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AC गर्मी से तो राहत दिलाता है लेकिन ग्लोबल वार्मिंग की बढ़ोतरी के लिए भी जिम्मेदार है, भविष्य में खोजने होंगे इसके विकल्प!

एसी भले ही गर्मी से राहत देता है लेकिन पर्यावरण को इससे काफी नुकसान होता है और ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के लिए भी जिम्मेदार है।

air conditioners provide relief from the heat they also contribute to global warming alternatives will need to be found in the future, ac
Photo: Grok

नई दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) समेत पूरे भारत में इन दिनों भीषण गर्मी और लू का प्रकोप जारी है। बेतहाशा गर्मी और लू के बीच लोग परेशान हैं और स्वास्थ्य समेत अन्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। अप्रैल 2026 के मध्य तक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे इलाकों में तापमान 43°C से 45°C के बीच दर्ज किया जा चुका था। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने चेतावनी दी थी कि जून तक पूर्वी, मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में सामान्य से ज्यादा दिनों तक लू (हीटवेव) की स्थिति बनी रहेगी। भयंकर गर्मी और हीटवेव से राहत के लिए लोग एसी का इस्तेमाल करते हैं। शहरों के साथ-साथ गांवों में भी एसी का इस्तेमाल बढ़ा है।

एसी भले ही गर्मी से राहत देता है लेकिन पर्यावरण को इससे काफी नुकसान होता है और ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के लिए भी जिम्मेदार है।

गौरतलब है कि हीटवेव (लू) तब घोषित की जाती है जब तापमान सामान्य से कम से कम 4.5°C ज्यादा हो जाए या सीधे 45°C को पार कर जाए। हालांकि, यह साल कोई अपवाद नहीं है कि भीषण गर्मी हो रही है। यह तेजी से गर्म हो रही धरती का नतीजा है। IMD के मुताबिक, 1901 से 2024 के बीच भारत का औसत सालाना तापमान लगभग 0.9°C बढ़ा है।

2024 दुनियाभर का रहा सबसे गर्म साल

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के अध्ययन के मुताबिक, 2024 दुनिया भर में और भारत में भी अब तक का सबसे गर्म साल रहा। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 1850 के बाद से पिछले चार दशकों में से हर दशक अपने पहले वाले दशक की तुलना में ज्यादा गर्म रहा है। 21वीं सदी के पहले दो दशकों (2001–2020) में ग्लोबल सतह का तापमान 1850-1900 की तुलना में 0.99 (0.84 से 1.10) °C ज्यादा था। 2011–2020 में ग्लोबल सतह का तापमान 1850–1900 की तुलना में 1.09 (0.95 से 1.20) °C ज्यादा था।

इसका इंसानों पर भी बुरा असर पड़ा है। अकेले 2024 में हीटस्ट्रोक के 44,000 से ज्यादा मामले और 700 से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं। 734 जिलों के एक आकलन से पता चला है कि भारत के 57% जिले जहां देश की 76% आबादी रहती है गर्मी के ज्यादा या बहुत ज्यादा जोखिम वाले दायरे में हैं।

IMD के अनुसार, 2024 के एक महीने को छोड़कर बाकी सभी महीने सामान्य से ज्यादा गर्म रहे। ऐसा 120 से ज्यादा सालों के रिकॉर्ड रखने के इतिहास में कभी नहीं हुआ।

पिछले दशक में, 1982-2011 के बेसलाइन की तुलना में भारत के लगभग 70 प्रतिशत जिलों में हर गर्मी के मौसम में कम से कम पांच अतिरिक्त बहुत गर्म रातें देखी गईं। जब रात का तापमान कम नहीं होता तो शरीर दिन की गर्मी से उबर नहीं पाता जिससे हीटस्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है और डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी पुरानी बीमारियां और बिगड़ जाती हैं।

भारत के शहर देश के बाकी हिस्सों की तुलना में दोगुनी तेजी से गर्म हो रहे हैं। इसकी वजह ‘अर्बन हीट आइलैंड’ असर है, जिसमें कंक्रीट से बनी घनी इमारतें और सड़कें दिन भर गर्मी सोखती हैं और रात में उसे छोड़ती हैं। पिछले दशक में मुंबई में हर गर्मी के मौसम में ऐसी 15 और बहुत गर्म रातें देखी गईं। बेंगलुरु में 11 और दिल्ली में ऐसे 6 और दिन देखे गए।

