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दृश्यम: फिर से ‘अक्स तमाशा’- प्रतिरूप से प्रतिद्वंदिता

लोककथाएँ अक्सर सिर्फ अतीत की स्मृतियाँ नहीं होतीं, वे मनुष्य के भीतर छिपे उन अंधेरों और इच्छाओं को भी उजागर करती हैं, जिन्हें आधुनिक सभ्यता लगातार ढँकती रहती है। कुछ इसलिए भी लोककथाओं के भीतर छिपे मनुष्य के सबसे गहरे भय, आकर्षण और आत्म-संघर्ष को रंगमंच पर रूपायित करना आसान नहीं होता। चंद्रशेखर काम्बार के चर्चित नाटक ‘सिरी शंपिगे’ पर आधारित ‘अक्स तमाशा’ इसी कठिन काम को संभव करता है। भानु भारती की यह नई प्रस्तुति सिर्फ उनके पुराने नाटक की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि प्रतिरूप, आत्म-विभाजन, यौनिकता और लोकस्मृतियों की नई रंग-व्याख्या है, जहाँ मनुष्य अपने ही अक्स से जूझता दिखाई देता यह प्रस्तुति इस नाटक को सिर्फ पुनर्जीवित नहीं करती, बल्कि उसे हमारे समय के बेचैन मनुष्य के और अधिक निकट ले आती है। उस मनुष्य के, जो अपने ही अक्स से मोहित भी है और उससे भयभीत भी।

तीस साल पहले सन् 1996 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रंगमंडल ने चंद्रशेखर कांबार का लिखा कन्नड़ नाटक ‘सिरी शंपिगे’ ‘अक्स तमाशा’ नाम से किया था। निर्देशक थे भानु भारती। अनुवाद राम गोपाल बजाज का था।

इतने बरसों के बाद फिर से वही नाटक पिछले हफ्ते हुआ। निर्देशक वही, यानी भानु भारती। अनुवाद भी राम गोपाल बजाज वाला ही। लेकिन कलाकार यानी अभिनेता बदल गए। संगीत और वस्त्र सज्जा भी पुराना वाला ही है। तब संगीत दिया था रवि नागर ने, जो लखनऊ के चर्चित संगीत निर्देशक थे। हालांकि रवि नागर अब नहीं हैं, लेकिन जो संगीत उन्होंने बनाया था वही इस बार भी है। वस्त्र सज्जा कृति वर्मा की थी। इस बार भी वही है। पहली बार श्रीराम सेंटर में हुआ था, इस बार ये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के परिसर में ‘अभिमंच’ प्रेक्षागृह में मंचित हुआ। पर इस सबके बावजूद नाटक नया है। या ये कहें कि प्रस्तुति नई है।

आगे बात बढ़ाई जाए, उसके पहले ये बताना भी जरूरी होगा कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लोककथा विशेषज्ञ ए. के. रामानुजन ने कन्नड़ के दो नाटककारों को एक लोककथा सुनाई। नाटककार थे गिरीश कार्नाड और चंद्रशेखर कांबार। दोनों ने उस पर आधारित नाटक लिखे। गिरीश कार्नाड ने जो नाटक लिखा उसका नाम है ‘नाग मंडल’ और कांबार के नाटक का नाम है ‘सिरी शंपिगे’। एक ही लोककथा पर आधारित होने के बावजूद दोनों नाटक अपने मंतव्य में अलग हैं। और दोनों ही सफल रहे।

पर यहां ये भी कहना पड़ेगा कि ‘सिरी शंपिगे’ बनावट और आशय में अधिक संश्लिष्ट है और अपने भीतर आत्म-विभाजन, प्रतिरूप से प्रतिद्वंदिता, यौनिकता, आत्मप्रेम जैसे कई मसलों को समेटे हुए भी है। भानु भारती ने पिछली बार भी और इस दफा भी इन जटिलताओं को अपनी प्रस्तुति में समाहित किया। जिन लोगों ने इसे चालीस साल पहले देखा था (इनमें से एक मैं भी हूं) और इस बार भी देखा, उनको इस बार निरंतरता का भी आभास होगा और नएपन का भी। निरंतरता का इसलिए कि नाटक का जो कथ्य है वो तो वही है और नयापन का इसलिए कि अभिनेता नए हैं और आज के हैं। इस कारण इसका स्वाद पुराना भी है और नया भी।

Theater stage with masked actors in traditional Indian costumes; a blue-clad performer kneels center with a tray, while a woman in a red sari stands on the right holding a plate.

