1991 में जब मैं शैक्षिक उद्देश्यों से पटना आया और वहाँ की जनवादी नाट्य संस्था प्रेरणा से जुड़ा, तब शायद अंदाज़ा नहीं था कि मैं भारतीय रंगमंच के एक ऐसे दौर का साक्षी बनने जा रहा हूँ, जिसे आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो वह लगभग स्वर्णकाल प्रतीत होता है। यह स्वर्णकाल किसी सरकारी घोषणा या संस्थागत मान्यता से निर्मित नहीं था- यह रंगकर्मियों की प्रतिबद्धता, वैचारिक बेचैनी और सामाजिक जुड़ाव से निर्मित था।
उस समय रंगमंच केवल प्रस्तुति नहीं था, वह एक जीवित बौद्धिक प्रक्रिया था- एक ऐसा मंच जहाँ विचार पैदा होते थे, टकराते थे, और फिर समाज में हस्तक्षेप की शक्ल लेते थे।
बहसों का समय, निर्माण का समय
पटना ही नहीं, पूरे देश में रंगमंच के भीतर वैचारिक बहसें होती थीं- तीखी, असहमतिपूर्ण, लेकिन सार्थक। राजनीतिक पक्षधरता क्या हो, रंगमंच की सामाजिक भूमिका क्या हो, कला और आंदोलन का रिश्ता क्या हो- इन प्रश्नों पर लगातार मंथन चलता रहता था।
यह मंथन केवल वैचारिक जुगाली नहीं था। उसके साथ-साथ अध्ययन, आत्मालोचना और प्रयोग की एक ठोस प्रक्रिया जुड़ी रहती थी। दुनिया भर का साहित्य पढ़ना, वैकल्पिक विचारधाराओं से परिचित होना, नाट्य-परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन करना- यह सब रंगकर्म का स्वाभाविक विस्तार था।
यानी रंगमंच उस समय केवल ‘करने या खेलने’ की चीज़ नहीं था- वह समझने और बदलने की प्रक्रिया भी था।
मंच से सड़क तक : समाज के बीच रंगमंच
उस दौर का रंगकर्मी मंच का प्राणी भर नहीं था; वह समाज का सक्रिय नागरिक था। वह कारखानों के गेट पर था, मज़दूर बस्तियों में था, किसान आंदोलनों में था, नागरिक अधिकारों की लड़ाइयों में था। नुक्कड़ नाटक कोई “फॉर्मेट” नहीं, राजनीतिक-सांस्कृतिक हस्तक्षेप का औज़ार था। प्रोसीनियम और नुक्कड़ के बीच कोई दूरी नहीं थी- दोनों मिलकर एक ही वैचारिक धारा का निर्माण करते थे।
नाटक की सफलता का पैमाना भी स्पष्ट था- क्या वह दर्शक को बेचैन करता है? क्या वह उसके भीतर सवाल पैदा करता है? क्या वह उसे यथास्थिति के खिलाफ़ खड़ा होने का साहस देता है? जो नाटक यह नहीं कर पाता था, वह चाहे जितना कलात्मक क्यों न हो, उसे केंद्रीय स्थान नहीं मिलता था। यानी उस समय रंगमंच का केंद्र सौंदर्य नहीं, सत्य था।
स्वायत्तता : संसाधनों से अधिक मूल्य
उस समय रंगमंच के सामने संसाधनों की कमी थी, परंतु आत्मसम्मान की नहीं। सरकारी या कॉरपोरेट अनुदानों की अनुपस्थिति को कमजोरी नहीं, स्वतंत्रता की शर्त माना जाता था। यह समझ विकसित थी कि जिस क्षण रंगमंच बाहरी संसाधनों पर निर्भर होगा, उसी क्षण उसकी भाषा, उसकी दिशा और उसका साहस नियंत्रित होने लगेगा।
इसलिए रंगमंच समाज पर निर्भर था- और यही उसका वास्तविक निवेश था। चंदा, टिकट बुकिंग, डिब्बा-कलेक्शन- ये सब केवल आर्थिक उपाय नहीं थे, बल्कि समाज के साथ रिश्ते की पुनर्स्थापना के तरीके थे। इस प्रक्रिया में रंगकर्मी सीखता था कि दर्शक कोई “कंज्यूमर” नहीं, बल्कि सहभागी है- वह नाटक का हिस्सा है।
बदलाव की दरार : अनुदान और प्रबंधन का उदय
फिर समय बदला। अनुदान आया- और उसके साथ एक नई मानसिकता आई। शुरुआत में इसे सहयोग समझा गया, पर धीरे-धीरे यह नियंत्रण में बदल गया। रंगमंच के केंद्र में अब अभिनेता या लेखक नहीं, प्रबंधन आ गया। निर्देशक की भूमिका सृजनात्मक नेतृत्व से हटकर प्रशासनिक नियंत्रण में बदलने लगी। वह अब विचारों का संवाहक कम, संसाधनों का प्रबंधक अधिक हो गया।
यहाँ से एक ख़तरनाक धारणा जन्म लेती है- कि जो अनुदान जुटा सकता है, वही नाटक बना सकता है। यानी योग्यता का पैमाना बदल गया।
