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कहानीः एक लड़की, एक सिलेट और एक दुनिया

ग्रामीण जीवन की धूल-भरी पगडंडियों से उठती यह कहानी सिर्फ एक किशोरी की जिजीविषा नहीं, बल्कि बदलते समय के उस संधि-क्षण को दर्ज करती है जहाँ परंपरा और तकनीक आमने-सामने खड़े हैं। यह कहानी ग्रामीण जीवन की सादगी और जटिलताओं के बीच उगते एक नए युग की आहट है। जो बार-बार रेणु की कहानियों की सहज स्मृति दिलाती है, और कहीं-कभी साहिब-बीबी और गुलाम की। खासकर बंगालन मालकिन के संदर्भ में। रूपम का संघर्ष शिक्षा के लिए है, पर उसके रास्ते में खड़ी हैं गरीबी, पितृसत्ता और संदेह से भरी घरेलू मानसिकता।
इस कथा की सबसे बड़ी शक्ति उसका सहज लोक-स्वर और दृश्यात्मकता है। हालांकि कहीं-कहीं बहुत विस्तार कथा की गति को धीमा करता है और कुछ प्रसंगों में संपादन की गुंजाइश दिखती है, फिर भी यह कहानी एक उम्मीद भरी, समय-सापेक्ष और मार्मिक कहानी के रूप में अपनी पहचान दर्ज करती है।

शाम होने वाली थी। चैत की खुशनुमा शाम। अभी-अभी गेहूँ की कटाई हो चुकी थी। गेहूँ की जड़ें सारे खेतों में बिखरी पड़ी थीं। नाउम्मीदी में उम्मीदों की किरण, भूरी जड़ों के साथ हरी घास।

कुछ लड़कियाँ वहाँ बकरियाँ चरा रही थीं। भूरी, काली, सफेद बकरियों का झुंड कभी मे-मे करता, कभी घास चरता। लड़कियाँ हँसती, ठिठोली करती बतिया रही थीं। बीच में किसी ने गीत टेर दिया—“नैहर से नहि कियो ऐले हो रामा, बीतल फगुनमा…”

पूरब की तरफ दूर तक फैले खेतों के बीच एक मोबाइल टावर दिख रहा था। उधर खेतों की मेड़ से थोड़ा हटकर आम का वही पुराना वृक्ष वर्षों से खड़ा था—खूब घना, खूब छायादार। अभी तो मंजरों से भरा था, छोटे-छोटे टिकोले भी दिख रहे थे।

खेतों के आगे दूर-दूर तक जंगल फैला था।

“दिदिया, जल्दी घर चलो, पाहुन आ गए हैं!” खेत की मेड़ से एक बालक चिल्लाता हुआ आ रहा था। वह आम के पेड़ के पास आ गया। पेड़ के ऊपर एक ऊँची, मजबूत डाल पर चौदह-पंद्रह साल की लड़की बैठी थी।

“क्यों इतनी हड़बड़ी मचा रहे हो, गुल्लन? मम्मी तो हैं घर पर।” उसने भाई को प्यार से झिड़का। चेहरे पर झुँझलाहट झलक रही थी।

“मम्मी तो सुबह से पाहुन के लिए खाना बनाने में लगी है। तुम जल्दी से चलकर चाय बना दो।” वह उत्तेजित, हाँफ रहा था।

“क्यों, बड़की दिदिया कहाँ है? चाय वह क्यों नहीं बनाती?” लड़की धीरे-धीरे पेड़ से उतर रही थी।

“बड़की दिदिया?” उसका हाँफना कम हो गया। खेतों की तरफ उँगली उठाई—“वहाँ, गीत गा रही है।”

“मम्मी ने ब्याह क्या करा दिया, लॉटरी लग गया दिदिया का!”

“दिदिया, जल्दी करो, मम्मी गुस्सा करेगी।” गुल्लन वहाँ से फुर्र हो गया।

“कहाँ है रुपमी?” बड़ी दिदिया ने गुल्लन से पूछा।

“वहाँ, पेड़ के पास।” गुल्लन की नजरें झुकी थीं, जैसे कुछ छिपा रहा हो।

“ओ, अब समझे—टिकोले खाने गई है। नहीं सुधरेगी ये लड़की।” तब तक लड़की पास आ गई थी।

“रूपमी, ये तुम्हारे झोले में क्या है?” झोले में टिकोले के अलावा कुछ और था, शायद स्लेट।

“सिलेट है?”

“नहीं दिदिया, चटनी के लिए टिकोला।” वह झोला छिपाती घर की तरफ भागी।

दिदिया वही गीत गा रही थी, जो मालकिन को बहुत पसंद है। यही गीत तो गुनगुनाती रहती हैं हरदम। लेकिन रूपम के पास यह सब सोचने का समय अभी नहीं था।

नीलम और पूनम होली पर ससुराल से मायके आयीं। पूनम को लेने तो उसके पति आ गए, लेकिन नीलम चैत के बाद जाएगी।

अँधेरा हो गया था। रूपम ने दबे पाँव घर में प्रवेश किया। अपने हाथ का झोला झट से खाट पर चढ़, लकड़ी की बनी छज्जी पर आहिस्ते से रख दिया।

“रुपमी!” आज मम्मी ने बड़ी इज्जत बख्शी। पाहुन हैं न घर में। नहीं तो मम्मी के मुँह में ‘रुपमिया करमजली’ के सिवा कोई नाम नहीं है उसका।

