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ईस्ट इंडिया कंपनी दिवालिया हुई, 1857 के बाद फिर से बंद

ईस्ट इंडिया कंपनी दिवालिया हो गई है। 1857 में बंद होने के बाद 2010 में इसके नाम के अधिकार संजीव मेहता ने खरीदे थे।

east india company shuts down again after 1857, ईस्ट इंडिया कंपनी
फोटोः सोशल मीडिया

भारत के बड़े हिस्से पर शासन करने वाली कंपनी ईस्ट इंडिया एक बार फिर से बंद हो गई है। ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही देश में ब्रिटिश उपनिवेशीकरण की शुरुआत की थी। गौरतलब है कि मूल ईस्ट इंडिया कंपनी 1857 में निष्क्रिय हो गई थी। हालांकि 2010 में एक ब्रिटिश-भारतीय व्यवसायी ने इसके नाम के अधिकार खरीदे और इसे पुनर्जीवित किया। कंपनी दिवालिया हो गई। ऐसे में इसका वह प्रोजेक्ट भी समाप्त हो गया है।

1857 के भारतीय विद्रोह (जिसे सिपाही विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है) के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन ब्रिटिश सरकार के हाथ में चला गया। 1858 में ब्रिटिश क्राउन ने इस पर नियंत्रण कर लिया जिससे भारत में प्रत्यक्ष ब्रिटिश राज की शुरुआत हुई।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत समेत एशियाई देशों का किया शोषण

ईस्ट इंडिया कंपनी की विरासत को ज्यादातर नकारात्मक रूप में देखा जाता है, क्योंकि इसने भारत और शेष एशिया में बड़े पैमाने पर शोषण किया। इसने वैश्विक व्यापार को बदल दिया लेकिन हिंसा और बंगाल के भीषण अकाल के माध्यम से भारतीयों को भारी पीड़ा पहुंचाई, जिसमें 30 लाख लोग मारे गए।

जब भारतीय उद्यमी संजीव मेहता ने 2010 में ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम के अधिकार खरीदे तो इसे उपनिवेशितों का बदला माना गया। भारत पर शासन करने वाली कंपनी का अब एक भारतीय द्वारा शासित होना दुनिया भर की सुर्खियों में छा गया। हालांकि कंपनी का आधुनिक संस्करण परिसमापन में चला गया है।

द संडे टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईस्ट इंडिया कंपनी लिमिटेड ने अक्टूबर 2025 में परिसमापक नियुक्त किए थे। ब्रिटिश अखबार के मुताबिक कंपनी पर ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स में पंजीकृत अपने मूल समूह का 600,000 पाउंड (6.3 करोड़ रुपये) से अधिक, करों का 193,789 पाउंड (2.03 करोड़ रुपये) और कर्मचारियों का 163,105 पाउंड (1.71 करोड़ रुपये) बकाया था। अखबार ने यह भी बताया कि मालिक संजीव मेहता से जुड़ी “ईस्ट इंडिया” नाम वाली कई संबंधित कंपनियों को भी भंग कर दिया गया है।

कंपनी की वेबसाइट ठप्प, ऑफिस खाली

कंपनी की वेबसाइट ठप्प हो गई है। लंदन के मेफेयर में स्थित 97 न्यू बॉन्ड स्ट्रीट पर उसका कार्यालय कथित तौर पर खाली है और एजेंटों के माध्यम से किराए पर उपलब्ध है। एक अन्य संबद्ध कंपनी, ईस्ट इंडिया कंपनी कलेक्शंस लिमिटेड को भी हाल ही में लेनदारों द्वारा परिसमापन याचिका का सामना करना पड़ा है।

इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक, संजीव मेहता ने 2000 के दशक की शुरुआत में उन शेयरधारकों से ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की, जिन्होंने इसे थोक व्यापार के रूप में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया था। 2010 में उन्होंने मेफेयर में 2,000 वर्ग फुट का एक आलीशान स्टोर खोला। इसमें फोर्टनम एंड मेसन जैसी प्रसिद्ध दुकानों की तरह ही उच्च गुणवत्ता वाली चाय, चॉकलेट, मिठाई, मसाले और अन्य वस्तुएं बेची जाती थीं।

मेहता ने इसे उपनिवेशवाद के प्रतीक को सकारात्मक रूप में बदलने के रूप में देखा। 2017 में द गार्जियन को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा: “यह तथ्य कि अब एक भारतीय ईस्ट इंडिया कंपनी का मालिक है, इसका मतलब है कि नकारात्मक चीज़ सकारात्मक में बदल गई है। ऐतिहासिक ईस्ट इंडिया कंपनी ने आक्रामकता के आधार पर अपना निर्माण किया था, लेकिन आज की ईस्ट इंडिया कंपनी करुणा पर आधारित है।”

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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