अभी बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में भारत भूषण तिवारी को पुलिस के फुल एनकाउंटर का शिकार होना पड़ा। 17 जून की इस घटना की जांच के लिए बिहार विधि आयोग के अध्यक्ष विनोद कुमार सिन्हा को नियुक्त किया गया है। यह अपेक्षा व्यक्त की गई है कि आयोग छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देगा।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा है कि भारत को पांच गोलियां मारी गई थीं। भोजपुर जिला पुलिस दावा कर रही है कि उसके किसी अधिकारी ने गोली नहीं चलाई और न ही किसी मजिस्ट्रेट का ऐसा कोई आदेश था। वहीं, स्पेशल टास्क फोर्स (STF) का भी कहना है कि उसके किसी जवान ने गोली नहीं चलाई।
इसी बीच, न्यायालय के आदेश पर पुलिस ने तीन पिस्टल जब्त कर लिए हैं। इनमें एक भारत का, एक शाहपुर थाना प्रभारी का और एक एसटीएफ का हथियार शामिल है।
बिहार में जब से सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने हैं, तब से विभिन्न स्थानों पर 28 हाफ एनकाउंटर हुए हैं। यह पहला फुल एनकाउंटर बताया जा रहा है। पहले के हाफ एनकाउंटर में स्थानीय समाचारों में अपराधी को लंगड़ा बनाकर दो सिपाहियों के सहारे ले जाते हुए दिखाया जाता था। इस बार ऐसा नहीं हुआ।
कुछ इससे भी अधिक भयावह एनकाउंटर कश्मीर के अनंतनाग जिले के पथरीबल गांव में 25 मार्च, 2000 को हुआ था। उस समय पांच स्थानीय लोगों को विदेशी आतंकवादी बताकर राष्ट्रीय राइफल्स ने मार दिया था और उन्हें दफना भी दिया गया था। उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने पास के गांव छुट्टीसिंहपोरा में 20 मार्च, 2000 को सिख समुदाय के 35 लोगों की हत्या की थी।
इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश फैल गया और उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग भी जाम कर दिया। जब आंदोलन हिंसक होने लगा, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने 17 अप्रैल को न्यायिक जांच की घोषणा की और सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एस. आर. पांडियन को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया।
जस्टिस पांडियन ने 7 जून से आयोग की कार्यवाही शुरू की। आयोग का कार्यालय मौलाना आजाद रोड स्थित एक सरकारी भवन में खोला गया। आयोग के अध्यक्ष को आईटीबीपी की सुरक्षा में डल झील के सामने स्थित ललित होटल में ठहराया गया।
आयोग ने अनंतनाग के एसपी, डीआईजी के अलावा सीआरपीएफ के अधिकारियों को भी गवाही के लिए बुलाया। राष्ट्रीय राइफल्स के अधिकारी भी अपनी बारी आने पर आयोग के सामने पेश हुए। आयोग का कैंप पहलगाम के सर्किट हाउस में भी लगाया गया, जहां स्थानीय लोगों और मारे गए लोगों के परिजनों के बयान दर्ज किए गए।
श्रीमती रोशन जान ने आयोग को बताया कि उनके पति जुमा खान का भी अपहरण कर लिया गया था। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी अब्दुल वहीद के आदेश पर कब्र की खुदाई कराई गई, जिसमें उन्होंने जुमा खान के शव की पहचान की।
राष्ट्रीय राइफल्स (7) के कर्नल अजय सक्सेना, लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रजेंद्र प्रताप सिंह, लेफ्टिनेंट सोमनाथ शर्मा, लेफ्टिनेंट अमित सक्सेना और एक सूबेदार ने आयोग के सामने कहा कि वे उस समय वहां ड्यूटी पर नहीं थे तथा पांच स्थानीय ग्रामीणों की हत्या में उनका कोई हाथ नहीं था।
आयोग के अध्यक्ष के समक्ष मार्च 2000 में राष्ट्रीय राइफल्स द्वारा उनकी आधिकारिक मुहर के साथ जारी एक प्रेस विज्ञप्ति भी प्रस्तुत की गई। उसमें इन्हीं अधिकारियों ने दावा किया था कि उन्होंने उन पांच विदेशी आतंकवादियों को मार गिराया, जिन्होंने सिख समुदाय के 35 लोगों की हत्या की थी।
आयोग ने अक्टूबर 2000 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी और अनुशंसा की कि संबंधित अधिकारियों को “एक्जेम्प्लरी पनिशमेंट” दी जाए। मामला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत से होते हुए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। अधिकार क्षेत्र के सवाल पर यह मामला 13 वर्षों तक लंबित रहा। अंततः सेना के न्यायालय ने दावा किया कि इस मामले पर सुनवाई का अधिकार केवल उसके पास है।
जस्टिस पांडियन ने कांचीपुरम की साड़ियां, एचएमटी की घड़ियां, नकद राशि, अपनी सुरक्षा में तैनात 32 जवानों, पथरीबल की पीड़ित महिलाओं और अपने ड्राइवर को भेंट कर दी। उनका कहना था, “मेरी श्रीमती का आदेश है कि कश्मीर का एक भी पैसा कन्याकुमारी नहीं लाना है।”

