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राज की बात: जब बस्तर में पुलिस के बड़े अधिकारी भी वर्दी और सरकारी गाड़ी से कतराते थे

छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त हो गया है। वर्षों तक यह क्षेत्र नक्सली हिंसा से ग्रस्त रहा है।

chhattisgarh bastar when police official avoid dress and car, छत्तीसगढ़, बस्तर
प्रतीकात्मक फोटोः समाचार एजेंसी आईएएनएस

बस्तरः आधिकारिक तौर पर 31 मार्च के बाद बस्तर अब ‘नक्सल मुक्त’ हो गया है, लेकिन यह उपलब्धि एक मंत्री, दो एसपी और दर्जनों नेताओं की शहादत के बाद हासिल हुई है। इस संघर्ष में केंद्रीय सुरक्षा बलों के हजारों अधिकारी और जवान भी वीरगति को प्राप्त हुए।

मैं इस क्षेत्र में वर्ष 1995 से अंग्रेजी दैनिक ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ के प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत रहा हूँ और कई ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी भी रहा हूँ।

एक दौर था जब ‘पशुपति से तिरुपति’ (नेपाल से आंध्र प्रदेश) तक नक्सली गतिविधियां फैली हुई थीं। बस्तर, जो पहले एक अकेला जिला था, उसे विभाजित कर अब लगभग एक दर्जन जिले बना दिए गए हैं। जो पहले महज प्रखंड (ब्लॉक) थे, वे आज जिला मुख्यालय बन चुके हैं। कश्मीर की तर्ज पर बस्तर में भी सुरक्षा के लिए 72,000 सुरक्षा बलों की सेवाएं ली गईं, जिनमें बीएसएफ (BSF), सीआरपीएफ (CRPF), सीआईएसएफ (CISF), एसएसबी (SSB) और आरपीएफ (RPF) शामिल थे। इसी दौर में कांकेर में ‘जंगल वारफेयर ट्रेनिंग संस्थान’ की स्थापना हुई और सेना द्वारा कमांडो प्रशिक्षण की शुरुआत की गई।

मुझे याद है, तब सूर्यास्त के बाद बस्तर की सड़कों पर घूमना सुरक्षित नहीं माना जाता था। आम चुनाव महज एक औपचारिकता बनकर रह गए थे। चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त अधिकारी स्थानीय पुलिस स्टेशनों में मतपेटी या ईवीएम (EVM) रखते थे और सूर्यास्त से पहले ही उन्हें सेना के हेलीकॉप्टर द्वारा मुख्यालय ले जाया जाता था। मतदान का प्रतिशत मात्र पांच से सात प्रतिशत रहता था, क्योंकि माओवादियों के चुनाव बहिष्कार की घोषणा का व्यापक असर होता था। वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में सरकार ने सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी पंजाब पुलिस और बीएसएफ को सौंपी थी।
मुझे स्मरण है, एक बार मैं सड़क मार्ग से जगदलपुर से दंतेवाड़ा मंदिर जा रहा था। रास्ते में हम गीदम में चाय पीने के लिए रुके। हमारे वहां से आगे बढ़ने के कुछ ही देर बाद पता चला कि माओवादी बस से आए, दुकानें बंद करवाईं और हाईवे पर स्थित किलेबंद गीदम थाने पर हमला कर दिया। उन्होंने सारे हथियार लूटे, दरोगा की हत्या की और बड़े आराम से निकल गए।

जिस तरह कश्मीर में आतंकवाद के दौर में थाने ‘हाइली फोर्टिफाइड’ (कटीले तारों से घिरे) रहते थे, उसी तरह बस्तर के थानों को सुरक्षित किया गया था। पूरा बस्तर बारूदी सुरंगों (Mines) से भरा था। एक बड़ी घटना में सीआरपीएफ के 76 जवान और अधिकारी एक साथ शहीद हो गए थे।

पच्चीस साल पहले ‘बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन’ (BRO) को बस्तर के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों के सुधार का जिम्मा दिया गया था। उस समय पूरे इलाके में सरकारी अस्पताल और स्कूल बंद थे। नक्सलियों ने स्वयं स्थानीय लोगों को शिक्षक नियुक्त किया था और उन्हें बच्चों को पढ़ाने का निर्देश दिया था। आज लोगों को विश्वास नहीं होगा, लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि माओवादी खुद जमीन के रिकॉर्ड रखते थे, म्यूटेशन (नामांतरण) करते थे और लगान (Land Revenue) भी वसूलते थे। यह सब पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज है।

दंतेवाड़ा की अधिष्ठात्री देवी, मां दंतेश्वरी ही उस समय पुलिस अधिकारियों का एकमात्र सहारा होती थीं। चाहे आईजी हों या एसपी, वे कभी पुलिस वर्दी में नहीं रहते थे और न ही पुलिस की आधिकारिक जीप का उपयोग करते थे। गश्त (Patrolling) साधारण जीप में होती थी और गाड़ी के आगे पुलिस के बजाय मां दंतेश्वरी का ध्वज लहराता था।

उस दौर में दंतेवाड़ा में पदस्थापित एक युवा आईपीएस अधिकारी ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने अपने जवानों को पुलिस वर्दी पहनने, आधिकारिक गाड़ी और पुलिस के झंडे का उपयोग करने का आदेश दिया। लेकिन, आदेश के पहले ही दिन नियमों का पालन करते हुए आठ जवान शहीद हो गए। छत्तीसगढ़ के तत्कालीन राज्यपाल, जो स्वयं बिहार में आईजी रह चुके थे, ने इस पर गहरा खेद व्यक्त किया और इसे एक ‘अपरिपक्व निर्णय’ (Immature Action) करार दिया।

अब बस्तर ने करवट ली है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘बस्तर-2’ योजना का प्रस्ताव दिया है, जिसमें क्षेत्र के विकास और वहां उद्योग लगाने की रूपरेखा तैयार की गई है।

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लव कुमार मिश्र
लव कुमार मिश्र, 1973 से पत्रकारिता कर रहे हैं,टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष संवाददाता के रूप में देश के दस राज्यों में पदस्थापित रह। ,कारगिल युद्ध के दौरान डेढ़ महीने कारगिल और द्रास में रहे। आतंकवाद के कठिन काल में कश्मीर में काम किए।

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