नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (29 अप्रैल) को सबरीमाला मंदिर मामले में सुनवाई के दौरान सवाल किया कि उत्तर भारत का एक गैर-आस्तिक मंदिर में प्रवेश के अधिकार का दावा कर सकता है? अदालत ने टिप्पणी की कि मंदिर में कौन प्रवेश कर सकता है और कौन नहीं। इस मुद्दे पर फैसला करते हुए यह देखना होगा कि यह कौन जता रहा है, कोई श्रद्धालु या गैर-आस्तिक।
नौ जजों की संवैधानिक पीठ की यह टिप्पणी उस सुनवाई के दौरान आई जब धार्मिक स्थानों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। इनमें केरलम में स्थित सबरीमाला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाएं शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने क्या टिप्पणी की?
इस पीठ ने सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाला बागची शामिल हैं।
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने बिंदु अमीनी और कनकदुर्गा नामक महिलाओं की तरफ से पक्ष रखा। जो 2018 के फैसले का समर्थन कर रही हैं। याचिकाकर्ताओं में एक महिला अनुसूचित जाति से हैं और उन्हें मंदिर में जाने से रोकना संविधान के अनुच्छेद- 17 (अस्पृश्यता का अंत) का उल्लंघन होगा।
ज्ञात हो कि 2018 के अपने फैसले में 5 जजों की संविधान पीठ ने 4:1 से फैसला सुनाते हुए 10-50 साल की महिलाओं पर मंदिर में जाने से प्रतिबंध को हटाया था। पीठ ने इस दौरान सदियों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा को अवैध और असंवैधानिक बताया था।
सुनवाई के दौरान इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि “आज हमें बताया जाता है कि गैर-जातीय हिंदू सबरीमाला में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन महिलाएं नहीं।” उन्होंने आगे कहा लेकिन अनुच्छेद 17 के कारण सभी पुरुष बिना किसी जातिगत प्रतिबंध के प्रवेश कर सकते हैं।
पीठ ने इस दलील का जवाब दिया कि महिला को अनुसूचित जाति से होने के कारण नहीं रोका गया बल्कि इसलिए रोका गया क्योंकि वह 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिला थी।
10-50 की आयु के बीच जीना छोड़ देंः वकील इंदिरा जयसिंह
इस दौरान जयसिंह ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है जबकि यह उनके जीवन का सबसे उत्पादक और सृजनात्मक काल होता है। यानी 10 से 50 वर्ष की आयु के बीच।
उन्होंने कहा, “इस अवधि में एक महिला की क्या स्थिति होती है? क्या यही वह काल नहीं है जो सबसे अधिक सृजनात्मक और उर्वर होता है? आप मुझे आधा-अधूरा जीवन जीने के लिए नहीं कह सकते। 10 से 50 वर्ष की आयु के बीच जीना छोड़ दें और फिर 10 से पहले और 50 के बाद जिएं। इससे बहुत बड़ा अभाव होगा।”
जयसिंह ने कहा कि मंदिर में प्रवेश करने और पूजा करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत एक मौलिक अधिकार है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 2018 के फैसले के बाद दोनों महिलाएं मंदिर गईं थीं।
उन्होंने आगे कहा कि “जब वे बाहर आईं तो संघ के कुछ नेताओं ने ‘शुद्धि करण’ की बात की। मैंने इस अदालत में याचिका दायर की। उस समय फैसला पूरी तरह लागू था। ये दो महिलाएं ही थीं जो ऊपर चढ़कर दर्शन करने में सफल रहीं।
“उसके बाद से कोई और सफल नहीं हो पाया है। क्यों? क्योंकि राज्य ने सहयोग नहीं किया। उन्होंने ऊपर जाने के लिए सुरक्षा देने से इनकार कर दिया। मैंने इस अदालत में याचिका दायर की जिसमें मैंने सभी तथ्य दर्ज किए, जिनमें उनकी पहचान, वे श्रद्धालु हैं या नहीं और वे किस राज्य से हैं, ये सब शामिल हैं।”
भक्त या गैर-भक्त? कौन जता रहा अधिकार
इस मौके पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “यह अधिकार कौन जता रहा है? क्या कोई भक्त यह अधिकार जता रहा है या कोई गैर-भक्त, जिसके कहने पर? एक ऐसा व्यक्ति जिसका इस मंदिर से कोई संबंध नहीं है, वह उत्तर भारत में कहीं है। यह मंदिर दक्षिण भारत में है। क्या कोई प्रवेश के अधिकार का दावा कर रहा है? इस पर भी विचार करना होगा।”
यह तर्क देते हुए कि धर्म में स्वयं को पुनर्जीवित करने की क्षमता होती है। जयसिंह ने पीठ के समक्ष दलील दी कि किसी संप्रदाय कहलाने के लिए उसमें कुछ सैद्धांतिक तत्व होना आवश्यक है।
इससे पहले शीर्ष अदालत ने कहा था कि किसी न्यायिक मंच के लिए किसी धार्मिक संप्रदाय की किसी विशेष प्रथा को आवश्यक या गैर-आवश्यक घोषित करने के लिए मापदंड परिभाषित करना बहुत मुश्किल है अगर असंभव नहीं है तो।
यह भी पढ़ें – सुप्रीम कोर्ट का हेट स्पीच पर नई गाइडलाइंस जारी करने से इनकार, क्या-क्या बातें कही?

