Tuesday, April 28, 2026
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ऑलराउंडरों पर संकट! IPL के इम्पैक्ट प्लेयर नियम ने कैसे बदला टीम संतुलन का पूरा गणित?

इस नियम की सबसे तीखी आलोचना इस बात को लेकर होती है कि इससे ऑलराउंडरों की भूमिका कमजोर हो रही है। पहले टीमों को ऐसे खिलाड़ियों की जरूरत होती थी जो दोनों विभागों में योगदान दें। अब कई फ्रेंचाइजी अलग बल्लेबाज और अलग गेंदबाज चुनना ज्यादा सुरक्षित विकल्प मानती हैं।

इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल अपने वजूद से ही नए प्रयोगों का मंच रहा है। टाइमआउट, रणनीतिक बदलाव, डेटा आधारित कप्तानी और आक्रामक बल्लेबाजी कल्चर के बाद अब जिस नियम ने सबसे ज्यादा बहस छेड़ी है, वह है इम्पैक्ट प्लेयर नियम। पहली नजर में यह नियम आधुनिक, रोमांचक और रणनीतिक लगता है। लेकिन गहराई से देखें तो सवाल यह है कि क्या यह नियम क्रिकेट को बेहतर बना रहा है या उसे उसकी मूल संरचना से दूर ले जा रहा है?

क्या है इम्पैक्ट प्लेयर नियम?

आईपीएल में इम्पैक्ट प्लेयर नियम के तहत हर टीम मैच से पहले अपनी प्लेइंग इलेवन के साथ पांच सब्स्टीट्यूट खिलाड़ियों के नाम देती है। मैच शुरू होने के बाद इनमें से किसी एक खिलाड़ी को टीम के किसी सदस्य की जगह उतारा जा सकता है।

यह बदलाव पारी की शुरुआत में, ओवर खत्म होने पर, विकेट गिरने पर या बल्लेबाज के रिटायर होने पर किया जा सकता है। हालांकि, अगर गेंदबाजी टीम ओवर के बीच बदलाव करती है, तो नया खिलाड़ी उसी ओवर की बची गेंदें नहीं फेंक सकता।

विदेशी खिलाड़ियों पर भी नियम लागू है। अगर प्लेइंग इलेवन में पहले से चार विदेशी खिलाड़ी हैं, तो इम्पैक्ट प्लेयर केवल भारतीय हो सकता है। अगर तीन या उससे कम विदेशी खिलाड़ी हों, तो एक विदेशी खिलाड़ी को भी उतारा जा सकता है।

यह नियम आईपीएल जैसे फॉर्मेट में रोमांच पैदा करता है, कप्तानों को अतिरिक्त विकल्प मिलता है, टीमों को हालात के मुताबिक बदलाव का मौका मिलता है और मैच में अनिश्चितता बनी रहती है। लेकिन यहीं से कई नए सवाल भी पैदा होते हैं।

टीम संतुलन का पुराना गणित कैसे टूटा

क्रिकेट हमेशा संतुलन का खेल रहा है। टीमों को तय करना पड़ता था कि छह बल्लेबाज खिलाएं या पांच, पांच गेंदबाज रखें या चार, किस खिलाड़ी से कुछ ओवर निकल सकते हैं और कौन निचले क्रम में उपयोगी रन बना सकता है। इसी संतुलन ने ऑलराउंडरों की कीमत तय की थी। जो खिलाड़ी बल्ले और गेंद दोनों से योगदान देता था, वह टीम का सबसे कीमती हिस्सा माना जाता था।

इम्पैक्ट प्लेयर नियम ने यह गणित बदल दिया है। अब टीमें सात विशेषज्ञ बल्लेबाजों के साथ उतर सकती हैं और बाद में एक बल्लेबाज को हटाकर विशेषज्ञ गेंदबाज ला सकती हैं। या फिर अतिरिक्त गेंदबाजों के साथ शुरुआत कर जरूरत पड़ने पर पावर हिटर उतार सकती हैं। यानी पहले जो संतुलन 11 खिलाड़ियों के भीतर बनाना पड़ता था, अब उसे मैच के दौरान बदला जा सकता है। इससे कप्तानी आसान हुई है, लेकिन क्रिकेट की पारंपरिक चुनौती भी कम हुई है।

ऑलराउंडरों पर सबसे बड़ा असर

इस नियम की सबसे तीखी आलोचना इस बात को लेकर होती है कि इससे ऑलराउंडरों की भूमिका कमजोर हो रही है। पहले टीमों को ऐसे खिलाड़ियों की जरूरत होती थी जो दोनों विभागों में योगदान दें। अब कई फ्रेंचाइजी अलग बल्लेबाज और अलग गेंदबाज चुनना ज्यादा सुरक्षित विकल्प मानती हैं। इससे औसत या विकसित हो रहे ऑलराउंडरों की मांग घटती दिख रही है।

