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भोजशाला विवाद पर हाई कोर्ट में हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों ने क्या-क्या दलीलें दी थी? ASI के सर्वे में क्या था

एएसआई द्वारा संरक्षित 11वीं सदी के इस स्मारक को हिंदू जहां देवी वाग्देवी ( माता सरस्वती) का मंदिर मानते हैं, वहीं मुसलमान इसे कमाल मौला मस्जिद कहते रहे हैं। अब विवाद पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला आ गया है।

Bhojshala Verdict
फोटो- IANS

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर लंबे समय से विवादित रहा है। इस पर हिंदू और मुस्लिम समूह धार्मिक अधिकारों का दावा करते रहे हैं। हालांकि, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला शुक्रवार को आ गया, जिसमें इसे हिंदू मंदिर बताया गया। कोर्ट ने इसे वाग्देवी का मंदिर कहा और उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें मुसलमानों को भोजशाला परिसर में नमाज की इजाजत दी गई थी। पिछले वर्ष, हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा स्थल की प्रकृति और ऐतिहासिक तथ्यों की जांच के लिए एक सर्वेक्षण का आदेश दिया था। इस सर्वे में जो कुछ भी सामने आया, उसी आधार पर कोर्ट का फैसला भी आया है।

एएसआई द्वारा संरक्षित 11वीं सदी के इस स्मारक को हिंदू जहां देवी वाग्देवी ( माता सरस्वती) का मंदिर मानते हैं, वहीं मुसलमान इसे कमाल मौला मस्जिद कहते हैं। 2003 में हुए एक समझौते के बाद अब तक हिंदू मंगलवार को परिसर में पूजा करते रहे हैं, जबकि मुसलमान शुक्रवार को नमाज अदा करते हैं। हाई कोर्ट ने अब अपने फैसले में इसे देवी वाग्देवी का मंदिर कहा है। कोर्ट में 6 अप्रैल से 12 मई तक लगातार मामले पर सुनवाई हुई। आइए, जानते हैं कि दोनों पक्षों ने अदालत में क्या-क्या तर्क दिए। साथ ही ये भी जानेंगे कि ASI के सर्वे में क्या कुछ मिला था।

मुस्लिम पक्ष ने क्या-क्या तर्क दिए?

मुस्लिम पक्ष की बात रखने वाले वकीलों ने सुनवाई के दौरान एएसआई रिपोर्ट की निष्पक्षता, एएसआई सर्वेक्षण में खामियों और सरस्वती मंदिर को खत्म करने के संबंध में साक्ष्यों की कमी की बात कही था। ऐतिहासिक अभिलेखों का हवाला देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने तर्क दिया था कि इस बात का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि कमाल मौला मस्जिद के निर्माण के लिए भोजशाला मंदिर को ध्वस्त किया गया था।

उन्होंने कोर्ट में कहा था, ‘सर्वे रिपोर्ट के अभिलेख में ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण या दावा नहीं है कि यह वही संपत्ति है जहां भोजशाला मंदिर स्थित था जिसे ध्वस्त कर दिया गया और उसके स्थान पर कमाल मौला मस्जिद का निर्माण किया गया है।’

खुर्शीद ने सर्वे के दौरान बरामद कलाकृतियों के प्रबंधन में अनियमितताओं का भी आरोप लगाया। परिसर के भीतर एक सीलबंद कमरे का हवाला देते हुए (जो 1997 से कलेक्टर के नियंत्रण में था) उन्होंने दावा किया कि वहां से बरामद वस्तुएं संदिग्ध रूप से साफ दिखाई दे रही हैं।

उन्होंने तर्क दिया, ‘जब पुरातात्विक वस्तुएं जमीन से निकाली जाती हैं, तो उन पर बहुत मिट्टी लगी होती है… लेकिन यहां वे लगभग साफ निकली हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि जमीन के नीचे प्लास्टिक की बोतलें भी मिली हैं, जिससे प्रक्रिया की प्रामाणिकता पर संदेह पैदा होता है।

सर्वेक्षण प्रक्रिया में गलतियों की बात कहते हुए खुर्शीद ने बार-बार कार्बन डेटिंग नहीं होने की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा, ‘कार्बन डेटिंग से कई समस्याएं हल हो सकती थीं, लेकिन कार्बन डेटिंग नहीं की गई है।’ उन्होंने ये बातें विशेष रूप से बेसाल्ट पत्थर की नींव और अन्य विवादित संरचनाओं का जिक्र करते हुए कहा।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि एएसआई ने सर्वेक्षण के दौरान मस्जिद के ढांचे के कुछ हिस्सों में बदलाव किया। उनके अनुसार, स्मारक के स्वरूप को संरक्षित करने के न्यायिक निर्देशों के बावजूद परिसर के भीतर मौजूद सीढ़ियों और चबूतरों को हटा दिया गया। उन्होंने कहा, ‘एएसआई ने सर्वेक्षण की प्रक्रिया में… सीढ़ियों और पायदानों आदि को नष्ट कर दिया, जो वस्तुतः हटा दिए गए और नष्ट कर दिए गए हैं।’