नाटक का प्रोजेक्टीकरण
धीरे-धीरे नाटक “प्रोजेक्ट” बन गया। अब उसकी शुरुआत विचार से नहीं, प्रस्ताव से होती है। उसकी यात्रा मंच से नहीं, फाइल से गुजरती है। और उसका अंत दर्शक की स्मृति में नहीं, रिपोर्ट की फाइल में होता है।
यह प्रक्रिया रंगमंच की आत्मा के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हुई। कथ्य कमजोर हुआ, जोखिम खत्म हुआ, और सबसे बढ़ कर- ईमानदारी हाशिये पर चली गयी।
आज का यथार्थ : सुविधा का सांस्कृतिक जाल
आज रंगमंच सुविधाओं से लैस है- लेकिन वह पहले से अधिक निर्बल है। भव्य मंच, उन्नत तकनीक, व्यापक प्रचार- सब कुछ मौजूद है। गायब है तो केवल वह बेचैनी जो कला को जीवित रखती है।
आज का रंगमंच एक अजीब द्वंद्व में है- वह प्रतिरोध की भाषा बोलता है, पर व्यवस्था के भीतर सुरक्षित रहता है। यानी विरोध भी अब अनुमोदित हो गया है।
सांस्कृतिक नौकरशाही का उदय
अनुदान आधारित संरचना ने एक नई किस्म की सांस्कृतिक नौकरशाही पैदा की है। यह नौकरशाही तय करती है कि कौन महत्वपूर्ण है, कौन नहीं; किसे मंच मिलेगा, किसे नहीं; किस विचार को जगह मिलेगी, किसे नहीं। इस प्रक्रिया में रंगमंच का लोकतांत्रिक चरित्र समाप्त होता जाता है।
जो लोग इस संरचना के बाहर हैं, वे धीरे-धीरे हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं- चाहे उनकी रचनात्मकता कितनी ही प्रखर क्यों न हो।
दर्शक का विस्थापन
सबसे दुखद परिवर्तन दर्शक के साथ हुआ है। जो दर्शक कभी संवाद का हिस्सा था, आज वह उपभोक्ता बन गया है। वह टिकट खरीदता है (हालांकि ऐसे दर्शकों की संख्या नगण्य ही है), ताली बजाता है, और घर चला जाता है। उसकी भूमिका वहीं समाप्त हो जाती है।
यह रंगमंच का सबसे बड़ा पराभव है- क्योंकि बिना सक्रिय दर्शक के रंगमंच केवल प्रदर्शन रह जाता है, प्रक्रिया नहीं।
डिजिटल समय और रंगमंच की चुनौती
आज का समय डिजिटल विस्फोट का समय है। मनुष्य की संवेदनाएँ स्क्रीन पर सिमटती जा रही हैं। ध्यान की अवधि घट रही है, और तात्कालिकता बढ़ रही है। ऐसे समय में रंगमंच के सामने दो रास्ते हैं- या तो वह इस प्रवाह में बह जाए, या इसके विरुद्ध खड़ा होकर जीवंत संवाद की पुनर्स्थापना करे।
यदि रंगमंच भी केवल “कंटेंट” बन कर रह जायेगा, तो वह अपनी विशिष्टता खो देगा।
असली संकट : दृष्टि का क्षरण
यह पूरा संकट संसाधनों का नहीं, दृष्टि का संकट है। जब रंगमंच समाज से जुड़ा था, तब वह जीवित था- भले ही गरीब था। आज वह समृद्ध दिखता है, पर भीतर से खाली है।
सवाल यह नहीं है कि अनुदान लेना चाहिये या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम अनुदान लेते हुए भी स्वतंत्र रह सकते हैं? क्या हम सुविधा के भीतर रहते हुए भी असुविधाजनक प्रश्न उठा सकते हैं?
संभावनाएँ : वापसी नहीं, पुनर्निर्माण
अतीत में लौटना संभव नहीं है, पर उससे सीखना ज़रूरी है। हमें एक नये रंगमंच की कल्पना करनी होगी- जो तकनीक का उपयोग करे, पर उसका गुलाम न बने; जो संसाधनों का उपयोग करे, पर उनके द्वारा नियंत्रित न हो; जो समाज से संवाद करे, न कि उससे दूरी बनाये। हमें नये रंगकर्मियों को यह सिखाना होगा कि रंगमंच करियर नहीं, प्रतिबद्धता है। और प्रतिबद्धता का अर्थ है- जोखिम उठाना।
1991 का वह पटना अब केवल स्मृति है- पर वह स्मृति आज भी एक चुनौती की तरह मौजूद है। क्या हम फिर से ऐसा रंगमंच बना सकते हैं जो सवाल पूछे, जो बेचैन करे, जो समाज को बदलने का साहस रखे? या हम उसी रास्ते पर चलते रहेंगे जहाँ नाटक होते हैं, महोत्सव होते हैं, पुरस्कार मिलते हैं- पर रंगमंच नहीं होता? निर्णय हमारे हाथ में है।
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