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‘अदालतें चुनावी फायदे का हथियार नहीं’, महबूबा मुफ्ती की किस याचिका पर हाई कोर्ट हुआ नाराज

महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। मुख्य न्यायाधीश अरुण पल्ली और न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने इस याचिका को न केवल ‘भ्रमपूर्ण’ बताया, बल्कि इसे लेकर कई सख्त टिप्पणियाँ भी कीं।

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महबूबा मुफ्ती। एआई इमेज

श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने मंगलवार को पीडीपी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने केंद्र शासित प्रदेश से बाहर की जेलों में बंद कश्मीरी अंडरट्रायल कैदियों को वापस जम्मू-कश्मीर लाने की मांग की थी।

मुख्य न्यायाधीश अरुण पल्ली और न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने इस याचिका को न केवल ‘भ्रमपूर्ण’ बताया, बल्कि इसे लेकर कई सख्त टिप्पणियाँ भी कीं। खंडपीठ ने याचिका को गलत धारणा पर आधारित करार देते हुए कहा कि अदालतों का इस्तेमाल चुनावी या राजनीतिक लाभ के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह याचिका न केवल अस्पष्ट है, बल्कि तथ्यों के ठोस आधार से भी खाली है और इससे राजनीतिक मंशा साफ झलकती है।

याचिका में ठोस तथ्यों और जानकारी का अभाव

अदालत ने कहा कि याचिका में यह दावा किया गया है कि कई अंडरट्रायल कैदियों के परिजनों ने महबूबा मुफ्ती से संपर्क कर यह मुद्दा उठाने को कहा, लेकिन याचिकाकर्ता ऐसे किसी भी परिवार या कैदी का कोई विवरण देने में पूरी तरह विफल रहीं। कोर्ट के अनुसार, न तो किसी खास कैदी का नाम बताया गया और न ही किसी विशेष ट्रांसफर आदेश को चुनौती दी गई।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब प्रभावित अंडरट्रायल कैदियों ने स्वयं अपनी जेल ट्रांसफर को लेकर कोई शिकायत नहीं की है, तो महबूबा मुफ्ती इस मामले में तीसरे पक्ष के रूप में आती हैं और उन्हें अदालत में आने का कोई वैधानिक अधिकार यानी लोकस स्टैंडी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस दस्तावेजों और स्पष्ट तथ्यों के आधार पर रिट क्षेत्राधिकार का सहारा नहीं लिया जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष हैं और फिलहाल विपक्ष में हैं। ऐसे में यह याचिका एक खास वर्ग के लिए खुद को “न्याय की लड़ाई लड़ने वाला चेहरा” दिखाने और राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश प्रतीत होती है।

अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि जनहित याचिका का इस्तेमाल राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने या अदालत को राजनीतिक मंच बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, “PIL कोई राजनीतिक बढ़त हासिल करने का जरिया नहीं है और न ही अदालतें चुनावी अभियानों का मंच बन सकती हैं।”

हालांकि, कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि जिन अंडरट्रायल कैदियों की ओर से याचिका दायर करने का दावा किया गया है, उनके मामले संबंधित अदालतों में विचाराधीन हैं और उन्हें अपनी हिरासत या ट्रांसफर से जुड़ी किसी भी शिकायत के लिए न्यायिक उपाय उपलब्ध हैं।

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है, जब प्रथम दृष्टया वास्तविक जनहित स्पष्ट हो। अगर जनहित संदिग्ध हो या बाहरी कारणों से प्रभावित हो, तो अदालत को हस्तक्षेप से इनकार करना चाहिए, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना भी अपने आप में एक बड़ा जनहित है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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