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खुर्शीद ने 1904 के राजपत्र अधिसूचना का हवाला देते हुए तर्क दिया कि एएसआई कानूनी रूप से स्मारक को उसी स्वरूप में संरक्षित करने के लिए बाध्य है, जिस स्वरूप में इसे मूल रूप से संरक्षित किया गया था। उन्होंने कहा, ‘1958 का अधिनियम केवल यह कहता है कि आपको इसके मूल स्वरूप को संरक्षित रखना है, और किसी भी प्रकार की अपवित्रता नहीं की जा सकती। यह ये नहीं कहता कि आप जाकर मूल स्वरूप को खोजें और उसके अनुसार स्वरूप को बदल दें।’

उन्होंने यह भी कहा कि एएसआई की रिपोर्ट में उल्लिखित शिलालेख और बरामद मूर्तियां मंदिर की पुष्टि करने वाले निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। स्थल पर मिली माता सरस्वती की मूर्तियों का जिक्र करते हुए खुर्शीद ने तर्क दिया कि ये मूर्तियां किसी शिक्षण संस्थान का संकेत भी दे सकती हैं। उन्होंने कहा, ‘सभी शिक्षण केंद्रों में सरस्वती की मूर्ति प्रतीकात्मक रूप से रखी जाती है।’

हिंदू पक्ष की क्या दलीलें रही?

हिंदू पक्ष की ओर से पेश हुए अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने यह निर्देश देने की मांग की कि ‘केवल हिंदू समुदाय के सदस्यों को ही भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सरस्वती सदन (जिसे आमतौर पर भोजशाला के नाम से जाना जाता है) के परिसर में पूजा और अनुष्ठान करने का मौलिक अधिकार है।’

जैन ने यह भी गुहार लगाई कि ‘मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को इस संपत्ति के किसी भी हिस्से का किसी अन्य धार्मिक उद्देश्य के लिए उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है।’

उन्होंने न्यायालय को बताया कि ‘विवादित परिसर वास्तव में एक सरस्वती मंदिर है…।’ उन्होंने विवादित स्थल की तस्वीरें साझा कीं, जिनमें शिलालेख भी शामिल थे, जिनके बारे में उन्होंने दावा किया कि वे संस्कृत और पाली मूल के हैं। इसके अलावा प्राचीन हिंदू मंदिर के स्तंभ, एक मंदिर का मंडप और देवता की मूर्ति की तस्वीरें भी प्रस्तुत की गई।

एएसआई की सर्वे रिपोर्ट में क्या था?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 2024 में यह सर्वे किया था। एएसआई ने 22 मार्च, 2024 से सर्वे शुरू किया जो 27 जून, 2024 तक चला। कुल 98 दिन तक सर्वे हुआ। एएसआई के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने 10 दिन का अतिरिक्त समय दिया था। एएसआई ने तब 2000 से अधिक पन्नों की अपनी सर्वे रिपोर्ट कोर्ट में जमा कराई थी।

एएसआई ने सर्वे के दौरान खुदाई कराई, जिसकी वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी भी की गई। साथ ही इसमें ग्राउंड पेनिट्रेट रडार (जीपीआर) और ग्लोबल सिस्टम (जीपीएस) की सहायता ली गई।

इस सर्वे के दौरान एएसआई को कई अवशेष मिले थे। इसमें कई मूर्तियां हैं। उनमें भगवान कृष्ण, हनुमान, शिव, ब्रह्मा, वाग देवी, गणेश, पार्वती, भैरवनाथ आदि देवी देवताओं की मूर्तियां शामिल हैं। इसके अलावा परिसर की कुछ दीवारों, खंभों पर कई ऐसे चिन्ह और आकृतियां मिलीं, जिन्हें हिंदू मंदिर स्थापत्य से जुड़ा माना गया। संस्कृत श्लोक, शिलालेख और हिंदू धार्मिक प्रतीकों के प्रमाण मिलने की भी बात सामने आई थी।

एएसआई रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा ढांचे से पहले यहां परमार राजाओं के समय की एक विशाल हिंदू मंदिर की संरचना मौजूद थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अंग्रेजों के शासनकाल में भी भोजशाला का सर्वे हुआ था। इसके अलावा 1987 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में भी भोजशाला से हिंदू धर्म से जुड़ी 32 मूर्तियां मिली थीं।

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...

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