नई दिल्लीः केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने नई व्यवस्था को लेकर एक और अहम बदलाव किया है। बोर्ड ने साफ कर दिया है कि 2027-28 शैक्षणिक सत्र से कक्षा 10 का पास सर्टिफिकेट पाने के लिए तीसरी भाषा (आर-3) की स्कूल आधारित आंतरिक परीक्षा पास करना अनिवार्य होगा। हालांकि, इस विषय की बोर्ड परीक्षा नहीं होगी।
गौरतलब है कि तीन-भाषा नीति पर सीबीएसई ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर बचाव किया है। बोर्ड ने अदालत से कहा कि उससे संबद्ध लगभग आधे स्कूल पहले से ही कक्षा 9 में दो या उससे अधिक भारतीय भाषाएं पढ़ा रहे हैं। वहीं, 99 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में कम से कम एक भारतीय भाषा पढ़ाने वाला शिक्षक मौजूद है। ऐसे में नई व्यवस्था लागू करना व्यावहारिक और संभव है।
2027-28 से लागू होगा नया नियम
10 जुलाई को जारी सर्कुलर के अनुसार, 2026-27 में कक्षा 9 में प्रवेश लेने वाले छात्रों पर यह व्यवस्था लागू होगी। जब ये छात्र 2027-28 में कक्षा 10 में पहुंचेंगे, तब उन्हें सेकेंडरी स्कूल एग्जामिनेशन पास सर्टिफिकेट प्राप्त करने के लिए तीसरी भाषा की स्कूल आधारित परीक्षा पास करनी होगी।
अगर कोई छात्र कक्षा 10 में यह आंतरिक मूल्यांकन पास नहीं कर पाता है, तो बोर्ड परीक्षा के नतीजे घोषित होने से पहले स्कूल को उसका दोबारा मूल्यांकन कराना होगा। हालांकि, सीबीएसई ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि यदि कोई छात्र पुनर्मूल्यांकन में भी सफल नहीं होता तो उसका परिणाम कैसे घोषित किया जाएगा।
कक्षा 9 के छात्रों के लिए बोर्ड ने कुछ राहत भी दी है। अगर कोई छात्र तीसरी भाषा की परीक्षा में असफल होता है, तब भी उसे कक्षा 10 में प्रोन्नत कर दिया जाएगा। लेकिन उसे 10वीं के दौरान लंबित मूल्यांकन पास करना होगा।
कक्षा 6 से लागू हो रहा है तीन-भाषा फॉर्मूला
इससे पहले 29 जून को जारी सर्कुलर में सीबीएसई ने घोषणा की थी कि 2026-27 सत्र से कक्षा 6 से तीन-भाषा फॉर्मूला लागू किया जाएगा। नई व्यवस्था के तहत छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होंगी।
जो छात्र पहले से अंग्रेजी के साथ फ्रेंच, जर्मन या स्पेनिश जैसी विदेशी भाषा पढ़ रहे हैं, उन्हें यह पढ़ाई जारी रखने की अनुमति होगी। हालांकि, उन्हें इसके साथ एक भारतीय भाषा भी पढ़नी होगी। बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि विदेशी भाषाओं को हटाया नहीं जा रहा है। छात्र उन्हें तीन निर्धारित भाषाओं में से एक या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में पढ़ सकते हैं।
बोर्ड ने हलफनामें में क्या कहा है?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में सीबीएसई ने कहा कि उसके 28,848 संबद्ध स्कूलों में से 47.3 प्रतिशत स्कूल पहले से कक्षा 9 में दो या अधिक भारतीय भाषाएं पढ़ा रहे हैं। ऐसे स्कूलों को नई व्यवस्था लागू करने के लिए अतिरिक्त भाषा शिक्षकों की आवश्यकता नहीं होगी।
बोर्ड ने यह भी बताया कि 99.19 प्रतिशत स्कूलों में कम से कम एक भारतीय भाषा पढ़ाने वाला शिक्षक उपलब्ध है। जिन स्कूलों को अतिरिक्त व्यवस्था की जरूरत होगी, उनके लिए संक्रमण काल में लचीली नियुक्ति व्यवस्था की अनुमति दी गई है।
सीबीएसई ने अदालत से कहा कि उसकी 29 जून और 10 जुलाई की गाइडलाइन के बाद याचिकाकर्ताओं की कई चिंताओं का समाधान हो चुका है।
याचिकाकर्ताओं की क्या हैं आपत्तियां?
दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई के कुछ अभिभावकों तथा विदेशी भाषा के शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर नई नीति को चुनौती दी है। उनका कहना है कि CBSE ने पहले अप्रैल में तीसरी भाषा को 2029-30 तक टालने की बात कही थी, लेकिन बाद में अचानक नीति बदल दी। इससे स्कूलों, छात्रों और शिक्षकों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई।
याचिका में यह भी कहा गया है कि कई स्कूलों में पर्याप्त भाषा शिक्षक, नई किताबें और मूल्यांकन की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। इससे छात्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और भाषा शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
सरकार और NCERT ने भी रखा पक्ष
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर तीन-भाषा नीति का समर्थन किया है। सरकार का कहना है कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत बहुभाषावाद को बढ़ावा देना, भारतीय भाषाओं का संरक्षण करना और छात्रों के संज्ञानात्मक विकास को मजबूत करना इस नीति का उद्देश्य है।
वहीं, एनसीईआरटी ने अदालत को बताया है कि उसने 22 अनुसूचित भाषाओं में पाठ्यपुस्तकों का निर्माण, समीक्षा और वितरण शुरू कर दिया है। साथ ही शिक्षा मंत्रालय ने सीबीएसई, एनआईओएस और विशेषज्ञों के साथ मिलकर कक्षा 9 की नई पुस्तकों की तैयारी के लिए एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स भी बनाई है।