“आ रहे हैं।” वह कमरे से निकल रही थी कि दिदिया और पाहुन की खिलखिलाहट सुनाई दी—“हाथ छोड़िए, रुपमी आ रही है। अभी काहे लेने आ गए? कम-से-कम रामनवमी तो देख लेते हम।”

“तुम्हारे बिना जी नहीं लगता।” और चूमने की आवाज।

जी जल जाता है रूपम का। इसी सब के लिए दिदिया ने ब्याह कर लिया। पढ़ाई छोड़कर खुश थी पाहुन के चोंचले से। रूपम कभी शादी नहीं करेगी। एक दिन इसी गाँव के इस्कूल की हेडमास्टरनी बनकर सबको चौंका देगी। लेकिन मम्मी—वह तो बहुत जिद्दी है। वह अभी से उसके लिए लड़का ढूँढ़ रही है। पप्पा समझदार हैं। वह ठीक से पढ़ेगी, तो पप्पा मम्मी की नहीं सुनेंगे।

चौकाघर में मम्मी कुछ आग की तपिश और कुछ क्रोध से लाल हो रही थी।

“कहाँ पड़ी थी इतना देर तक, धकड़ी! मालूम है न पाहुन आए हैं, कितना काम है?” मन तो हुआ कि मम्मी से कहे—पाहुन को तुमने बुलाया, तुम जानो। मगर कहा—“आज मालकिन पीसी के घर भी मेहमान आए हैं, वहाँ भी बहुत काम था।” साफ झूठ बोल गई। कल बात खुलेगी, तो कुछ भी बहाना बना देगी। बंगाली मालकिन हैं ही इतनी अच्छी कि उसकी हाँ में हाँ मिला देंगी।

“अच्छा चल, खाना लगा और पूनम का सनेस सजा कर रख दे।”

दिदिया गई और रूपम खुश। अब सुबह पाँच बजे घर से निकल सकती है, पीसी मालकिन के काम के बहाने।

      गाँव के पुराने रईस के इकलौते बेटे आदित्य ने अपने ही कॉलेज की बंगाली लड़की से चुपचाप प्रेम विवाह कर लिया था। पहले तो माँ-बाप बहुत नाराज हुए। फिर जैसा कि हमेशा होता है, बाद में मान गये। नाराजगी और शर्मिंदगी इस बात की अधिक थी कि उन्होंने पहले ही पूर्णिया के जमींदारों के घर आदित्य का विवाह तय कर दिया था ।

       लाड़ से बिगड़े  पुत्र को माता -पिता जल्दी विवाह बंधन में बाँधना चाहते थे। लेकिन इस बंगाली लड़की ने तो चमत्कार कर दिया। पुत्र सँभल ही नहीं गया, बल्कि खेती-बारी, व्यापार में भी रूचि लेने लगा। माँ ने तो दिल से माफ़ कर दिया जया को। अपने जीवन में ही सारी जिम्मेदारी बहू को सौंप गयीं।

    लेकिन पूर्णिया वालों ने कभी माफ़ नहीं किया इन्हें।

जया  इस गाँव के प्रेम में ऐसी बंधी कि यहीं बंगालिन मालकिन बनकर रह गयीं। सारा गाँव उन्हें बंगालिन मालकिन के नाम से जानता है। रूपम की दादी के जमाने से ही रूपम  का परिवार इनके घर काम करता है। 

   “बड़े उपकारी लोग हैं।” रूपम की दादी कहतीं “कभी काम मत छोड़ना इनका।”और वह सम्बन्ध अभी तक निभता आ रहा है।

    पिछले साल आठवीं पास कर नौवीं में आ गयी थी रूपम। बड़ी खुश थी कि अब तो वह गाँव के बाहर पढ़ने जा सकती है। अनवर ने बताया था मुख्यमंत्री साइकिल देंगे लड़कियों को, ताकि वह गाँव  से बाहर जाकर हाईस्कूल की पढाई कर सकें। गाँव का विद्यालय माध्यमिक स्तर तक ही था। 

    उसने मम्मी से कहा–“मम्मी सरकार फ्री में साइकिल दे रहा है। मेरे साथ चलो। अनवर लिखा-पढ़ी का सारा काम कर देगा| हम पढ़ने जा सकेंगे कियौटी हाईस्कूल। ”

   “अच्छा तू पढ़ने जाएगी, तो मालकिन का काम कौन करेगा? हम अकेले क्या-क्या करेंगे?”

   “मम्मी तुमको तो हमारी पढाई के नाम से ही बैर है।  दिदिया के साथ भी यही किया। चलो,उनके पास साइकिल नहीं था,.लेकिन हमको तो फ्री में मिल रहा है।”

    “अच्छा तो फिरी में?”ममी की आँखें चौड़ी हो गयीं।

     “नहीं ,और क्या? ऐसे ही नहीं कह रहे हम। ”रूपम ने मन-ही-मन कहा जैसे फ्री में नहीं मिलता तो तुम खरीद ही देती। खरीदना अपने गुल्लन के लिए। 

     मम्मी कुछ देर सोचती रही ।

    “चल ,कल सुबह ही चलेंगे। जल्दी काम निपटा लेना। ”रूपम को मन माँगी मुराद मिल गयी थी। मम्मी कैसे मान गयी झट से।.उसे विश्वास नहीं हो रहा। रातभर साइकिल के सपने आते रहे। कभी वह साइकिल से हरे-भरे पेड़ों के बीच गुजरती,.कभी कक्षा में बैठी पढ़ रही होती। अंग्रेजी और गणित कितना कठिन है! लेकिन रूपम  पास हो गयी है …सपनों के कोलाहल में नींद सुबह जल्द खुल गयी।

