Homeकला-संस्कृतिएक गीत: ‘चिट्ठी न कोई संदेश’- अधूरी चिट्ठियों का अंतहीन इंतजार

एक गीत: ‘चिट्ठी न कोई संदेश’- अधूरी चिट्ठियों का अंतहीन इंतजार

तकनीक ने मनुष्यों के बीच की दूरियाँ निश्चय ही कम की हैं। लेकिन मृत्यु से उत्पन्न अनुपस्थिति का कोई डिजिटल विकल्प अब तक ईजाद नहीं हो सका। कोई ऐप ऐसा नहीं, जो एक बार भी किसी गुजरे हुये व्यक्ति की उपस्थिति को लौटा दे। कोई नेटवर्क ऐसा नहीं, जो उस देश तक पहुँच सके, जहाँ से कोई उत्तर नहीं आता। इसीलिए ‘चिट्ठी न कोई संदेश’ समय के साथ पुराना नहीं हुआ। चिट्ठियों का समय बीत गया, तार संग्रहालयों की वस्तु बन गए, संदेशों ने मोबाइल को अपना ठिकाना बना लिया, लेकिन प्रतीक्षा का स्वभाव नहीं बदला। मनुष्य आज भी उसी तरह किसी उत्तर की प्रतीक्षा करता है, जैसे कभी डाकिए की आहट की करता था। दुश्मन फिल्म के अमर गीत ‘चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वह कौन सा देश, जहाँ तुम चले गए..’ के बहाने लिखा गया कथाकार कविता का यह लेख उसी प्रतीक्षा की करुण पुकार है।

कुछ गीतों के सुनने, चुनने और भीतर उतर जाने का कोई तय समय नहीं होता। वे बरसों तक हमारे साथ रहते हैं, लेकिन हमारे भीतर नहीं उतरते। हम उन्हें सुनते हैं, गुनगुनाते हैं, भूल जाते हैं। फिर जीवन का कोई एक क्षण, कोई खुशी, कोई उदासी, कोई आकस्मिक बिछोह, कोई अधूरी विदाई, कोई पुरानी तस्वीर, कोई धुँधली-सी लिखावट या अचानक खुली किसी फाइल से झरती हुई स्मृति उसी गीत को एक बिल्कुल नया अर्थ दे देती है। एक नई पहचान, एक नई पीड़ा, एक नए चेहरे के साथ वह गीत हमारे भीतर नए सिरे से जीवित हो उठता है। वह चाहे अपने समय का बेहद लोकप्रिय गीत रहा हो, चाहे लाखों लोगों ने उसे सुना हो, लेकिन हमारे लिए उसका जन्म उसी दिन होता है, जिस दिन वह हमारे किसी निजी दुःख- सुख का स्वर बन जाता है।

इन दिनों मेरे भीतर ऐसा ही एक गीत लगातार गूँज रहा है—‘चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन-सा देश जहाँ तुम चले गए…’।

इसे सुनना किसी खोए हुए व्यक्ति का नाम बहुत धीरे-धीरे पुकारना है। यह पुकार बाहर नहीं जाती, हर बार लौटकर भीतर ही चली आती है। गीत का पहला स्वर हवा में तैरता है और स्मृतियाँ अपनी-अपनी जगहों से उठकर हमारे सामने आ खड़ी होती हैं। कुछ चेहरे धुँधले होकर लौटते हैं, कुछ पहले से अधिक स्पष्ट। कुछ आवाज़ें फिर सुनाई देने लगती हैं, कुछ स्पर्श फिर हथेलियों पर उतर आते हैं। यह गीत अचानक ही समय की बंद अलमारियाँ खोल देता है।

