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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जन्मसिद्ध नागरिकता को बरकरार रखा, ट्रंप के आदेश को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिकार को बरकरार रखा है जबकि ट्रंप प्रशासन द्वारा पहले के आदेश में इसे रद्द कर दिया गया था। यह अधिकार लंबे समय से अमेरिकी समाज का अहम हिस्सा रहा है। इस फैसले से आव्रजन (इमिग्रेशन) पर सख्ती बरतने की ट्रंप की अहम प्राथमिकताओं में से एक पर रोक लग गई है।

वाशिंगटन: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (30 जून) को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस कोशिश को खारिज कर दिया जिसके तहत वे अमेरिका में जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता (बर्थराइट सिटिजनशिप) को सीमित करना चाहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिकार को बरकरार रखा है जबकि ट्रंप प्रशासन द्वारा पहले के आदेश में इसे रद्द कर दिया गया था। यह अधिकार लंबे समय से अमेरिकी समाज का अहम हिस्सा रहा है। इस फैसले से आव्रजन (इमिग्रेशन) पर सख्ती बरतने की ट्रंप की अहम प्राथमिकताओं में से एक पर रोक लग गई है।

6-3 के बंटवारे वाले फैसले में जजों ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें ट्रंप के उस एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर रोक लगा दी गई थी। इस ऑर्डर में अमेरिकी एजेंसियों को निर्देश दिया गया था कि वे अमेरिका में पैदा हुए उन बच्चों की नागरिकता को मान्यता न दें जिनके माता-पिता में से कोई भी अमेरिकी नागरिक या कानूनी तौर पर स्थायी निवासी (जिसे “ग्रीन कार्ड” होल्डर भी कहा जाता है) नहीं है।

डोनाल्ड ट्रंप ने जन्मसिद्ध नागरिकता के विरुद्ध जारी किया था आदेश

गौरतलब है कि ट्रंप ने पिछले साल पद संभालने के पहले ही दिन यह ऑर्डर जारी किया था। यह ऑर्डर कानूनी और गैर-कानूनी इमिग्रेशन पर सख्ती करने वाली कई नीतियों का हिस्सा था। आलोचकों ने रिपब्लिकन राष्ट्रपति पर इमिग्रेशन के मामले में नस्लीय और धार्मिक भेदभाव करने का आरोप लगाया है।

मंगलवार को कोर्ट का फैसला आने से पहले ट्रंप ने संकेत दिया कि अगर फैसला उनके खिलाफ भी आता है तो भी जन्म के आधार पर नागरिकता (बर्थराइट सिटिजनशिप) को खत्म करने की उनकी कोशिशें जारी रह सकती हैं। ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक न्यूज आर्टिकल का लिंक शेयर किया। इस आर्टिकल में अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं की उन कोशिशों का जिक्र था जिनके तहत ऐसे कानून पास करने की योजना है जो सफल होने पर जन्म के आधार पर नागरिकता को लगभग खत्म कर देंगे।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप प्रशासन और रिपब्लिकन पार्टी के पास इतने महत्वपूर्ण कानून को पारित करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक संसाधन हैं या नहीं। इस साल यह दूसरी बार है जब अदालत ने ट्रंप की किसी बड़ी पहल को अमान्य घोषित किया है। इससे पहले फरवरी में अदालत ने उनके व्यापक वैश्विक टैरिफ को रद्द कर दिया था।

यह भी पढ़ें – सुप्रीम कोर्ट ने एथेनॉल सप्लाई की मौजूदा व्यवस्था रखी बरकरार, सरकार ने बताया प्रयोग

बर्थराइट सिटिजनशिप के पक्षधरों ने अदालत में क्या तर्क दिए?

डोनाल्ड ट्रंप के जन्म के आधार पर नागरिकता (बर्थराइट सिटिजनशिप) देने वाले आदेश को चुनौती देने वालों का तर्क था कि यह अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन का उल्लंघन करता है। यह संशोधन उन लोगों को नागरिकता देता है जो अमेरिका में पैदा हुए हैं और “वहां के अधिकार-क्षेत्र के अधीन” हैं।

ट्रंप के आदेश के खिलाफ कानूनी चुनौती में न्यू हैम्पशायर में माता-पिता और बच्चों द्वारा दायर एक ‘क्लास-एक्शन’ मुकदमा शामिल था जिनकी नागरिकता पर इस आदेश से खतरा मंडरा रहा था।

14वें संशोधन की व्याख्या लंबे समय से इस तरह की जाती रही है कि यह अमेरिका में पैदा हुए बच्चों को नागरिकता की गारंटी देता है जिसमें केवल कुछ खास अपवाद हैं – जैसे विदेशी राजनयिकों या दुश्मन की कब्जा करने वाली सेना के सदस्यों के बच्चे। जिस प्रावधान की बात हो रही है उसे ‘नागरिकता क्लॉज’ कहा जाता है। इसमें लिखा है कि ” संयुक्त राज्य अमेरिका में पैदा हुए या वहां की नागरिकता पाने वाले सभी लोग जो वहां के अधिकार-क्षेत्र में आते हैं वे संयुक्त राज्य अमेरिका और उस राज्य के नागरिक हैं जहां वे रहते हैं। “

प्रशासन का कहना है कि ” वहां के अधिकार-क्षेत्र में आने ” वाले वाक्यांश का मतलब है कि नागरिकता के लिए सिर्फ संयुक्त राज्य अमेरिका में पैदा होना काफी नहीं है। इसमें उन प्रवासियों के बच्चे शामिल नहीं हैं जो देश में गैर-कानूनी तरीके से रह रहे हैं या जिनका यहां रहना कानूनी तो है लेकिन कुछ समय के लिए ही है जैसे यूनिवर्सिटी के छात्र या वर्क वीजा पर आए लोग।

प्रशासन का तर्क है कि नागरिकता केवल उन्हीं लोगों के बच्चों को दी जाती है जिनकी “मुख्य निष्ठा” संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रति है जिसमें नागरिक और स्थायी निवासी शामिल हैं। ऐसी निष्ठा ” कानूनी निवास ” के जरिए तय होती है जिसे प्रशासन के वकील ” किसी देश में कानूनी और स्थायी रूप से रहने और वहीं बने रहने के इरादे ” के तौर पर परिभाषित करते हैं।

जब 1 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई की तो ट्रंप अमेरिका की सबसे बड़ी अदालत में बहस के दौरान मौजूद रहने वाले पहले मौजूदा राष्ट्रपति बनकर इतिहास रच गए। हालांकि, प्रशासन के खिलाफ बहस करने वाले वकील के अपनी बात शुरू करने के कुछ ही देर बाद वे बीच में ही चले गए।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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