नाटक की संक्षिप्त और संश्लिष्ट कथा ये है— शिवपुर राज परिवार की विधवा रानी मायावती अपने युवा बेटे की शादी कराना चाहती है ताकि वंश बढ़े। लेकिन यहां एक पेंच है। राज्य के कुलदेवताओं ने कहा था कि राजकुमार का सोलह का होते ही विवाह करा देना और ये भी ध्यान रखना कि तब तक ये पानी में अपना अक्स न देखे क्योंकि इसे लेकर दो बाधाएं हैं। एक तो ये कि या तो ये आगे चलकर, कंठ फूटने के बाद, वैरागी हो जाएगा या आत्महत्या कर लेगा। लोककथाओं की यही तो खासियत है, जिसे टालने का प्रयास रानी करती है, वो होकर रहता है। कुमार एक लड़की की एक झलक देखता है और उसके प्रति आकर्षित होता है। वो क्षण भर के लिए ही दिखती है, पर राजकुमार को लगता है वो उसके भीतर समा गई है। कुमार उसे फिर से पाना चाहता है और अपनी मां और पुरोहितों से कहता है कि उसे दो हिस्सों में बांट कर दो घड़ों में रख दिया जाए और कुछ दिनों के बाद उसे खोला जाए। कुमार को लगता है कि एक घड़े में वो होगा और दूसरे में वो ओझल हुई लड़की। राजकुमार के अत्यधिक दबाव की वजह से ऐसा किया जाता है, लेकिन ये क्या हुआ? जब कुछ दिन बाद एक घड़े को खोला जाता है, उससे एक नाग निकलता है और तुरंत जंगल की ओर भाग जाता है। दूसरे घड़े से उसी राजकुमार से मिलता-जुलता एक शख्स निकलता है। राज्य में मान लिया जाता है कि ये वही राजकुमार है। रानी अपने बेटे की शादी शंपा नाम की एक लड़की से करा देती है, जो दूसरे राज्य की राजकुमारी है।

यहीं से एक दूसरा पेंच शुरू हो जाता है। राजकुमार तो रोज रात को महल के समीप एक तालाब के किनारे चला जाता है और पानी में अपना अक्स देखता रहता है। उधर नवब्याहता स्त्री से वही नाग प्रेम करना शुरू कर देता है, जो पहले घड़े से निकला था। कुमार को शक हो जाता है। वो अपनी पत्नी के सतीत्व की परीक्षा करना चाहता है। नवब्याहता सबके सामने उस नाग को पकड़ कर सौगंध खाती है कि वो सती है। लोग उसे देवी मानने लगते हैं। लेकिन कुमार का शक बना रहता है और एक दिन वो उस नाग को राजमहल में पकड़ लेता है और मार देता है। मारने के बाद जब वो उस नाग को देखता है तो पाता है कि ये तो उसका प्रतिरूप है। वो शंपा को भी माफ कर देता है। कुलदेवताओं की भविष्यवाणी सही साबित होती है। राजकुमार नाग के साथ, वो भी मर जाता है।

नाग और राजकुमार के साथ ही एक दूसरी और समानांतर कहानी चलती है— अबली और जबली की। ये दोनों विदूषक हैं और जुड़वां भाई भी। एक जैसे। एक-दूसरे के प्रतिरूप। साथ ही एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी। दोनों में एक की शादी होती है और अंत में एक के मरने के बाद दूसरा भी मर जाता है। यहां भी वही है— एक व्यक्ति के भीतर दूसरे की उपस्थिति और एक के न रहने पर दूसरे का भी इस दुनिया से चले जाना। अबली-जबली की कहानी राजकुमार और नाग की कहानी को अधिक गहरा करती है।

Three performers on stage: two in white masks and matching patterned shirts with orange pants, one gesturing toward a third man in a red robe.
अक्स तमाशा

भानु जी ने इस प्रस्तुति में मुखौटों का भी प्रयोग किया है। राजकुमार और नाग दोनों मुखौटों में हैं। अबली-जबली भी मुखौटे पहने हुए हैं। कुछ और पुरुष पात्र भी मुखौटों में हैं। ये एक युक्ति है— एक व्यक्ति में निहित दूसरे या उसके प्रतिरूप की उपस्थिति को दिखाने की।

किसी एक व्यक्ति के भीतर दूसरा व्यक्ति भी मौजूद होता है— ये धारणा कई संस्कृतियों में है। भारत में ये अर्धनारीश्वर की धारणा में मौजूद है। अर्जेंटीनाई कवि और कथाकार जोर्जे लुई बोर्खेस की कहानी ‘बोर्खेस और मैं’ में भी है। इसके लिए एक जर्मन शब्द ‘डॉपेलगैंगर’ भी है। कुछ लोगों को ये लग सकता है कि कहां ये लोककथा और कहां बोर्खेस की आधुनिक कहानी! ये रिश्ता कैसे होगा? मगर होता है। कई पुरानी कहानियों में ऐसी धारणाएं हैं जो आज की लगती हैं। कांबार ने उसे अपने तरीके से दिखाया है और बोर्खेस ने अपनी शैली में।

