लड़ने का हौसला भी देती है। अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी की जंग लड़ रहे अपने बेटे को अवसाद से बाहर निकालने के लिए एक पिता अपने कॉलेज के दिनों की नाकामियों और सफलताओं की कहानी सुनाता है।
एकल पिता का संघर्ष
कुछ कुछ होता है (1998): एक अकेले पिता (Single Father) के रूप में बच्चों की परवरिश करना कितना चुनौतीपूर्ण है, इसे राहुल (शाहरुख खान) के किरदार के जरिए दिखाया गया है, जो अपनी छोटी सी बेटी अंजलि की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल किसी माँ की तरह और बेहद प्यारे अंदाज में रखता है।
अकेले हम अकेले तुम (1995): आमिर खान और मास्टर आदिल की यह फिल्म भी इसी थीम पर है, जहाँ पत्नी के चले जाने के बाद एक पिता तमाम आर्थिक तंगहाली और सामाजिक दबावों के बावजूद अपने बेटे का सबसे अच्छा दोस्त, माँ और मार्गदर्शक बनता है।
जर्सी (2019): यह तेलुगु सिनेमा की एक और ऐसी बेजोड़ फिल्म है, जहाँ एक असफल और उम्रदराज क्रिकेटर सिर्फ इसलिए दोबारा मैदान पर उतरकर अपनी जान दांव पर लगा देता है, क्योंकि वह अपने सात साल के बेटे की नजरों में एक ‘लूजर’ बनकर नहीं जीना चाहता। वह अपने बेटे को उसकी पसंदीदा जर्सी उपहार में देने के लिए किसी भी हद तक चला जाता है।
चंडीगढ़ करे आशिकी (2021): यह आधुनिक फिल्म एक बेहद संवेदनशील और साहसिक मोड़ लेती है। जहाँ समाज और खुद माँ अपनी ट्रांसजेंडर बेटी को स्वीकार करने से मना कर देती है, लेकिन पिता मोहिंदर बिना किसी हिचकिचाहट या लंबे चौड़े भाषण के अपनी बेटी का हाथ थामकर रूढ़ियों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।
बागबान (2003): यह मर्मस्पर्शी फिल्म हमें यह सिखाती है कि खून के रिश्ते और सगे बच्चे भले ही वक्त आने पर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लें, लेकिन एक गोद लिया हुआ बेटा (सलमान खान) अपने पिता के सम्मान और स्वाभिमान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को हमेशा तैयार रहता है।



