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चिठिया हो तो हर कोई बांचे: महादेवी का पत्र- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के नाम

समाज, राजनीति, साहित्य और संस्कृति की दुनिया में घटित प्रेम से संवाद और संवाद से विवाद तक की जाने कितनी कहानियाँ बीते ज़माने में लिखे गए पत्रों की इबारतों में छुपी हुई हैं। संचार की क्रांति ने भौगोलिक दूरी को तो समाप्त किया ही, उसके साथ आत्मीयता, सुकून, बेचैनी, इंतज़ार और काग़ज़ तथा लिखावट की ख़ुशबू से जुड़े वे अहसास भी कहीं खो गए। ‘चिठिया हो तो हर कोई बाँचे’ नामचीन साहित्यकारों, विचारकों और कलाकारों की सहेज कर रखी जाने लायक ऐसी ही चिट्ठियों को आप तक पहुँचाने का एक विशेष सिलसिला है।

इसकी नवीनतम कड़ी के रूप में पढ रहे हैं वो पत्र जो हिंदी साहित्य की नैतिक करुणा का सबसे सुंदर उदाहरण है। महादेवी यहाँ कोई सामान्य महिला या समकालीन लेखक नहीं हैं-वे एक सजग मनुष्य हैं, जो सृजनशील व्यक्ति को बिखरते हुए देख रही हैं। निराला का प्रत्युत्तर भी यहां किसी महान कवि का वक्तव्य नहीं। एक थके हुए, पर आत्मसम्मानी मनुष्य की आवाज़ है, जो सहायता अस्वीकार नहीं करती, लेकिन अनुकंपा का बोझ भी नहीं उठाना चाहती। यह स्वाभिमान भी निराला की कविता की तरह ही कठोर और उज्ज्वल है।

महादेवी वर्मा का पत्र : सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के नाम

इलाहाबाद

आदरणीय निराला जी,
आपके विषय में जो समाचार मिलते हैं, वे मुझे चैन से बैठने नहीं देते। आपकी असुविधाएँ, आपकी उपेक्षा, और वह अडिग स्वाभिमान- सब एक साथ मन को व्याकुल कर देते हैं।

मैं जानती हूँ, आप किसी की सहानुभूति नहीं चाहते। पर इसे सहानुभूति न समझिए- यह एक सहयात्री की चिंता है। आप जिस कठिन जीवन को इतनी दृढ़ता से जी रहे हैं, वह हम सबके लिए एक मौन प्रश्न छोड़ जाता है- क्या सृजन की यही शर्त है?

आपसे निवेदन है, यदि संभव हो तो कुछ दिन हमारे यहाँ आकर रहिए। यह आग्रह नहीं, अपनेपन का अधिकार है।
आपकी कविताएँ हमारे समय का विवेक हैं। और विवेक को अकेले मरने नहीं देना चाहिए।

आपकी
महादेवी

(संदर्भ ग्रंथ : महादेवी वर्मा रचनावली, प्रकाशक: साहित्य अकादमी,पत्र-काल: 1930 का दशक)

निराला का प्रत्युत्तर : महादेवी वर्मा के नाम

दरभंगा

महादेवी,
तुम्हारा पत्र मिला। और सच कहूँ- उसने मुझे कुछ देर के लिए कम अकेला कर दिया।

मैं जानता हूँ, मेरे हालात लोगों को विचलित करते हैं। पर यही जीवन अब मेरा स्वभाव बन चुका है। मैं किसी आश्रय से डरता नहीं हूँ, लेकिन किसी पर बोझ बन जाने से बहुत डरता हूँ।

मेरी कविता यदि किसी काम की है, तो वह इसी संघर्ष से निकली है। इसे कम कर देना शायद उसके साथ बेईमानी होगी।

फिर भी- तुम्हारा स्नेह मुझे स्वीकार है। वह ऐसा है जिसमें अपमान नहीं। यदि आ सका, तो तुम्हारे यहाँ कुछ दिन ठहरूँगा-

निराला की तरह नहीं, सिर्फ़ एक आदमी की तरह।

  • निराला

(संदर्भ ग्रंथ: निराला पत्रावली, संपादक: रामविलास शर्मा, प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, पत्र-काल: 1930 का दशक)

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कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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