चेन्नईः तमिलनाडु की राजनीति में इन दिनों काफी हलचल देखने को मिल रही है। मंगलवार (12 मई) तो राज्य की प्रमुख पार्टियों में शुमार एआईएडीएमके (AIADMK) में बड़ी टूट दिखाई दी। पार्टी के एक धड़े ने वरिष्ठ नेताओं एस पी वेलुमणी और सी वी शनमुघम के नेतृत्व में एक बड़े गुट ने विजय की तमिलगा वेट्री कजगम (टीवीके) सरकार को समर्थन देने और मंत्रिमंडल में शामिल होने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया। पार्टी की दिवंगत नेता जे जयललिता की मृत्यु के बाज पार्टी में फूट की अंदरूनी खबरें कई बार आईं हालांकि मंगलवार को नई सरकार के बनने के बाद ही यह खुलकर सामने आ गया।
पार्टी में हुए इस बिखराव के साथ ही एआईएडीएमके के महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पाडी के पलानीस्वामी (ईपीएस) के नाम से भी जाना जाता है। वह पार्टी में एक सिकुड़ते हुए अल्पसंख्यक समूह में सिमट गए जिसे एकजुट रखने के लिए उन्होंने लगभग एक दशक तक संघर्ष किया था।
AIADMK में हुई टूट की घोषणा
चेन्नई में मंगलवार सुबह टूट की घोषणा करते हुए सी वी शनमुघम ने एआईएडीएमके के दशकों पुराने राजनीतिक विरोध के बावजूद डीएमके के साथ गठबंधन करने की कोशिश करने के लिए ईपीएस पर आरोप लगाया। उन्होंने कहा “एआईएडीएमके की स्थापना डीएमके के विरोध में हुई थी। पांच दशक तक हमने उनके खिलाफ राजनैतिक रूप से लड़ाई लड़ी। लेकिन ईपीएस ने डीएमके के समर्थन से सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा और उन्हें मुख्यमंत्री बनने के लिए हमारा समर्थन मांगा। इस विचार के लिए कोई भी विधायक सहमत नहीं हुआ। हम स्तब्ध रह गए।”
उन्होंने कहा कि बागी विधायकों ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया और एआईएडीएमके और अम्मा के आंदोलन को बचाने के व्यापक हित में विजय की टीवीके सरकार को समर्थन देने का फैसला किया।

शनमुघम ने कहा कि बागी खेमे ने पूर्व मंत्री एस पी वेलुमणि को अपना विधायक दल का नेता चुना है और विधानसभा सचिव को पत्र लिखकर इस फैसले की जानकारी दी है। उन्होंने कहा, “हमें सामूहिक रूप से हार का सामना करना पड़ा है और हम इसकी सामूहिक जिम्मेदारी लेते हैं। हम किसी व्यक्ति विशेष को दोष नहीं दे रहे हैं। लेकिन एमजीआर द्वारा स्थापित और अम्मा द्वारा मजबूत की गई इस पार्टी को अब बचाना जरूरी है।”
ईपीएस के जन्मदिन पर हुआ घटनाक्रम
ईपीएस खेमे से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने कहा “यह शायद ईपीएस के राजनीतिक जीवन का सबसे नाजुक दिन है। दुर्भाग्य से एआईएडीएमके का आधिकारिक विभाजन उनके जन्मदिन पर ही हो रहा है।”
उन्होंने आगे कहा, “धीरे-धीरे, ईपीएस के साथ अभी भी मौजूद विधायक भी पार्टी बदल लेंगे। ईपीएस नए ओपीएस बन सकते हैं।” उन्होंने ओ पन्नीरसेल्वम का जिक्र करते हुए कहा कि वह अब डीएमके में हैं और जिन्हें उन्होंने दरकिनार कर दिया था। पन्नीरसेल्वम एआईडीएमके में रहते हुए राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं।
शनमुघम ने हालांकि सार्वजनिक रूप से इस विभाजन को डीएमके के समर्थन से सरकार बनाने की ईपीएस की कथित इच्छा के खिलाफ विद्रोह के रूप में पेश किया।
गौरतलब है कि राज्य में चुनावी नतीजों के बाद किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। विजय की पार्टी टीवीके को सर्वाधिक 108 सीटों पर जीत मिली थी। यह संख्या 234 विधानसभा सदस्यों की संख्या में बहुमत से 10 सीटें कम थी। ऐसे में कांग्रेस समेत वीसीके और लेफ्ट पार्टियों ने टीवीके को समर्थन दिया और सरकार का गठन किया।
इस बीच हालांकि, ऐसी खबरें भी आ रही थीं कि दशकों तक एक-दूसरे की विरोधी रही पार्टियां डीएमके और एआईएडीएमके मिलकर सरकार बनाने की कोशिश कर रही हैं।