ऐसे में भारत में कूलिंग की जरूरत इतनी तेजी से बढ़ रही है कि इससे देश का एनर्जी लैंडस्केप बदल रहा है। कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड एप्लायंसेज मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के मुताबिक, 2024 की गर्मियों में रिकॉर्ड 1.4 करोड़ एयर कंडीशनर बिके, जो पिछले सालों की तुलना में 40% ज्यादा है।

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‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ की 2025 की एक स्टडी में पाया गया कि 2023 की गर्मियों में बिजली की औसत मांग में 41% की बढ़ोतरी हुई और भारत में पीक डिमांड 220 GW तक पहुंच गई। तापमान के लगभग 24°C से ऊपर जाते ही मांग तेजी से बढ़ती है। यह वह सीमा है जिसके बाद बड़े पैमाने पर कूलिंग उपकरण चलने लगते हैं।

एसी के इस्तेमाल की संख्या बढ़ने के कारण पावर ग्रिड पर भी दबाव बढ़ता है। AC के ज्यादा इस्तेमाल का असर घरों के बजट पर दिख रहा है। इसके अलावा पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी यह एक चिंता का विषय है।

AC कैसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है?

भारत जैसे देश में गर्मी से निपटना बेहद चुनौतीपूर्ण है। गर्मी से निपटने की चुनौती के बीच एक दुखद विरोधाभास छिपा है। जो मशीनें लोगों को भीषण गर्मी से बचाती हैं वे ही ग्लोबल वार्मिंग को भी बढ़ाती हैं जिससे गर्मी और भी ज्यादा हो जाती है।

एसी पर्यावरण पर दो तरह से बुरा असर डालता है। पहला बिजली पर जहां भारत का पावर ग्रिड अभी भी मुख्य रूप से कोयले पर चलता है, इसलिए जब भी कोई AC चलता है, तो उसे ज्यादातर बिजली थर्मल पावर प्लांट से मिलती है। 2023 में गर्मियों के दौरान ठंडक की जरूरत को पूरा करने के लिए फॉसिल फ्यूल से बनने वाली बिजली का उत्पादन 2,853 मिलियन यूनिट बढ़ गया, जिससे 2 मिलियन टन अतिरिक्त CO2 का उत्सर्जन हुआ।

दूसरी समस्या रेफ्रिजरेंट की है, जो AC यूनिट के अंदर इस्तेमाल होने वाले केमिकल फ्लूइड होते हैं। इनमें से कई हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) परिवार से आते हैं। स्प्लिट AC में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले रेफ्रिजरेंट R-410A का ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल CO2 से 2,000 गुना ज्यादा है। UN एनवायरनमेंट प्रोग्राम का अनुमान है कि जैसे-जैसे कूलिंग की मांग बढ़ेगी 2050 तक ग्लोबल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में रेफ्रिजरेंट की हिस्सेदारी 10% से ज्यादा हो सकती है।

शहर के घने इलाकों में हर AC से निकलने वाली गर्म हवा, भले ही कम मात्रा में हो लेकिन हर किसी के लिए गर्मी बढ़ा रही है। उन लोगों के लिए भी जो खुद को ठंडा रखने का खर्च नहीं उठा सकते। यहां पर यह संकट और भी गंभीर हो जाता है।

बाहर काम करने वालों, गिग डिलीवरी राइडर्स, खेतिहर मजदूरों और झुग्गी-बस्तियों में रहने वालों के लिए सवाल यह नहीं है कि कौन सा AC खरीदें या उसकी स्टार रेटिंग क्या है। उनके लिए असली सवाल यह है कि दोपहर की गर्मी में कैसे बचा जाए।

भारत का कूलिंग संकट असल में एक जलवायु संकट है, और यह संकट खुद को ही और बढ़ाता रहता है। पृथ्वी जितनी ज्यादा गर्म होगी, लोगों को उतने ही ज्यादा AC की जरूरत होगी। कोयले से चलने वाले ग्रिड पर जितने ज्यादा AC चलेंगे और उनसे रेफ्रिजरेंट लीक होंगे, उतना ही ज्यादा एमिशन बढ़ेगा और यह चक्र और गहरा होता जाएगा।

इस चक्र को तोड़ने के लिए बेहतर मशीनें, स्मार्ट ग्रिड, साफ-सुथरे रेफ्रिजरेंट, कड़े स्टैंडर्ड और सबसे बढ़कर उन लोगों की सुरक्षा के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है जो गर्मी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। जबकि इस गर्मी को पैदा करने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी लेकिन इसकी कीमत सबसे ज्यादा उन्हें ही चुकानी पड़ती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि एसी का विकल्प क्या आने वाले सालों में कारगर होगा या इससे बेहतर कोई उपाय खोजना होगा जिससे ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरों को कम किया जा सके।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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