     साइकिल घर आ गयी थोड़ी दौड़ -धूप के बाद। ताज्जुब कि मम्मी बहुत खुश थी। अनवर उसी हाईस्कूल में पढ़ता है। उसने फार्म लाकर नाम तो पहले ही लिखा दिया था। 

      रूपम सुबह दस बजे स्कूल जाने से पहले मालकिन पीसी  से मिलने आयी। उन्होंने कुछ पैसे दिए और दही-चीनी खिलाकर स्कूल भेजा।

  अब वह सुबह-शाम का काम दिल लगाकर करती। प्रतिदिन  मालकिन पीसी अपनी पढाई, शिक्षक और विद्यालय के विषय में बताती। 

   मालकिन भी अपने बचपन का स्कूल याद करतीं। कभी-कभी उदास हो जातीं, उसाँसें  लेतीं। रूपम  को लगता मालकिन को बंगाल का अपना मायका याद आ रहा। फिर वह झट से उठ जातीं –“चल तू काम कर, आज मुझे बंगला सिनेमा देखना है।”

   वैसे भी मालिक तो घर में होते नहीं। अकेली मालकिन टीवी में डूबी रहतीं। 

    पन्द्रह दिन अनवर ने खूब मेहनत की उसे साइकिल  सिखाने के लिए। वह साइकिल चलाती, गिरती-पड़ती, मगर चलाना सीख गयी। देर होने पर कई बार अनवर उसे आगे बैठाकर खुद साइकिल चलाकर स्कूल पहुंचाता। 

    पंद्रह दिनों के बाद जब मालकिन का काम करके रूपम लौटी, तो आँगन में साइकिल नहीं दिखी। शायद गुल्लन ले गया होगा, दोस्तों के सामने डींग हाँकने-देखो,.श.हम भी साइकिलवाले हो गये। 

       लेकिन गुल्लन तो कमरे चुपचाप बैठा मिला। इतना चुप तो कभी नहीं था। मम्मी चौका में रोटी पका रही थी।

   “गुल्लन, साइकिल कहाँ है?”गुल्लन ने मम्मी की तरफ देख आँख के इशारे से कुछ कहा| साइकिल मामा को तो नहीं दे दिया। वह मामा को कुछ-न-कुछ देती रहती है। पप्पा से छिपाकर भी। 

     “मम्मी साइकिल कहाँ  है?” वह अधीर हो रही थी।

     “बेच दिये।” मम्मी की आवाज बेहद ठण्डी  थी।

     “क्यों?” फूट-फूट कर रो पड़ी वह।

      “अब हम इस्कूल कैसे जाएँगे?” रोते-रोते उसने मम्मी का आँचल पकड़ कर झिंझोड़ दिया। 

      “चुप रह,भाभट समेट।” आँचल खींचते हुए दो थप्पड़ लगाये मम्मी ने। 

    “साइकिल चाहिए, अनवरबा के साथ पेंग बढ़ाने के लिए। नाक नहीं कटवाना हमको,तुमको काट के यहीं गाड़ देंगे। पढाई करना है कि खेला? सब समझते हैं हम, कोयले की दलाली में हाथ काला, हुँह !”मम्मी ने उसे जोर से धकेला और आँगन में चली गयी। वह जमीन पर गिर गयी।

      रूपम को काटो तो खून नहीं। उसने तो कभी ऐसा सोचा ही नहीं,अनवर के बारे में। वह सारे घर की मदद करता है। जमीन पर ही हिचक -हिचक कर रोती रही वह। गुल्लन सकते में खड़ा रहा। कितना मदद करते हैं अनवर भैया दिदिया की। मम्मी की भी। ये मम्मी  भी जब देखो अपनी मर्जी चलाती है। 

         रात को पप्पा देर से आए। जिस दिन बाजार समिति जाते हैं, समय लगता है।  मालिक के अनाज का कारोबार गाँव में वही देखते हैं। उन्हें शायद किसी ने कुछ नहीं कहा। 

    रात भर रूपम  जमीन पर ही पड़ी रही।  गुल्लन रोटी में चीनी भर कर लाया। मगर उससे नहीं खाया गया। 

     “न खाएँगे, न इस्कूल जाएँगे, न काम करेंगे। ”उसकी आँखें लाल थीं और हिचकी अभी तक बंद नहीं हुई थी।

“दिदिया मम्मी और मारेगी।” रुआँसा गुल्लन बोला। 

“मारने दो, मर जाएँगे। गाली तो रोज देती थी, आज कितन गंदा बात कहा।”

  रूपम दूसरे दिन भी कोठरी से नहीं निकली। मालकिन के घर भी नहीं गयी। पप्पा मुँह अँधेरे निकल गये थे। मम्मी मालकिन के घर गयी। 

      “क्यों,आज रूपम नहीं आयी?” मालकिन नहाने के लिए रूपम  का इंतजार कर रही थीं। वही उनके कपड़े सँभालती है। शैम्पू ,साबुन, गर्म-ठण्डे पानी का हिसाब।

    “नहीं, वह करमजली क्या आएगी। जिद्द ठाने बैठी है पढ़ने की।” मम्मी ने आजिजी से कहा और जल्दी-जल्दी अपना काम निबटाने लगी। 

“क्यों स्कूल जा तो रही थी? ”

