अच्छी कविता की एक पहचान यह भी है कि वह समय के साथ और अधिक अर्थवान होती जाती है। उसकी प्रासंगिकता घटती नहीं, बढ़ती जाती है। वक्त बदलने के बावजूद समाज का एक बड़ा वर्ग उससे तादात्म्य महसूस करता रहता है। कई पीढ़ियां उसे अपना समकालीन मानती हैं। सुदामा पांडे ‘धूमिल’ की लंबी कविता ‘पटकथा’ ऐसी ही रचना है। पिछले रविवार, 24 मई 2026 को दिल्ली के एलटीजी सभागार में वरिष्ठ अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने निर्देशक आर.एस. विकल के संयोजन में जब इसे मंच पर प्रस्तुत किया, तो दर्शकों को बार-बार लगा कि यह कविता सिर्फ अपने समय की नहीं, हमारे आज की भी कविता है।
‘पटकथा’ मूलतः एक नाटकीय कविता है। उसे पढ़ते हुए यह लगता है कि हम केवल शब्द नहीं पढ़ रहे, बल्कि दृश्य भी देख रहे हैं। लेकिन कविता में नाटकीयता होना और उसे मंच पर एक प्रभावी रंग-अनुभव में बदल देना, दोनों दो अलग बातें हैं। इसमें सबसे बड़ी चुनौती तो यही होती है कि प्रस्तुति केवल प्रभावशाली पाठ बनकर न रह जाए, बल्कि रंगमंचीय अनुभव में रूपांतरित हो सके।
राजेंद्र गुप्ता नाट्यपाठ के एक तरह से आचार्य माने जाते हैं। पिछले कई वर्षों से वे सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक पर, अपनी प्रिय कविताओं का वाचन करते रहे हैं और इस माध्यम से उन्होंने हिंदी कविता के सहृदयों का एक बड़ा समुदाय निर्मित किया है। जो लोग समकालीन कविता पर यह आरोप लगाते हैं कि वह समझ में नहीं आती, उन्हें राजेंद्र गुप्ता के इन पाठों को सुनना चाहिए।
वे कविता के भीतर छिपे अर्थ-संगीत को खोल देते हैं।
‘पटकथा’ का पाठ वे पहले भी कर चुके थे, लेकिन इस बार मंच पर उसका नाट्यरूप देखने की उत्सुकता अलग थी। राजेंद्र गुप्ता राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रशिक्षित अभिनेता हैं और फिल्मों-टेलीविजन के चर्चित चेहरे भी। लेकिन कविता के प्रति उनका लगाव पुराना और गहरा है।
यहीं प्रवेश होता है आर.एस. विकल का, जिनका पूरा नाम ऋषिपाल सिंह विकल है। विकल लंबे समय से एक गंभीर और प्रतिबद्ध रंगनिर्देशक के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। पहले वे दिल्ली में अधिक सक्रिय थे, हालांकि अब मुंबई में रहते हैं। उन्होंने फिल्में भी बनाई हैं, लेकिन रंगमंच से उनका रिश्ता कभी टूटा नहीं। वे लगातार नाटक करते और लिखते रहे हैं। ऐसे समय में, जब वैचारिक प्रतिबद्धता पर तरह-तरह के दबाव और प्रलोभन मौजूद हैं, विकल का अपने रास्ते पर बने रहना महत्वपूर्ण लगता है। धूमिल के वैचारिक संसार से उनकी निकटता इस प्रस्तुति में साफ दिखाई देती है।
राजेंद्र गुप्ता की अभिनय क्षमता और विकल की निर्देशकीय दृष्टि के मेल ने ‘पटकथा’ को दर्शकों, काव्यप्रेमियों और रंगकर्मियों के लिए एक विलक्षण अनुभव बना दिया। नियंत्रित लेकिन लोचपूर्ण आवाज, सूक्ष्म आंगिक चेष्टाओं और ठहरावों के सहारे राजेंद्र गुप्ता ने कविता के शब्दों से एक ऐसी ध्वनि रची जिसकी प्रतिध्वनि देर तक सभागार में बनी रहती है। आदित्य शर्मा का संगीत प्रस्तुति के भाव-संसार को और गहरा करता है। मंच-सज्जा न्यूनतम थी। एक छोटा-सा पैनल, जिसमें केसरिया, हरा और श्वेत रंग थे। तिरंगे का आभास देने वाले ये रंग प्रकाश-योजना के साथ बदलते भी रहते थे, मानो राष्ट्र का अर्थ और उसका मनोविज्ञान दोनों लगातार रूपांतरित हो रहे हों।
राजेंद्र गुप्ता स्वयं एक चोगानुमा परिधान में थे। उनकी वेशभूषा एक ऐसे भारतीय की प्रतीति कराती थी, जिसने लंबा समय देखा है और अब अपने ही देश को एक बेचैन निगाह से देख रहा है। बीच-बीच में वे मानो स्वयं ‘हिंदुस्तान’ का रूप धारण कर लेते थे। एक ऐसा हिंदुस्तान, जो अपने समय से घायल है और खुद से पूछ रहा है- ‘यह कहां आ गए हम?’
