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सरकारें विधेयकों पर राष्ट्रपति या राज्यपाल के एक्शन के खिलाफ याचिका दायर नहीं कर सकतीं: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा

सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय करने को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से औपचारिक राय मांगी थी। इसे लेकर उन्होंने 14 सवालों की लिस्ट भी कोर्ट को भेजी थी।

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केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कोई भी राज्य या केंद्र सरकार भी विधान सभाओं की ओर से पारित विधेयकों पर राष्ट्रपति और राज्यपालों के कार्यों के खिलाफ रिट याचिका दायर नहीं कर सकती। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इस बारे में अदालत का विचार जानना चाहती हैं कि क्या राज्य मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) के तहत रिट याचिका दायर कर सकते हैं।

भारत के चीफ जस्टिस बी आर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस ए एस चंदुरकर की पांच जजों की पीठ राष्ट्रपति मुर्मू द्वारा दिए गए उस संदर्भ पर सुनवाई कर रही है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक फैसले में राज्य विधान सभाओं द्वारा प्रस्तुत विधेयकों पर कोई कदम उठाने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए समय सीमा निर्धारित की गई थी।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार मेहता ने गुरुवार को पीठ को बताया कि राष्ट्रपति इस सवाल पर जोर देना चाहती हैं कि क्या कोई राज्य रिट याचिका दायर कर सकता है, जो मौलिक अधिकार को लागू करने को निश्चित करने के लिए कानूनी उपाय है। साथ ही ये भी कि अनुच्छेद 361 का दायरा क्या है जो राष्ट्रपति और राज्यपालों को उनके कार्यों के लिए अदालतों के प्रति जवाबदेह होने से छूट प्रदान करता है।

इस बीच, तमिलनाडु सरकार ने केंद्र के इस तर्क का विरोध किया कि राज्यपाल किसी विधेयक को रोक सकते हैं। उसने कहा कि यह तर्क शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में 1975 के फैसले को गलत तरीके से समझे जाने का नतीजा है।

क्या है ये पूरा मामला?

दरअसल, ये पूरा मामला अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के आए एक फैसले से जुड़ा है। तब सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने 8 अप्रैल को अपने एक फैसले में कहा था कि विधान सभा से पारित विधेयक के मिलने पर राज्यपाल को तीन महीने के भीतर इस पर निर्णय लेना होगा। अगर राज्यपाल इस पर राय के लिए राष्ट्रपति को भेजते हैं तो राष्ट्रपति को भी वहीं राष्ट्रपति को भी उस विधेयकों पर तीन महीने के भीतर इस पर निर्णय करना होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, ‘राज्यपाल के पास विधेयक को रोकने की कोई गुंजाइश नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है। उन्हें अनिवार्य रूप से मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर काम करना होता है।’

कोर्ट द्वारा राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय करने को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से औपचारिक राय मांगी। इसे लेकर उन्होंने 14 सवालों की लिस्ट भी कोर्ट को भेजी थी।

इससे पहले तमिलनाडु के गवर्नर और राज्य सरकार के बीच हुए विवाद के बाद राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। राज्यपाल ने राज्य सरकार के बिल रोक दिए थे। इसे लेकर तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया था। इसी पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को तीन महीने के अंदर फैसला लेना होगा।

इस फैसले को कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव के रूप में देखा गया। इसके मद्देनजर राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को 14 सवालों का प्रेसिडेंशियल रेफरेंस भेजा था, जिसके आधार पर संविधान पीठ गठित की गई। यह पीठ विधेयक पर फैसले की समय सीमा और संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या पर विचार करेगी।

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...

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