“उसका साइकिल हम बेच दिए। एक हजार नफा पर गहिकी मिल गया।”

  “ अरे यह तो गलत किया तुमने। अब वह इतनी दूर स्कूल कैसे जाएगी?” मालकिन ने परेशान होकर कहा। 

    “न जाए, हमरी बला से। उसके दहेज़ के लिए भी  पैसा जुटाना है न। बहुत अच्छा मटरमाला  देख आए हैं। बन्ह्की वाले साहुकार के पास। भाई का दोस्त है। कुछ मोलजोल करके सस्ते में देगा। ”मम्मी की आवाज से ख़ुशी छलक रही  थी।

     “कौन पहनता है अब मटरमाला! सारे पुराने डिजाइन। |उसे पढ़ने दो। खुद गहने खरीदने लायक हो जाएगी, तो दहेज नहीं देना पड़ेगा। |”लेकिन मम्मी के ये बातें समझ नहीं आतीं। पढ़ने से दहेज़ नहीं लगता, ये कहाँ का कानून हैं?अभी तो पूनम के ब्याह के कर्जे से ही नहीं निबटी। उनके कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी मालकिन की बातों से। 

“और बात है, आप नहीं समझेंगी।” फिर उनके कानों में फुसफुसाई “अनवर के फेर में पर गयी है। साइकिल बेचकर एक पंथ दो काज हो गया।” हाय रे कूढ़मगज, सर पीट लिया मालकिन ने। इसे कुछ समझाना बेकार है।रूपम के बिना तो एक कदम नहीं चल सकतीं वह। कहती हैं –“तू जान है मेरी और टीवी मेरी जिन्दगी।”

    “और मालिक?”सर में तेल लगाते हुए पूछा था रुपमी ने… 

     “वह तो कारोबार के हैं। ”ठठाकर हँस पड़ीं वह। पता नहीं कभी-कभी कैसा विचित्र चेहरा बना लेती हैं मालकिन।

     “अच्छा शाम में तुम उससे मेरी बात करा देना फोन पर। ”कई नए -पुराने फोन रहते हैं मालकिन के पास। वही देती है मम्मी को फोन।

       रात को फोन पर सारी बातें बतायीं रूपम ने मालकिन को। उन्होंने सुबह बुलाया –“पढ़ना है घर बैठे तो आ एक जादू दिखाती हूँ।’

    “जादू माने क्या और पढ़ाई बिना इस्कूल के कैसे ?”उछल पड़ी वह।

     “आ, तभी बताऊँगी। जादू खुद देखना पड़ता है। कहने से समझ नहीं आता। ”वह हँस रही थीं।

    मालकिन झूठ नहीं बोलतीं। कुछ तो बात है। उसे देर से नींद आयी। फिर से सपने। दरभंगा में जादू देखा था उसने। अंडे से मुर्गी। लड़के का गायब होना, बिना धागे की माला, फटे कपड़ों से धोती पता नहीं और क्या -क्या! सारी रात ऐसे ही सपने आते रहे और जोरों की भूख भी लगी।

    सुबह वह पहुँच गयी मालकिन की कोठी पर। मालकिन के सारे काम निबटा कर बेचैनी से बोली-“पीसी,अब दिखाइए जादू।” मालकिन ने ही कहा है उसे ‘पीसी’ कहा करे। ससुराल को मायका ही मान लिया है उन्होंने।

       “सब्र कर। ”मालकिन ओटीटी पर कुछ देख रही थीं। फिर सोफे से उठ गयीं। एकदम बेचैन।

   “फोन लेकर छत पर देख तो कि सिग्नल क्यों नहीं आ रहा। गाँव में यही तो परेशानी है। न सिग्नल, न नेटवर्क ।”उनकी उनींदी आँखों से नींद गायब हो गयी।

    रूपम छत पर भागी। फोन चारों तरफ घुमाया। पूरब की तरफ सिग्नल आने लगा। 

  “ पीसी, डिस को पूरब घुमाना पड़ेगा। उधर सिग्नल आ रहा है।”

    “बहादुर को बुला, वही डिश की लोकेशन ठीक कर सकता है। ”बहादुर के आने से पहले ही सिग्नल आ गया। 

“रुपमी देख बुलबुल का पति कितना क्रूर है। कितना सताता है उसे।”

“कितना आलता लगाया है पैरों में, कितना सिंदूर, गहना …कितनी सुंदर, फिर चुड़ैल कैसे बन जाती है?”रूपम आँखें फाड़कर देख रही थी।

    “तू नहीं समझेगी अभी, औरतें चुड़ैल कैसे बनती हैं ।”अचानक रूपम को मालकिन का जादू याद आया।

“आप पहले जादू दिखा दीजिए पीसी। सिनेमा बाद में देखियेगा।”

 “जरा सा ठहर,ये एपिसोड देख लूँ। ”पन्द्रह मिनट के बाद बत्ती चली गयी। 

“बहादुर मशीन चला, दीखता नहीं बत्ती… ”मालकिन उद्वेलित थीं। टीवी देखते समय नेटवर्क चला जाय, बत्ती चली जाय मालकिन इसी तरह बेचैन हो जाती हैं।

“रात है कि बत्ती दिखेगी। ”बहादुर हँस कर बोला। 

“चल मसखरी मत कर!.जल्दी जेनरेटर चला!” और मालकिन उठकर सोने वाले कमरे में गयीं।

“रूपम  इधर आ, देख।” मालकिन के हाथ में एक स्लेट थी। उन्होंने कवर हटाया। पीछे कटे सेव की फोटो और आगे बिलकुल काली।

