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‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ से ‘अबकी बार मोदी सरकार’ तक… विज्ञापन के दिग्गज गुरु पीयूष पांडे का निधन

पीयूष पांडे का जन्म 1955 में जयपुर के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पढ़ाई के बाद उन्होंने अपने दोस्त और क्रिकेटर अरुण लाल के साथ टी-टेस्टर के रूप में काम शुरू किया। वहीं से उनके भीतर का रचनाकार जागा।

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भारतीय विज्ञापन जगत के सबसे बड़े नामों में से एक पीयूष पांडे का गुरुवार निधन हो गया। वह 70 वर्ष के थे। कुछ समय से वे संक्रमण से जूझ रहे थे। पीयूष पांडेय के निधन की जानकारी उनकी बहन तृप्ति पांडे ने इंस्टा पोस्ट पर दी।

उन्होंने लिखा, “हमारे प्रिय भाई, पीयूष पांडे – आज सुबह इस दुनिया को अलविदा कह गए। वह सिर्फ भारतीय विज्ञापन जगत के सितारे नहीं थे बल्कि उन लाखों दिलों में चमकते रहेंगे, जिन्हें उनकी संवेदनशील लाइनों ने छू लिया था।”

उनके निधन पर व्यापार, विज्ञापन और राजनीति जगत की कई हस्तियों ने शोक व्यक्त किया।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने श्रद्धांजलि देते हुए एक्स पर लिखा, “श्री पीयूष पांडे के निधन की खबर सुनकर गहरा दुःख हुआ। भारतीय विज्ञापन जगत के दिग्गज और किंवदंती रहे पांडे जी ने आम बोलचाल की भाषा, जमीन से जुड़ा हास्य और सच्ची भावनाओं के जरिए विज्ञापन को एक नया आयाम दिया। मुझे कई अवसरों पर उनसे मिलने और बातचीत करने का सौभाग्य मिला। उनके परिवार, मित्रों और पूरी रचनात्मक बिरादरी के प्रति मेरी संवेदनाएँ। उनका काम और विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।”

कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक उदय कोटक ने शोक जताते हुए कहा, “दुख है कि पीयूष पांडे अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने 2003 में कोटक महिंद्रा बैंक के लॉन्च के लिए ‘कॉमन सेंस बैंकिंग’ अभियान बनाया था। वे अद्भुत रचनात्मक सोच वाले और बेहद विनम्र व्यक्ति थे। उन्होंने भारतीय संदर्भ में रचनात्मकता को बखूबी पिरोया। उनकी बहुत कमी महसूस होगी।”

लेखक और स्तंभकार सुहेल सेठ ने उन्हें अपना प्रिय मित्र बताते हुए कहा, “भारत ने सिर्फ एक महान विज्ञापन मस्तिष्क ही नहीं, बल्कि एक सच्चे देशभक्त और असाधारण सज्जन व्यक्ति को खो दिया है। अब स्वर्ग में भी ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ गूंजेगा।”

पीयूष पांडे का अंतिम संस्कार शनिवार सुबह मुंबई के शिवाजी पार्क में किया जाएगा।

कहानियों में बसता था उनका विज्ञापन

पीयूष पांडे का जन्म 1955 में जयपुर के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता एक बैंककर्मी थे। वे बचपन से ही रचनात्मक और खेलों के शौकीन थे।

दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पढ़ाई के बाद उन्होंने अपने दोस्त और क्रिकेटर अरुण लाल के साथ टी-टेस्टर के रूप में काम शुरू किया। वहीं से उनके भीतर का रचनाकार जागा। अरुण लाल ने ही सलाह दी कि वे विज्ञापन की दुनिया में कदम रखें। कुछ समय बाद पीयूष मुंबई आए और ओगिल्वी में नौकरी पाई,जहां से उनकी 40 साल लंबी रचनात्मक यात्रा शुरू हुई।

इस यात्रा की नींव उनके बचपन में ही पड़ गई थी। उनकी बहन, गायिका इला अरुण, जयपुर में रेडियो जिंगल्स बनाती थीं। पीयूष उन जिंगल्स में अपनी आवाज दिया करते थे, जिसके लिए उन्हें 50 रुपए मिलते थे। घर के छोटे से स्टूडियो में उन्होंने पहली बार शब्दों और ध्वनि की ताकत को महसूस किया।

27 वर्ष की उम्र में उन्होंने ऐसे दौर में काम शुरू किया जब विज्ञापन का चेहरा पूरी तरह अंग्रेजी और अभिजात्य था। पीयूष पांडे ने इसे तोड़कर आम भारतीय की भाषा और भावनाओं में बोलने वाले विज्ञापन बनाए। उनका पहला पहचानने योग्य विज्ञापन था “चल मेरी लूना”, जिसे उन्होंने पड़ोसी के टेलीविजन की खिड़की से देखा था क्योंकि उन्होंने खुद टीवी नहीं खरीदा था। इसके बाद कैडबरी का “कुछ खास है”, फेविकोल का बस वाला विज्ञापन और एशियन पेंट्स का “हर खुशी में रंग लाए” जैसे अभियानों ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय कर दिया। उनका मानना था कि “हर व्यक्ति के भीतर एक बच्चा होता है, जिसे बड़े होने पर हम छिपाने लगते हैं।” यही सोच उनके कैडबरी विज्ञापन में झलकती थी।

पीयूष का रचनात्मक सफर सिर्फ ब्रांड्स तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने “अब की बार, मोदी सरकार” और “अच्छे दिन आने वाले हैं” जैसे राजनीतिक नारों को भी गढ़ा। वहीं “मिले सुर मेरा तुम्हारा” जैसी कालजयी रचना ने उन्हें देश की सामूहिक भावना से जोड़ दिया। ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ उन्होंने 1987 में लिखी थी।

बता दें कि पीयूष पांडे चार दशक से अधिक समय तक ओगिल्वी इंडिया (Ogilvy India) का चेहरा रहे। कंपनी के वर्ल्डवाइड चीफ क्रिएटिव ऑफिसर और इंडिया के एग्जिक्युटिव चेयरमैन थे। उनके नेतृत्व में ओगिल्वी इंडिया लगातार 12 साल तक इकोनॉमिक टाइम्स एजेंसी रेकनर में नंबर वन विज्ञापन एजेंसी बनी रही। उन्होंने विज्ञापन को अंग्रेजी के कुलीनवर्ग से निकालकर भारत की मिट्टी की सादगी और भावना से जोड़ने का काम किया।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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