रायपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने गुरुवार (2 जुलाई) को स्पष्ट किया कि सरकारी स्कूलों में किसी भी बच्चे को हिंदू प्रार्थनाएं करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। अदालत एक ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें राज्य सरकार के 12 जून के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई थी जिसके तहत स्कूलों में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और अन्य हिंदू प्रार्थनाएं अनिवार्य की गई थीं।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने राज्य सरकार का यह पक्ष दर्ज किया कि हालांकि सर्कुलर जून की शुरुआत में ही जारी कर दिया गया था लेकिन इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
इस कथन को ध्यान में रखते हुए अदालत ने याचिका बंद कर दी और याचिकाकर्ताओं को यह स्वतंत्रता दी कि यदि किसी बच्चे को प्रार्थना पाठ में भाग लेने के लिए विवश किया गया हो तो वे पुनः अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इस दौरान न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि इस प्रकार का कोई भी विवशता का मामला उसके संज्ञान में आता है तो उचित कार्रवाई की जाएगी।
यह याचिका छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व चेयरमैन महेंद्र छाबड़ा और बिलासपुर के सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद ने दायर की थी। उन्होंने स्कूल शिक्षा विभाग के सर्कुलर की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी।
राज्य सरकार द्वारा जारी सर्कुलर में राज्य भर के सरकारी स्कूलों को राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र का पाठ कराने का निर्देश दिया गया था। इसमें महान हस्तियों की जीवनियां पढ़ने, मिड-डे मील के दौरान भोजन मंत्र का पाठ करने और स्कूल की छुट्टी से पहले गायत्री मंत्र और शांति मंत्र का पाठ करने को भी अनिवार्य किया गया था।
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याचिका में तर्क दिया गया कि परिपत्र ने धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है। याचिका में कहा गया कि ” सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र को अनिवार्य रूप से शामिल करना सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा और एक विशेष धर्म के प्रचार के समान है। इसलिए विवादित आदेश असंवैधानिक है। “
याचिकाकर्ताओं ने क्या दलील दी?
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि परिपत्र उन छात्रों की सुरक्षा करने में विफल रहा है जो धार्मिक अनुष्ठानों में भाग नहीं लेना चाहते। इसमें आगे कहा गया कि ” विवादित आदेश न तो छूट का कोई तंत्र प्रदान करता है और न ही उन छात्रों की अंतरात्मा की स्वतंत्रता की रक्षा करता है जो ऐसी धार्मिक गतिविधियों में भाग नहीं लेना चाहते। ” इसमें आगे कहा गया कि परिपत्र एक धर्म की प्रथाओं को अन्य धर्मों पर प्राथमिकता देकर धार्मिक तटस्थता बनाए रखने के राज्य के दायित्व से समझौता करता है।
” किसी एक धर्म से जुड़ी प्रार्थनाओं और मंत्रों को अनिवार्य बनाकर और बाकी धर्मों को छोड़कर, राज्य धर्म के आधार पर एक ऐसी प्राथमिकता और वर्गीकरण बनाता है जो स्वीकार्य नहीं है। “
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि यह सर्कुलर सार्वजनिक शिक्षा के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं है। याचिका में कहा गया कि ” राज्य का यह कदम असल में सरकारी फंड से चलने वाले शिक्षण संस्थानों में किसी एक धर्म की धार्मिक प्रथाओं को बढ़ावा देता है और उन्हें संस्थागत रूप देता है जिससे संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन होता है। “
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता आमिर खान और सितारा खान ने दलील दी।
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