दूसरी बात ये कि जो लोक परंपराओं से परिचित हैं वे जानते होंगे कि नाग या सर्प यौनिकता का भी प्रतीक है। कई लोकगीतों में आता है कि एक स्त्री अपनी ननद से कह रही है कि उसका भाई मेरे साथ नहीं है और शरीर में सांप का विष चढ़ रहा है, कौन उसे उतारेगा? इस नाटक में भी शंपा का पति यानी राजकुमार उसके साथ दैहिक संबंध नहीं बना पाता। वो अपने में ही खोया रहता है। अपना ही अक्स पानी में देखता रहता है। अपने पर ही मोहित रहता है। ऐसे में उसकी पत्नी का नाग से यौन संबंध बनता है। वो उसके बच्चे की मां भी बनती है। हालांकि नागों को लेकर भी भारत में कई तरह की मान्यताएं हैं। नागों की पूजा भी होती है। दक्षिण भारत में, विशेषकर केरल में, गांव-गांव में नाग मंदिर होते हैं। बिहार के मिथिला में विषहरा देवी के नाम से सर्पपूजा होती है। ‘अक्स तमाशा’ जिस लोककथा पर आधारित है, उसमें भी नाग की मौजूदगी इस परंपरा की तरफ संकेत है। उत्तर भारत की लोककथाओं में भी नाग से संबंधित कई प्रसंग हैं। महाभारत भी नागों की कथाओं से भरा है। इस तरह प्राचीन भारतीय क्लासिकल और लोक परंपराओं में नागों को लेकर कई प्रसंग हैं। इस नाटक को देखते हुए सबकी याद आती है।

मगर इस नाटक में सिर्फ लोक स्मृतियां ही नहीं हैं। आधुनिक मनुष्य के कई सारे असमंजस और दुविधाएं भी हैं इसमें। विशेषकर आत्म-विभाजन की। ये तो कई बार कहा जाता है कि एक आदमी में कई आदमी होते हैं। कभी-कभी इनका आपस में संतुलन बिठाना कठिन होता है और इस कारण कई अस्तित्ववादी समस्याएं पैदा होती हैं। ‘अक्स तमाशा’ हमें उधर भी ले जाता है। ये इस नाटक का दार्शनिक पहलू है।

On stage, a dancer in a pink traditional outfit stands with eyes closed as a blue-masked performer leans in behind her, while a woman in a red sari watches from the background on the right.
अक्स तमाशा

इस नाटक में मनोवैज्ञानिक ग्रंथियां भी हैं। शंपा नाग के प्रति आकर्षित तो होती है, पर उसके मन में कई संशय भी हैं। परंपरा का दबाव, पति के प्रति सामाजिक दायित्व, सतीत्व की धारणा— ये सब उसके भीतर उठते हैं और आपस में टकराते रहते हैं। एक जगह शंपा कहती है— “उसकी सुंदरता मेरी वासना जगाती है। ख्वाहिशें, जिन्हें मैं नहीं जानती, मेरे सामने कतार बांधे खड़ी हो गई हैं।” और राजकुमार का पानी में रात-रात भर अपनी छवि देखना आत्मप्रेम भर नहीं है? वह उस स्त्री को भी देखना है, जो खोकर फिर उसमें ही समा गई थी। नार्सिसस की कहानी भी याद आती है। अपने से प्रेम करते हुए आप पूरे समाज को, आसपास को भूल जाते हैं। मनुष्य के, पुरुष के और औरत के भीतर के कई गह्वर इस नाटक में हैं और प्रस्तुति में भी वे उभरते हैं।

भानु भारती ने प्रतिरूप की धारणा को दिखाने के लिए मुखौटों का इस्तेमाल किया है। राजकुमार, नाग, अबली-जबली, पुरोहित और राज्य के बुजुर्ग— ये सब मुखौटों में हैं। हालांकि कोई स्त्री पात्र मुखौटे में नहीं है। हालांकि स्त्री पात्र तीन ही हैं— राजमाता, रानी शंपा और कमली। कमली अबली-जबली का प्रेमाकर्षण है और उनमें एक की पत्नी बनती है।