यहीं से धूमिल की कविता का वह संसार खुलता है, जो आज भी विचलित करता है। धूमिल हिंदी कविता के सातवें-आठवें दशक में एक विस्फोटक उपस्थिति की तरह सामने आए थे। वह समय भारतीय राजनीति और समाज में गहरे संक्रमण का समय था। जवाहरलाल नेहरू का निधन हो चुका था और नेहरूयुगीन स्वप्नों पर प्रश्नचिह्न लगने लगे थे। इसे कई लोगों ने ‘मोहभंग का दौर’ कहा। भारत में नक्सलबाड़ी आंदोलन उभर रहा था और साहित्य में ‘अकविता’ का तेवर दिखाई दे रहा था।

धूमिल की काव्यभाषा पर अकविता का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। इसी कारण उनकी भाषा पर मर्दवादी और सेक्सिस्ट होने के आरोप भी लगे। लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही सच है कि धूमिल हिंदी कविता में एक बड़े विस्फोट की तरह आए। उनकी कविताएं जितनी सराही गईं, उनकी भाषा उतनी ही विवादों में रही। समय बीतने के साथ भाषा का बाहरी आवेग पीछे छूट जाता है और काव्य-सत्य अधिक उज्ज्वल होकर सामने आता है। धूमिल की भाषा गुस्से, आरोप और असहमति की भाषा है। लेकिन उसके भीतर अपने समय की राजनीतिक और सामाजिक विकृतियों को पहचानने की बेचैनी भी है। भाषाई मुखौटों को हटाकर देखें तो धूमिल अपने दौर के भीतर पनप रहे उस अंधेरे को पहचान रहे थे, जो आगे चलकर और गहरा होने वाला था।
जब भारत में संसदीय राजनीति का सम्मान काफी हद तक सुरक्षित था, तभी धूमिल ने लिख दिया था-
‘मेरे देश की संसद मौन है।’
जब यह पंक्ति लिखी गई थी, तब संसद प्रत्यक्षतः मौन नहीं थी। वहां बहसें होती थीं, सरकार से सवाल पूछे जाते थे, प्रधानमंत्री तक को कठघरे में खड़ा किया जाता था। लेकिन आज हमारी संसदीय राजनीति किस मोड़ पर खड़ी है? यह सवाल केवल राजनीतिक नहीं है; यह लोकतंत्र के नैतिक स्वास्थ्य का सवाल है। धूमिल इसी सवाल को बहुत पहले उठा रहे थे।
‘पटकथा’ में वे लिखते हैं-
‘दरअसल, अपने यहां जनतंत्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।
हर तरफ धुआं है,
हर तरफ कुहासा है।
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है।’
जब ये पंक्तियां लिखी गई थीं, तब कुछ आलोचकों ने इसे अतिरेक कहा था। पूछा गया था कि कवि को इस तरह का मूल्य-निर्णय देने का अधिकार किसने दिया। लेकिन समय बार-बार यह साबित करता है कि बड़े कवि अपने समय से आगे देख लेते हैं।
दरअसल, एक बड़ा लेखक अपने भीतर भविष्यवक्ता का गुण भी रखता है। धूमिल भी ऐसे ही कवि थे। उनसे पहले गजानन माधव मुक्तिबोध ने ‘अंधेरे में’ के जरिए भारतीय समाज और राजनीति के भीतर बढ़ते अंधकार को पहचान लिया था। ‘पटकथा’ उसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण विस्तार है।
धूमिल इस हिंदुस्तान की तस्वीर कुछ इस तरह खींचते हैं—
‘मैंने देखा कि हर तरफ
मूढ़ता की हरी-भरी घास लहरा रही है
जिसे कुछ जंगली पशु
खूंद रहे हैं,
लीद रहे हैं,
चर रहे हैं…
मैंने ऊब और गुस्से को
गलत मुहरों के नीचे से गुजरते हुए देखा।
मैंने अहिंसा को
एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुए देखा।
मैंने ईमानदारी को अपनी चोर जेबें भरते हुए देखा।
मैंने विवेक को
चापलूसों के तलवे चाटते हुए देखा…’
और फिर कविता एक भयावह दृश्य में बदल जाती है-
‘मैं यह सब देख ही रहा था कि
एक नया रेला आया-
उन्मत्त लोगों का एक बर्बर जुलूस।
वे किसी आदमी को
हाथों पर गठरी की तरह उछाल रहे थे,
उसे एक-दूसरे से छीन रहे थे,
उसे घसीट रहे थे,
चूम रहे थे,
पीट रहे थे,
गालियां दे रहे थे,
गले से लगा रहे थे,
उसकी प्रशंसा के गीत गा रहे थे,
उस पर अनगिनत झंडे फहरा रहे थे।
उसकी जीभ लटक रही थी,
उसकी आंखें बंद थीं,
उसका चेहरा खून और आंसुओं से तर था…’
क्या यह सिर्फ धूमिल के समय का हिंदुस्तान है?
या यह आज का भी हिंदुस्तान है?
या फिर यह वह भारत है, जो अपने इतिहास के कई मोड़ों पर बार-बार इसी त्रासदी से गुजरता रहा है?
यह प्रस्तुति कहीं-न-कहीं भारत की स्वतंत्रता के क्षण और जवाहरलाल नेहरू के ‘नियति से मुठभेड़’ वाले ऐतिहासिक भाषण की स्मृति भी जगाता है। तब जो स्वप्न देखे गए थे, क्या उनका यही हश्र होना था? क्या लोकतंत्र अंततः उसी तमाशे में बदल जाना था, जिसकी आहट धूमिल ने बहुत पहले सुन ली थी?
यही वजह है कि ‘पटकथा’ केवल एक कविता नहीं रह जाती; वह हमारे समय का आईना बन जाती है। और राजेंद्र गुप्ता तथा आर.एस. विकल की यह प्रस्तुति उस आईने को हमारे सामने और अधिक तीखे ढंग से उपस्थित कर देती है।
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