‘जाने वो कौन-सा देश…’ यह प्रश्न यहाँ ईश्वर से कम, समय से अधिक है। समय हर उत्तर अपने पास रखता है, लेकिन कभी हमें देता या थमाता नहीं। वह केवल हमें जीना सिखाता है। उन लोगों के बिना भी, जो कभी हमारे जीवन का सबसे जीवंत हिस्सा थे। शायद यही कारण है कि यह गीत समाप्त होने के बाद भी समाप्त नहीं होता। उसकी अंतिम पंक्ति के बाद एक लंबा मौन बचा रह जाता है और उसी मौन में हमारे अपने लोग धीरे-धीरे चलने लगते हैं।

अब से पहले यह गीत मेरे भीतर किसी ऐसे बंद कमरे का दरवाज़ा खोल देता था, जहाँ वर्षों से धूल खाई स्मृतियाँ चुपचाप बैठी थीं। कई चेहरे एक साथ आँखों के सामने से गुज़रने लगते थे। शायद इसीलिए इस गीत से एक तरह का परहेज़ भी रहा। जहाँ बजता, वहाँ से उठ जाना चाहती थी। या फिर अकेले बैठकर रो लेना। क्योंकि बार-बार अपने ही दुःख के सामने खड़ा होना आसान नहीं होता।

लेकिन अब कुछ बदल गया है….

शायद हर मनुष्य के भीतर दुःख का एक साझा घर होता है। समय के साथ उसमें बहुत-से लोग आकर बस जाते हैं- माँ, पिता, कोई मित्र, कोई बिछड़ा प्रेम, कोई सहकर्मी, कोई भाई, कोई बहन। वर्षों तक एक गीत उन सबकी स्मृतियों का दरवाज़ा एक साथ खोलता रहता है। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक नई अनुपस्थिति उन सारी पुरानी अनुपस्थितियों पर अपनी छाया डाल देती है। तब वही गीत एक ही चेहरे का पर्याय बन जाता है।

इन दिनों मेरे लिए ‘चिट्ठी न कोई संदेश…’ ऐसा ही गीत है।

अब इस गीत को सुनते ही सबसे पहले एक चंचल, शोख, मेधावी और ज़िम्मेदार चेहरा सामने आ खड़ा होता है। हँसती हुई आँखें, खिली हुई दंत-पंक्तियाँ और जीवन से भरी एक मुस्कान। जैसे ‘दुश्मन’ फिल्म की नैना। फर्क सिर्फ़ इतना है कि नैना एक हिंसक अपराध का शिकार होती है, जबकि स्नेहा को एक निर्मम अग्निकांड ने हमसे छीन लिया। मृत्यु के कारण अलग हो सकते हैं, लेकिन पीछे छूट जाने वालों का शोक लगभग एक-सा होता है। वह हर सुबह नए सिरे से जन्म लेता है।

यह इस गीत की सबसे बड़ी शक्ति है कि यह किसी एक मृत्यु का गीत नहीं है। यह उन सबके लिए लिखा गया गीत है, जो किसी अचानक घटित अनुपस्थिति के बाद अपने जीवन को फिर से जोड़ने की कोशिश करते हैं। यह मृत्यु से ज्यादा मृत्यु के बाद बची हुई ज़िंदगी का गीत है, उन ज़िंदगियों का, जो बच तो जाती हैं, लेकिन अपने बचे रह जाने का मर्सिया अपने भीतर लिए फिरती हैं।

कोई बहुत अपना, बहुत क़रीबी, एकदम अप्रत्याशित ढंग से चला जाए, तो सबसे पहले विश्वास ही टूटता है। हम एक अजीब-सी जगह खड़े रह जाते हैं, जहाँ यक़ीन और बेयक़ीनी दोनों हमें बराबर रुप से छल रहे होते हैं। मन बार-बार कहता है, अभी फ़ोन आएगा…अभी दरवाज़ा खुलेगा…अभी वह मुस्कुराते हुए सामने आ जाएगा। लेकिन समय बहुत निर्मम होता है। वह लौटकर केवल स्मृति भेजता है, मनुष्य नहीं।