  “यह क्या है मालकिन पीसी? ”रूपम भौंचक्की उसे देख रही थी।

   “तुम्हारा स्कूल।”

   “आप भी मम्मी जैसी हो गयीं। मेरे इसकूल का मजाक उड़ा रही हैं। ”रूपम रुआँसी हो गयी। कितनी उम्मीद से आयी थी वह। सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। पन्द्रह साल की लड़की का मन समझने के लिए अब इस दुनिया में कोई नहीं।  पप्पा समझते हैं, लेकिन…

इस लेकिन का जवाब नहीं था या कोई रास्ता नहीं था उसके पास। मम्मी ने ऐसा कलंक नहीं लगाया होता, तो रास्ता निकल सकता था। 

 रूपम का उतरा चेहरा, डबडबाई आँखें देख भी मालकिन पीसी हँस रही हैं। कितनी चंडाल हो गयी हैं।

   “अरे नादान लड़की, मैं सच कह रही हूँ। ये आइपैड है, समझ ले छोटा टीवी या बड़ा फोन। तुझे दे दूँगी।”

   “ सिनेमा, सीरियल नहीं देखना हमको, नहीं चाहिए। ”उसने ताव  में आकर आइपैड परे ठेल दिया।

    “आज दूँगी भी नहीं| कल डेटा डालने के बाद जादू शुरू , तुम्हारी ट्रेनिंग शुरू। पगली, इससे पढ़ाई भी कर सकती है। जी छोटा मत कर।” रूपम कुछ ठीक-ठीक समझ नहीं पा रही थी। इससे पढ़ाई कैसे होगी? पीसी मालकिन अकेली टीवी देख-देख कर सठिया गयी हैं। मालिक भी कह रहे थे दिनोंदिन तुम्हारा टीवी रोग बढ़ता जा रहा है। लगता है सच में बीमार हो गयी हैं।

     किससे पूछे वह इस जादू के सिलेट के विषय में! दिदिया तो ब्याह करके और बेकार हो गयी है। गुल्लन बच्चा है,पप्पा को पूछते डर लगता है। मम्मी ने सुन लिया तो पहले ही आफत आ जाएगी। 

      दूसरी सुबह वो बड़े बेमन से पीसी मालकिन के घर गयी। मालकिन नहा धोकर बैठी थीं। सजधजकर और सुंदर लगती हैं। आज मालिक भी आनेवाले हैं शायद इसलिए। 

“सारे काम छोड़, इधर आ।  ”मालकिन रूपम से अधिक जल्दबाजी में थीं। पूरब वाले कमरे की खिड़की की मेज के पास रूपम को बैठा कर, खुद भी बगल में बैठ गयीं। स्लेट उन्होंने मेज पर रख दिया। 

    “अब देख ध्यान से, ये यहाँ क्रोम लिखा है, इतनी अंग्रेजी तो आती है तुझे? इसे उँगली से छू। ”स्लेट की बत्ती जल गयी थी, कितनी चमक! अभी तो काली थी। सचमुच जादू है।

  “ आज से तेरी ट्रेनिंग शुरू।” क्रोम छूने के बाद अंग्रेजी का बड़ा जी, फिर गूगल लिखा आ गया। वहाँ एक कोष्ठक में नीचे लिखे अक्षरों को छूकर ‘बिहार माध्यमिक शिक्षा बोर्ड’ लिखा मालकिन ने।  पहले तो टाइप करना सिखाया, फिर नौवीं कक्षा का पाठ्यक्रम, विषय और किताबें। अरे बाप रे , सबकुछ तो था इस जादू की स्लेट में।

    “ जब कोरोना हुआ था, तो सारी दुनिया ऑनलाइन ऑफिस, स्कूल, हाट-बाजार का काम करती थी इसी पर ।”

    “इसी सिलेट पर?” रूपम को विश्वास नहीं हो रहा था।

   “आप भी तो यहीं घर से मिक्सी, कपड़े धोनेवाली मशीन मँगाती हैं। इसी से?”

   “हाँ,फोन,कंप्यूटर,आइपैड और भी बहुत कुछ है ऑनलाइन काम करने के लिए। अभी इतना ही। ”फिर जैसे अचानक उन्हें कुछ याद आया। बात अधूरी छोड़ वह टीवी वाले कमरे में घुस गयीं। टीवी ऑन हो गया।

   “खाना यहीं दे जा। ”जब रूपम खाना लेकर आयी, वो किसी सीरियल में खो गयीं थीं।

    शाम को मालिक आ चुके थे। रूपम ने बरामदे से ही मालिक की आवाज सुनी –“क्या हो गया है आपको। मैं यहाँ बैठा हूँ ,कोई उत्साह नहीं। कभी बिहार फाइल्स  से फुर्सत नहीं थी। अब बंगाल फ़ाइल पर नजरें टिकाए बैठी हैं, टीवी बंद कीजिए। ”मालिक क्षुब्ध थे,बेकल।  

    “आपसे बात भी तो कर रही हूँ। ”कातर थी उनकी आवाज। एकबार इसी बात पर मालकिन ने उनसे कहा था- “ आप घर में रहते नहीं फिर मैं क्या करूँ?आप यहाँ रहेंगे तो टीवी नहीं देखूँगी। ”