आखिर में एक बात नाटक के अनुवाद पर। राम गोपाल बजाज ने मूल नाटक के भीतर निहित कविता को बरकरार रखा है। हालांकि मूल नाटक कन्नड़ में है, लेकिन हिंदी अनुवाद में अंग्रेजी अनुवाद का भी सहारा लिया गया है। पर हिंदी के मुहावरे इसमें हैं। वैसे यहां ये भी बता देना जरूरी है कि कांबार ने इस नाटक को यक्षगान शैली में लिखा था, जो कर्नाटक की एक पारंपरिक नाट्य शैली है। इसीलिए इसमें भागवत भी है, जो सूत्रधार भी है। पारंपरिक नाट्य शैली में भागवत सूत्रधार भी होता है और बीच-बीच में कुछ और काम भी कर देता है। भानु भारती ने भागवत को तो रखा है लेकिन बाकी नाटक यक्षगान शैली में नहीं है। ऐसा लगता है कि आप एक उत्तर भारतीय शैली का नाटक देख रहे हैं।

A theatrical scene: a woman in a pink sari stands on stage while a performer in blue with an orange mask crouches over a person lying on the floor.
अक्स तमाशा

इस तरह ‘अक्स तमाशा’ सिर्फ एक लोककथा का रंगमंचीय पुनर्पाठ नहीं रह जाता, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे उन अदृश्य द्वंद्वों की कथा बन जाता है, जिनसे वह जीवन भर जूझता रहता है। अपने ही प्रतिरूप से भय, आकर्षण और संघर्ष, यही इस नाटक का केंद्रीय भाव है। भानु भारती की  यह प्रस्तुति लोक और आधुनिकता, मिथक और मनोविज्ञान, देह और आत्मा के बीच एक ऐसा सेतु रचती है, जहाँ दर्शक सिर्फ कथा नहीं देख रहे होते, बल्कि अपने भीतर के कई अक्सों से भी सामना करते हैं। शायद यही कारण है कि दशकों बाद भी यह नाटक सिर्फ प्रासंगिक नहीं, बल्कि और अधिक बेचैन करने वाला और अर्थवान महसूस होता है।

यह भी पढ़ें- दृश्यम: रंगमंच- प्रतिबद्धता से प्रोजेक्ट तक का सफर

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रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी (जन्म 15 फरवरी, 1959), मेदिनीनगर/डालटनगंज, झारखंड। प्रिंट, टेलीविजन और सोशल-मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, नाटककार, साहित्य-फिल्म-कला-रंगमंच आलोचक, व्यंग्यकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर, यू- ट्यूबर, अनुवादक, स्क्रिप्ट-लेखक और संपादक। महात्मा गांधी के जीवन पर `पहला सत्याग्रही’ और स्वामी विवेकानंद के जीवन पर `विवेकानंद इन शिकागो’ नाटक लिखे। `कथा शिवपालगंज की’ , `राग विराग’ और `अज्ञातवास’ (तीनों श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों के नाट्य रूपांतर)। सभी नाटक मंचित। साहित्य अकादेमी और साहित्य कला परिषद के लिए डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण, एबीपी न्यूज के व्यंग्य-शो `पोलखोल’ के स्क्रिप्ट लेखक (शुरू में उसके प्रॉड्यूसर भी)। प्रसन्ना की पुस्तक `इंडियन मेथड इन एक्टिंग’ का `अभिनय की भारतीय पद्धति’ नाम से हिन्दी अनुवाद। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका `रंग प्रसंग’ और केंद्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका `मीडिया विमर्श’ के अतिथि संपादक रहे।
रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी (जन्म 15 फरवरी, 1959), मेदिनीनगर/डालटनगंज, झारखंड। प्रिंट, टेलीविजन और सोशल-मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, नाटककार, साहित्य-फिल्म-कला-रंगमंच आलोचक, व्यंग्यकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर, यू- ट्यूबर, अनुवादक, स्क्रिप्ट-लेखक और संपादक। महात्मा गांधी के जीवन पर `पहला सत्याग्रही’ और स्वामी विवेकानंद के जीवन पर `विवेकानंद इन शिकागो’ नाटक लिखे। `कथा शिवपालगंज की’ , `राग विराग’ और `अज्ञातवास’ (तीनों श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों के नाट्य रूपांतर)। सभी नाटक मंचित। साहित्य अकादेमी और साहित्य कला परिषद के लिए डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण, एबीपी न्यूज के व्यंग्य-शो `पोलखोल’ के स्क्रिप्ट लेखक (शुरू में उसके प्रॉड्यूसर भी)। प्रसन्ना की पुस्तक `इंडियन मेथड इन एक्टिंग’ का `अभिनय की भारतीय पद्धति’ नाम से हिन्दी अनुवाद। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका `रंग प्रसंग’ और केंद्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका `मीडिया विमर्श’ के अतिथि संपादक रहे।
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