1998 में आई तनुजा चंद्रा की फिल्म ‘दुश्मन’ को अक्सर एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर या प्रतिशोध की कथा के रूप में याद किया जाता है। लेकिन इस फिल्म की आत्मा प्रतिशोध नहीं, अनुपस्थिति में बसती है। एक जुड़वाँ बहन की आकस्मिक और क्रूरतापूर्ण मृत्यु के बाद दूसरी बहन केवल अपनी बहन को नहीं खोती, अपने ही अस्तित्व का आधा हिस्सा खो देती है। उसके बाद जो बचता है, वह जीवन नहीं, जीवन का बोझ है या फिर कुछ दायित्व। ‘चिट्ठी न कोई संदेश…’ उसी कथा का मौन संवाद है, जो लगातार पृष्ठभूमि में सुनाई देता है। यह उस रिक्त जगह का संगीत है, जिसे कोई पात्र शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। नैना अब दृश्य में नहीं है, लेकिन उसकी अनुपस्थिति हर दृश्य में मौजूद है। साझा बिस्तर की खाली सलवटों में, जन्मदिन की अंतहीन प्रतीक्षा में, घर के उस कोने में जहाँ अब कोई आवाज़ नहीं उठती, और सबसे अधिक उसकी जुड़वाँ बहन की आँखों में, जो हर क्षण किसी अदृश्य संवाद से भरी रहती हैं। यही कारण है कि यह गीत मृत्यु को एक ऐसी घटना की तरह देखती है, जो अनुपस्थिति के स्थाई दंश का कारण होती है। मृत्यु एक बार घटती है, लेकिन उसकी अनुपस्थिति हर दिन घटित होती रहती है। हर सुबह, हर शाम, हर त्योहार, हर जन्मदिन और हर उस क्षण, जब अनायास मन किसी परिचित आवाज़ की ओर मुड़ता है।

यह इस गीत की सबसे करुण खूबसूरती है कि यह रुलाई को नहीं, बल्कि उस ख़ामोशी को स्वर देता है, जिसमें शोक धीरे-धीरे अपना घर बनाता है।

किसी महान गीत की पहचान केवल उसके शब्दों से नहीं होती। वह शब्द, संगीत और आवाज़, इन तीनों के अद्भुत संतुलन से जन्म लेता है। इन तीनों में से यदि एक भी ज़रा-सा ऊँचा या नीचा पड़ जाए, तो गीत का जादू टूट सकता है। ‘चिट्ठी न कोई संदेश’ उन दुर्लभ गीतों में है, जहाँ तीनों अपने-अपने अहंकार को छोड़कर एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।

आनंद बख्शी ने शब्द दिए, लेकिन उन पर अपनी कवित्व-चतुराई का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने करुणा को अलंकारों में नहीं, जीवन की सहज भाषा में व्यक्त किया।

उधर उत्तम सिंह ने इस गीत को जो धुन दी, वह उसकी सबसे बड़ी विनम्रता है। वह शब्दों पर हावी नहीं होती, उन्हें अपने साथ लेकर चलती है, जैसे किसी शोकाकुल घर में कोई बहुत धीरे से कंधे पर हाथ रख दे। इस धुन में कोई नाटकीयता नहीं, कोई अनावश्यक करुणा नहीं। यह आँसुओं के लिए एक शांत जगह बनाता है। बहुत कम संगीतकार जानते हैं कि मौन को भी कैसे स्वर दिया जाता है। इस गीत में उत्तम सिंह ने वही किया है। लेकिन फिर भी यह गीत अधूरा रह जाता, यदि इसे जगजीत सिंह की आवाज़ न मिली होती।