 “सारा कारोबार छोड़, आपके पल्लू में बँधा बैठा रहूँ ?” मालिक और अधिक नाराज हो गये थे। 

 एक महीने में रूपम ने गूगल पर  विषय ढूँढकर प्रश्नोत्तर करना सीख लिया। फेसबुक, इन्स्टाग्राम, व्हाट्सएप,यू ट्यूब सभी के बारे में बताया मालकिन ने। इसे सोशल मीडिया कहते हैं, यह भी बताया। टीवी पर भी ये सारे काम हो सकते हैं। 

   “मतलब टीवी बड़ा सिलेट है और यह छोटा ?”रूपम के अचम्भा का अंत ही नहीं है। 

   “हाँ ,यही समझ ले। सोशल मीडिया लोगों से ,समाज से ,जुड़ने का एक मजबूत माध्यम है रुपमी।” धीरे-धीरे उसे डिजिटल उपकरणों का अभ्यस्त बना रहीं वह। कितना आसान था इस सिलेट पर पढ़ना ! सारी किताबें ,सारे जवाब! वह भी जब चाहें तब ! सिग्नल की दिक्कत है।लेकिन सुबह चार बजे से सात बजे तक नहीं। चार बजे आलस तो आता है, फिर भी उठेगी वह। बकरियों के बहाने तो कभी भी, कहीं भी जा सकती है।

    आजकल मालकिन को सिनेमा देखने के साथ रील बनाने की लत भी पड़ने लगी है। कभी वह रूपम से रील बनवातीं, कभी स्वयं बनातीं। यह ट्रेनिंग भी ले रही रूपम मालकिन से। 

   छत पर चाँद के साथ, फुलवारी में फूलों के बीच, घर से लगे खेतों में , रूपम  की बकरियों के साथ भी। 

   “मालकिन पीसी, कौन देखता है ये सब फोटो और वीडियो? क्यों लगाती हैं आप?”

    “पूरी दुनिया बसी है इस सोशल मिडिया पर। वही देखती है रे। जो अपने हैं। उन्हें समय नहीं, तो दुनिया ही सही। ” वह एक उच्छ्वास लेती हैं। 

 पप्पा  कहते हैं,“बेचारी बंगालिन मालकिन !कहाँ का दाना , कहाँ लिखा था! किस्मत ऐसी कि एक संतान भी नहीं हुई । इतनी बड़ी हवेली…”

“बज्जर गिरे पुरैनिया वालों पर। उसी सब का सराप लग गया है मालकिन को। जाते-जाते सरापते ही गये थे। खड़े -खड़े निरवंश होने का सराप देकर गये। बड़े मालिक माफ़ी माँगते रहे। वे क्रोध से फुंफकारते चले गये। मगर बंगाली मालकिन पर बड़ा माया आता है। नैहर वालों ने भी सम्बन्ध तोड़ लिया। कहीं की नहीं रही।”मम्मी लम्बी साँस लेती

 “उन्हें डाक्टर ,इंजिनीयर से ब्याहना चाहते थे। किस्मत में लिखा था किसान का मामूली एम.ए. पास बेटा। धन-दौलत कोई चीज है? हुनर की बात ही कुछ और है।मालकिन के माँ-बाप रूसे रहे, मन में दुःख था। ”पप्पा समझते हैं हुनर का मतलब। मम्मी समझे तो उसे भी समझाना चाहते हैं।

     एक साल बीत गया। मम्मी को पता नहीं रूपम  सारा दिन बकरियाँ चराने के बहाने कहाँ जाती है। पर वह कहाँ जाती है, क्या करती है, गुल्लन को पता है। एक दिन कुछ सोचकर वह दिदिया को ढूँढने निकला।उसकी बकरियाँ आम पेड़ के नीचे छाँव में घास खा रही थीं।उनके सामने घास काट कर रख दी गयी थी। 

  “अरे, ये तो अपनी बकरी है। ”गुल्लन ने नजरें उठाकर पेड़ पर देखा, तो रूपम अंग्रेजिया सिलेट खोले पढ़ रही थी।  गुल्लन को सबकुछ बताना पड़ा।  कैसे इस स्लेट से पढ़ा जाता है ,कैसे इसका उपयोग करते हैं। धीरे -धीरे गुल्लन भी यह सब समझने की कोशिश कर रहा था। यहाँ मोबाइल टावर के पास नेटवर्क अच्छा है, इसलिए आती है रुपमी। जबसे मोबाइल टावर लगा है, जरुरत पड़ने पर सारे गाँव के लोग इसके पास पहुँच जाते हैं। इसलिए रूपम पेड़ के ऊपर छिपकर बैठती है। ऊपर तो और कमाल का चलता है नेटवर्क। 

     “अंग्रेजिया सिलेट तो सच में जादू है दिदिया। ”नादान गुल्लन इसे अंगरेजिया सिलेट कहता है|

 एकदिन पप्पा बड़े बेचैन थे। कहीं फोन नहीं लग रहा था। न दिल्ली वाले मालिक को,न बाजार समिति,न पूनम को । बड़की काकी ने पप्पा से कहा, “वहाँ जो खेत पर मोबाइल का खम्भा लगा है न ,वहाँ जाकर बात करिए।वहाँ  नटबक  ,सिंगल सब रहता है। झट से बात हो जाएगा। हम बौआ से वहीं जाकर बात करते हैं।  ”काकी का बेटा पंजाब में रहता है। 

