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Delhi-NCR: ‘हर कोई दिल्ली नहीं छोड़ सकता लेकिन…’, डॉक्टर ने खराब AQI के चलते दी सलाह

दिल्ली में बिगड़ती वायु गुणवत्ता को देखते हुए एम्स के डॉ. और श्वास रोग विशेषज्ञ ने सलाह दी है कि जो लोग सक्षम हैं दिसंबर मध्य तक दिल्ली से बाहर रहें।

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दिल्ली में खराब एक्यूआई के बीच डॉ. ने क्या सलाह दी? फोटोः आईएएनएस

Delhi-NCR AQI: राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में बीते कुछ दिनों से वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का स्तर ‘खराब’ और ‘बहुत खराब’ श्रेणी में है। रविवार, 2 नवंबर को भी यह ‘बहुत खराब’ श्रेणी में दर्ज किया गया। ऐसे में खराब हवा के चलते एम्स के डॉक्टर और वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. गोपी चंद खिलानी ने सक्षम लोगों को दिल्ली छोड़ने का सुझाव दिया है।

रविवार सुबह दिल्ली का AQI सुबह 7 बजे 377 दर्ज किया गया। इस दौरान कुछ इलाकों में यह ‘गंभीर’ श्रेणी में था। वहीं, सुबह 10 बजे तक आनंद विहार, चांदनी चौक, नेहरू नगर, आर के पुरम, रोहिणी और कई अन्य स्थानों पर यह 400 के पार दर्ज किया गया। इन इलाकों में वायु गुणवत्ता ‘गंभीर’ श्रेणी में थी।

वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ ने क्या सुझाव दिया?

ऐसे में बिगड़ती वायु गुणवत्ता को देखते हुए एम्स के डॉक्टर और वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ ने उन लोगों को सलाह दी है जो दिल्ली छोड़ने में सक्षम हैं। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में डॉ. गोपी चंद खिलनानी ने पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोगों को सलाह दी है कि अगर हो सके तो दिसंबर के मध्य तक दिल्ली से दूर रहें।

डॉ. खिलनानी पीएसआरआई इंस्टीट्यूट ऑफ पल्मोनरी के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने कहा कि हर कोई दिल्ली छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकता क्योंकि यह आसान नहीं है। लेकिन जिन लोगों को पुरानी फेफड़ों की बीमारी या पुरानी हृदय रोग है। ऐसे लोग जो ऑक्सीजन पर हैं और जिनके पास विदेश या कम प्रदूषित जगहों पर जाने का अवसर है। ऐसे लोगों को डॉ. खिलनानी ने सलाह दी है कि अगले 6-8 हफ्तों के लिए दिल्ली से बाहर रहें जिससे सांस फूलने, ऑक्सीजन की जरूरत वगैरह जैसी परेशानियों से खुद को बचा सकें।

वायु प्रदूषण का हमारे फेफड़ों पर क्या असर होता है, इस पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि एम्स द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, वायु प्रदूषण के कारण बच्चों में फेफड़ों का विकास कम हो जाता है।

तीन-चार दशक पहले क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के 90 फीसदी मामलों के पीछे तंबाकू या धूम्रपान मुख्य वजह थी। वहीं, अब ऐसे 50 फीसदी मामले घर के अंदर और बाहर के वायु प्रदूषण के कारण होते हैं। डॉ. खिलनानी ने आगे कहा कि पहले फेफड़ों के कैंसर के 80 फीसदी से ज्यादा मामले तंबाकू धूम्रपान के कारण होते थे। आज के दैनिक आंकड़ों के मुताबिक, फेफड़े के कैंसर के 40 फीसदी ऐसे मामले देखे जाते हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। इसके अलावा युवा रोगियों में भी फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं।

एयर प्यूरिफायर के बारे में क्या बोले डॉ. खिलनानी?

वायु प्रदूषण का असर फेफड़ों के अलावा हृदय, दिमाग, गुर्दे, आंत के साथ-साथ प्रतिरक्षा तंत्र को भी निशाना बनाता है।

डॉ. खिलनानी के मुताबिक, एक अच्छी एयर क्वालिटी का एयर प्यूरिफायर पूरे कमरे की हवा को साफ करने के लिए पर्याप्त है लेकिन इसे हर समय चालू रखना चाहिए और इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के पास ही रखना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि जिस कमरे में एयर प्यूरिफायर लगा है उसे हर समय बंद रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि बार-बार दरवाजा खुलने से एयर प्यूरिफायर की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।

उन्होंने यह भी कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) मानता है कि एयर प्यूरिफायर का स्वास्थ्य सुधार पर कोई असर नहीं होता है। हालांकि, उन्होंने सुझाव दिया कि घर पर रहने वाले लंबे समय से श्वास संबंधी, सीओपीडी या हृदय रोग से पीड़ित लोगों को मदद मिल सकती है।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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