जगजीत सिंह की आवाज़ में एक ऐसी टूटन थी, जो कभी प्रदर्शन या प्रदर्शन का कारक नहीं बनी। वे गाते हुए रोते नहीं थे, लेकिन उनकी आवाज़ सुनकर श्रोता की आँखें भर आती थीं। जैसे कोई अपने आँसुओं को बहुत भीतर पी रहा हो और अब केवल नमी उसकी आवाज़ में बची हो। शायद इसलिए भी कि यह गीत गाते समय वे केवल एक गायक नहीं रहते। वे एक पिता भी होते हैं, जिसने अपने इकलौते बेटे विवेक को एक सड़क दुर्घटना में खो दिया था। 1990 की उस त्रासदी ने केवल उनके घर को नहीं, उनकी आवाज़ को भी बदल दिया। चित्रा सिंह लगभग मौन हो गईं। उन्होंने फिर कभी उसी सहजता से नहीं गाया। जगजीत भी लंबे समय तक संगीत से दूर रहे। लेकिन कला का स्वभाव विचित्र है। वह किसी घाव को भर तो नहीं सकती, पर उसके साथ जीने का साहस अवश्य देती है।

आठ वर्ष बाद जब वे दुश्मन के लिए ‘चिट्ठी न कोई संदेश’ गाने स्टूडियो पहुँचे, तो उनके पास केवल रियाज़ नहीं था, जीवन का वह अनुभव भी था, जिसे कोई संगीत विद्यालय नहीं सिखा सकता। इसलिए इस गीत को सुनते हुए बार-बार लगता है कि वे केवल पात्र के बिछोह को नहीं गा रहे, बल्कि अपने जीवन की उस रिक्तता को भी स्वर दे रहे हैं, जिसके बारे में उन्होंने कभी विस्तार से बात नहीं की। यही कारण है कि इस गीत में व्यक्त करुणा अभ्यास या अभिनय से नहीं, अनुभव से फूटती लगती है। क्योंकि यहां शब्द भले आनंद बख्शी के हैं, धुन उत्तम सिंह की, लेकिन पीड़ा की वह अंतिम विश्वसनीयता जगजीत सिंह की आवाज़ से आती है। इस गीत को वे गाते नहीं, बल्कि अपने भीतर की एक लंबी चुप्पी को धीरे-धीरे सुनने योग्य बना रहे होते हैं।

हर मनुष्य के जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब कोई चिट्ठी हमेशा के लिए आनी बंद हो जाती है। किसी माँ की आवाज़ अचानक सुनाई देनी बंद हो जाती है। पिता का हाल पूछने वाला फ़ोन नहीं आता। किसी दोस्त का बेवक्त दरवाज़ा खटखटाना बंद हो जाता है। कोई प्रिय चेहरा हमारी रोज़मर्रा की दुनिया से इस तरह अनुपस्थित हो जाता है कि बहुत दिनों तक उसकी अनुपस्थिति भी उपस्थिति जैसी लगती रहती है। कभी उसके हिस्से की चाय की प्याली खनक उठती है। कभी किसी उत्सव पर अनायास उसकी पसंद की चीज़ याद आ जाती है। मोबाइल में उसका नाम अब भी सुरक्षित रहता है। अलमारी में रखी उसकी लिखावट, उसकी किताबें, उसका चश्मा, उसकी घड़ी, सब समय से लंबी उम्र पा लेते हैं। केवल वह नहीं रहता, जिसके कारण इन चीज़ों का अर्थ था।

तकनीक ने मनुष्यों के बीच की दूरियाँ निश्चय ही कम की हैं। लेकिन मृत्यु से उत्पन्न अनुपस्थिति का कोई डिजिटल विकल्प अब तक ईजाद नहीं हो सका। कोई ऐप ऐसा नहीं, जो एक बार भी किसी गुजरे हुये व्यक्ति की उपस्थिति को लौटा दे। कोई नेटवर्क ऐसा नहीं, जो उस देश तक पहुँच सके, जहाँ से कोई उत्तर नहीं आता। इसीलिए ‘चिट्ठी न कोई संदेश’ समय के साथ पुराना नहीं हुआ। चिट्ठियों का समय बीत गया, तार संग्रहालयों की वस्तु बन गए, संदेशों ने मोबाइल को अपना ठिकाना बना लिया, लेकिन प्रतीक्षा का स्वभाव नहीं बदला। मनुष्य आज भी उसी तरह किसी उत्तर की प्रतीक्षा करता है, जैसे कभी डाकिए की आहट की करता था।