       गुल्लन पप्पा को साथ लेकर मोबाइल टावर के पास गया। पहले ही सीटी बजा दी, ताकि दिदिया सतर्क हो जाए। लेकिन पप्पा  की तेज नजरों ने बकरी देख कुछ भाँप लिया। 

   “रूपम पेड़ पर क्या कर रही है ? ”पप्पा चौंक गये।

    रूपम गिलहरी की तरह पेड़ से उतर आयी, “पप्पा पेड़ ऊँचा है न! यहां नेटवर्क और सिग्नल दोनों अच्छा है। पढ़ाई जल्दी हो जाती है। समय नहीं लगता। पीसी मालकिन ने बताया। |”उसे आज पेड़ का राज खोलना ही पड़ा |

   अब मम्मी के अलावा घर में सभी जानते थे रूपम का राज। नौवीं की परीक्षा उसने दिदिया के ससुराल जाकर दी। मम्मी को इतना ही पता था ,रुपमी पूनम का बच्चा सम्भालने गयी है। 

 इस साल दसवीं की परीक्षा है। जी-जान लगाकर पढ़ रही रूपम। पीसी मालकिन ने उसे ऑनलाइन कई कोचिंग क्लासेस का पता बता दिया है। थोड़े से पैसे देने पड़ते हैं, तो वही देती हैं। आनंद कुमार,खान सर ,एच. सी. वर्मा, गणित गुरु सभी के नाम जान गयी है वह। आगे ऊँची कक्षा में सभी काम आएँगे। 

    कम खर्च, घर बैठे पढाई और अनुभवी शिक्षक। भला हो अँग्रेजिया  सिलेट का …

  “रुपमी,ये ले अब हिंदी में ग्रामीण क्षेत्र के लिए एक खास कोचिंग खुला है। यू ट्यूब ,फेसबुक पर है।  दसवीं की परीक्षा की सारी तैयारी यहाँ करवा रहे हैं।” मालकिन पीसी उसकी मदद कर खुश होती हैं। 

    कोचिंग में गणित अंग्रेजी, इतिहास, भूगोल सारे विषय समझाए जा रहे थे अनुभवी शिक्षकों द्वारा। गाँव में भी इस कोचिंग का नाम हो रहा था।  शिक्षक दोहराते कि यह कोचिंग हमने मेधावी ग्रामीण बच्चों के लिए खोला है। कई जगहों पर इसके विज्ञापन लगाए गये थे। गाँव के चौक पर भी। विज्ञापन में अपने शिक्षकों की तस्वीर देख रूपम बहुत उत्साहित हो जाती।

   दसवीं बोर्ड की परीक्षा करीब थी। दिदिया ने फिर बुला लिया था रूपम  को। परीक्षा के बाद फिर से वापस गाँव आ गयी।

आजकल बड़ी गहरी नींद आती रूपम को।मगर ये क्या, मालकिन पीसी को बिलकुल नींद नहीं आती रात में। 

    “मैं भी एकदिन चुड़ैल बन जाऊँगी रे !”फीकी मुस्कान के साथ मालकिन ने कहा। 

 “ऐसे मत बोलो पीसी। अच्छी -अच्छी बातें बोलो।”रूपम मालकिन का सर दबा रही थी। 

  “लगता है मैं अच्छे नम्बरों से पास हो जाऊँगी। ”रूपम ने उत्साहित होकर कहा। लेकिन जैसे वह कुछ सुन नहीं रही थीं।

“टीवी देखूँ तो दर्द होता है, न देखूँ तो नींद नहीं आती।” उनकी आँखें कहीं दूर देख रही थीं।

  “डॉक्टर को दिखाया?”अब शुद्ध हिंदी बोलने लगी थी रूपम।

  “तुम्हारे पीछे दिखाया था। डॉक्टर ने मन की बीमारी बतायी।”

  “दवा ले रहीं आप?”

 “मन की बीमारी तो मन से दूर होती है न।” पता नहीं क्या अनाप-शनाप बोलती हैं मालकिन! 

 दसवीं बोर्ड का रिजल्ट आया। वह अपनी क्लास में और कोचिंग में  टॉप आयी  थी। जब वह खुशखबरी सुनाने मालकिन पीसी के पास गयी, तो हवेली में सिर्फ चौकीदार और बहादुर ही थे। वे गेट के पास ही मिल गये।

     “कहाँ जा रही है?अंदर कोई नहीं है ।”चौकीदार ने रोका |

   “मालकिन कहाँ गयीं?” रूपम ने  बहादुर से पूछा।“आज सुबह के हवाई जहाज से दिल्ली चली गयी |”वो उदास था ।

“अचानक, क्यों? हमें तो बताया भी नहीं। ”वह दुखी थी। आज ही रिजल्ट आया और आज ही मालकिन पीसी चली गयीं। अब खुशियाँ किससे बाँटे !

 “कल मालिक आये थे। मालकिन से लड़ाई हुई और मालकिन रात में बेहोश हो गयीं। मालकिन और मालिक की बातें उसने हुबहू नक़ल करके बतायीं।

    मालकिन ने कहा, “मुझे भी अपने साथ ले चलिए।”

   “क्यों,यहाँ क्या परेशानी है? मैं आज यहाँ, कल वहाँ होटलों में मारा-मारा फिरता हूँ। तुम्हारे लिए।”

  “यहाँ अच्छा नहीं लगता। आप काम छोड़ दें, बहुत है हमारे पास और किसके लिए? इतनी बड़ी हवेली काटने को दौड़ती है। ”मालकिन बहुत उदास थी।

“इतने सारे नौकर चाकर हैं, कहो तो और दो-चार टीवी और लगवा दें हर कमरे में। ”मालिक ने चिढ़ कर कहा, “मोबाइल, टेबलेट का जखीरा तो लगा ही रखा है। मैं यहाँ रहूँ न रहूँ, तुम्हें क्या फर्क पड़ता है!