इस गीत की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि यह किसी एक रिश्ते का गीत नहीं है। इसमें माँ भी समा जाती है, पिता भी, मित्र भी, प्रेम भी, भाई-बहन भी और वह हर रिश्ता भी, जिसके लिए हमारे भीतर आज तक कोई खाली जगह बची हुई है। हर श्रोता इसे अपने जीवन से पूरा करता है। गीत जितना लिखा गया है, उससे कहीं अधिक हर सुनने वाला उसमें जोड़ता चलता है। शायद इसीलिए यह गीत बूढ़ा नहीं होता। हर पीढ़ी इसे अपने आँसुओं, अपनी मुस्कानों और अपनी स्मृतियों के साथ फिर से खोज लेती है।

दुनिया की सबसे लंबी यात्राएँ वे नहीं होतीं, जो एक देश से दूसरे देश तक जाती हैं। सबसे लंबी यात्राएँ वे होती हैं, जो एक मनुष्य की स्मृति से दूसरे मनुष्य की अनुपस्थिति तक जाती हैं। वे यात्राएँ, जिनमें कोई नक्शा नहीं होता, कोई पड़ाव नहीं होता और कोई वापसी भी नहीं होती। इसीलिए ‘चिट्ठी न कोई संदेश’ मृत्यु से अधिक स्मृति का गीत है। यह उन लोगों के नाम लिखा गया एक अनंत पत्र है, जिनका पता अब इस दुनिया के किसी शहर, किसी गली, किसी घर में नहीं मिलता। वे कहीं और बस गए हैं- उस ‘कौन-से देश’, जहाँ न कोई डाकघर है, न कोई डाकिया, न कोई संदेश।

लेकिन प्रेम का स्वभाव बहुत हठी होता है। यह सब मालूम होने पर भी वह चिट्ठियाँ लिखना बंद नहीं करता। वह हर स्मृति को एक अधूरी चिट्ठी की तरह सहेजता रहता है। हर पुकार को किसी अनसुने उत्तर की तरह संभाले रखता है। इसीलिए मनुष्य की सबसे सच्ची चिट्ठियाँ वे होती हैं, जो कभी भेजी ही नहीं जा सकीं। स्मृतियों के लिए कोई डाक-व्यवस्था नहीं होती। वे अपना रास्ता स्वयं खोज लेती हैं। लेकिन अधूरी चिट्ठियाँ शायद आज भी किसी अज्ञात डाकिए की राह तकती हैं, इस असंभव विश्वास के साथ कि एक दिन वह आएगा और उन्हें वहाँ पहुँचा देगा, जहाँ से अब कोई उत्तर नहीं आता।

इसीलिए यह गीत समाप्त होकर भी समाप्त नहीं होता। उसकी अंतिम पंक्ति के बाद एक लंबी ख़ामोशी हमारे भीतर उतरती रहती है। और उसी ख़ामोशी में कभी बहुत दूर से, जैसे किसी दूसरी दुनिया से, किसी प्रत्युत्तर की तरह इसी फिल्म का एक और गीत सुनाई देने लगता है-

‘आवाज़ दो हमको… हम खो गए…’

‘दुश्मन’ फिल्म का यह दूसरा गीत संभवतः उन सभी अधूरी चिट्ठियों का उत्तर है, जिन्हें हमने जीवन भर लिखा, लेकिन कभी भेज नहीं सके। उन सभी आवाज़ों की प्रतिध्वनि है, जिन्हें हम सुन तो न सके, पर जिनके बारे में आज भी यह विश्वास कहीं गहरे पैठा है कि-

‘इक आह भरी होगी, हमने न सुनी होगी…
जाते-जाते तुमने आवाज़ तो दी होगी…’

शायद किसी दिन, जब स्मृति और समय के बीच की सारी दूरियाँ मिट जाएँगी, तब उन सारी अधूरी चिट्ठियों को भी कोई पता मिल जाएगा।

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कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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