“आप मेरी बात समझने की कोशिश करें, हवेली की मोटी दीवारें…|”मालकिन बात पूरी करतीं, इससे पहले ही मालिक दहाड़ उठे,- “शीश महल बनवा दूँ ? भाभियाँ रह रहीं अकेली। कम-से-कम उनसे सीखो। कभी अपने बिरादरी से बाहर शादी करनी ही नहीं चाहिए। पता नहीं क्यों तुम्हारे प्रेम में पड़  गया था। मनहूस …”और मालकिन कटे पेड़ की तरह भहरा गयी। 

रूपम सोच में पड़ी रहती है आजकल।  क्या मालकिन वापस आएँगी? भगवान करें आ जाएँ। उनके बिना वह  बेसहारा हो जाएगी। पीसी मालकिन का सब कुछ इसी अँगरेजिया स्लेट ने तो नहीं बिगाड़ा! लेकिन उसे तसल्ली मिलती है,जब दिदिया समझाती है- “सिलेट-उलेट से क्या बिगड़ेगा, कुछ नहीं। पति प्यार  करे तो सब है, नहीं करे तो औरत जान भी दे सकती है।”

कोचिंग वाले घर आकर रूपम को दस हजार का पुरस्कार दे गये। उन्होंने कोचिंग की टॉपर छात्रा के लिए दस हजार का पुरस्कार निर्धारित किया था। ग्रामीण बालिकाओं को प्रोत्साहन देना भी उनका लक्ष्य था। 

अब मम्मी भी अँगरेजिया स्लेट की महिमा समझ गयी हैं| बहुत सँभाल कर रखती हैं।आकाश में पूरब की तरफ देख रोज सुबह सूरज के बाद मोबाइल टावर को प्रणाम करती हैं। उसे कहे बगैर चार्ज  करके रखती हैं इसे,। ये न होता, तो एक मुश्त दस हजार रुपए कहाँ देखने को मिलते!

मोबाईल टावर को प्रणाम करती मम्मी को देख गुल्लन ताली बजाकर हँसता है- “मम्मी कितना गुस्सा करती थी दिदिया पर तुम। |अब देखी न अँगरेजिया सिलेट का जादू!”

रूपम को नहीं पता कि वह खुश है या उदास! उसकी आंखें फिर-फिर भरती हैं और वह बरबस पोंछती है इसे। बंगाली मालकिन, अपनी पीसी की याद में…

क्या वे यह समझ गयी थीं कि प्रेम प्यार सब झूठा है, सब अकारथ। कुछ दिन का मेला… बस शिक्षा साथ रहती है…

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मीना झा
मीना झा हिंदी और मैथिली की सक्रिय लेखिका हैं, जो वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रही हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में हिंदी यात्रा संस्मरण ‘कैदी, क्रिकेट और कंगारुओं के स्वर्णिम देश में’, कथा-संग्रह ‘उत्तरवाहिनी’ और उपन्यास ‘शिलाक्षर बन मेरे मन’ शामिल हैं। उन्होंने प्रसिद्ध लेखिका उषाकिरण खान के महत्वपूर्ण मैथिली उपन्यास ‘पोखरि रजोखरि’ का हिंदी में ‘कथा रजोखर’ नाम से अनुवाद भी किया है। इसके अलावा उनकी कृतियों में ‘मन-माटी की अल्पनाएँ’ (रेखाचित्र), ‘प्रकृतिक सुन्दरतम हस्ताक्षर’ और ‘ईश्वरक शिकार समय’ (दोनों मैथिली कविता-संग्रह) प्रमुख हैं। उनकी हिंदी कहानियाँ और संस्मरण देश की चर्चित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं, वहीं मैथिली की प्रमुख पत्रिकाओं में भी उनकी कई कविताएँ, कहानियाँ, लेख और अनुवाद प्रकाशित हुए हैं।
मीना झा
मीना झा
मीना झा हिंदी और मैथिली की सक्रिय लेखिका हैं, जो वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रही हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में हिंदी यात्रा संस्मरण ‘कैदी, क्रिकेट और कंगारुओं के स्वर्णिम देश में’, कथा-संग्रह ‘उत्तरवाहिनी’ और उपन्यास ‘शिलाक्षर बन मेरे मन’ शामिल हैं। उन्होंने प्रसिद्ध लेखिका उषाकिरण खान के महत्वपूर्ण मैथिली उपन्यास ‘पोखरि रजोखरि’ का हिंदी में ‘कथा रजोखर’ नाम से अनुवाद भी किया है। इसके अलावा उनकी कृतियों में ‘मन-माटी की अल्पनाएँ’ (रेखाचित्र), ‘प्रकृतिक सुन्दरतम हस्ताक्षर’ और ‘ईश्वरक शिकार समय’ (दोनों मैथिली कविता-संग्रह) प्रमुख हैं। उनकी हिंदी कहानियाँ और संस्मरण देश की चर्चित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं, वहीं मैथिली की प्रमुख पत्रिकाओं में भी उनकी कई कविताएँ, कहानियाँ, लेख और अनुवाद प्रकाशित हुए हैं।
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