शिवम दुबे का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। वह गेंदबाजी कर सकते हैं, लेकिन कई बार उन्हें सिर्फ बल्लेबाज की भूमिका में इस्तेमाल किया गया। यही बात वॉशिंगटन सुंदर, अभिषेक शर्मा और वेंकटेश अय्यर जैसे खिलाड़ियों पर भी लागू होती है, जिनकी बहुमुखी क्षमता कभी-कभी सीमित भूमिकाओं में सिमट जाती है। हुनर खत्म नहीं होता, लेकिन उसके उपयोग की जरूरत कम हो जाती है।

भारतीय क्रिकेट के लिए यह चिंता इसलिए बड़ी है क्योंकि भारत लंबे समय से विश्वस्तरीय तेज गेंदबाजी ऑलराउंडर की तलाश में रहा है। कपिल देव के बाद यह जगह लगातार चर्चा में रही। अगर घरेलू ढांचा ही खिलाड़ियों को विशेषज्ञ बनने की दिशा में धकेलेगा, तो भविष्य में बहुमुखी खिलाड़ियों की संख्या कम हो सकती है।

दिग्गजों की आपत्ति क्यों है?

रोहित शर्मा ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि क्रिकेट 11 खिलाड़ियों का खेल है, 12 का नहीं। उनके बयान का मतलब सिर्फ संख्या नहीं था, बल्कि जिम्मेदारी से था। पहले अगर टीम को छठे गेंदबाज की जरूरत पड़ती थी, तो किसी बल्लेबाज को आगे आना पड़ता था। अगर बल्लेबाजी कमजोर पड़ती थी, तो निचले क्रम को जिम्मेदारी उठानी होती थी। अब विशेषज्ञ विकल्प कई बार उस दबाव को कम कर देता है।

राहुल द्रविड़ जैसे क्रिकेट दिमागों ने भी यह संकेत दिया कि खिलाड़ी दबाव, गलती और असफलता से सीखते हैं। निर्णायक ओवर में रन पड़ना या मुश्किल हालात में बल्लेबाजी करना ही मानसिक मजबूती बनाता है। यदि हर कमी को सब्स्टीट्यूट से भरा जाने लगे, तो सीखने की प्रक्रिया कमजोर हो सकती है।

कीरोन पोलार्ड जैसे पूर्व ऑलराउंडर का यह कहना कि वह इस नियम के प्रशंसक नहीं हैं, बहस को और वजन देता है। पोलार्ड जैसे खिलाड़ी उसी दौर की पहचान थे जहां एक क्रिकेटर कई भूमिकाएं निभाता था।

समर्थकों की दलील भी कमजोर नहीं?

यह कहना गलत होगा कि इम्पैक्ट प्लेयर नियम के केवल नुकसान हैं। इस नियम ने आईपीएल को और रोमांचक बनाया है। मैच आखिरी ओवर तक खुला रहता है क्योंकि टीमों के पास रणनीतिक विकल्प मौजूद रहते हैं। बड़े स्कोर अब आम हो गए हैं। आईपीएल 2025 के दौरान एमएस धोनी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि इस नियम ने टी20 क्रिकेट की सोच बदल दी है। उन्होंने कहा था, ज्यादा रन सिर्फ अतिरिक्त बल्लेबाज की वजह से नहीं बन रहे, बल्कि बल्लेबाजों को यह भरोसा रहता है कि नीचे एक और बल्लेबाज मौजूद है। यही आत्मविश्वास टीमों को ज्यादा आक्रामक बनाता है।

31 मार्च 2023 को अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में चेन्नई सुपर किंग्स के तुषार देशपांडे आईपीएल इतिहास के पहले इम्पैक्ट प्लेयर बने थे, जब उन्हें गुजरात टाइटन्स के खिलाफ अंबाती रायडू की जगह उतारा गया। इसके बाद टीमों ने इस नियम का तेज़ी से रणनीतिक इस्तेमाल शुरू किया। चेन्नई सुपर किंग्स ने अपने खिताबी अभियान में इसका प्रभावी उपयोग किया, जबकि ध्रुव जुरेल, सुयश शर्मा और वेंकटेश अय्यर जैसे खिलाड़ियों ने इसी नियम के जरिए पहचान बनाई। किसी मिस्ट्री स्पिनर को अचानक उतारना, किसी फिनिशर को आखिरी समय पर भेजना या डेथ ओवर विशेषज्ञ को शामिल करना मैच की दिशा बदल सकता है।

हाल के सीजन में भी यह नियम निर्णायक साबित हुआ। अप्रैल 2026 में राजस्थान रॉयल्स ने एक मुकाबले में डोनोवन फरेरा की जगह रवि बिश्नोई को उतारा, जिन्होंने मैच की तस्वीर बदल दी। वहीं मुंबई इंडियंस ने बल्लेबाजी गहराई के लिए शेरफेन रदरफोर्ड को शामिल किया। इसी सीजन में मुंबई के युवा तेज गेंदबाज अश्वनी कुमार ने इम्पैक्ट प्लेयर के रूप में 4 ओवर में 24 रन देकर 4 विकेट झटके और जीत में अहम भूमिका निभाई।

हालांकि बल्लेबाजों को मिले इस अतिरिक्त सुरक्षा कवच का असर गेंदबाजों पर साफ दिखता है। जब बल्लेबाजी क्रम गहरा हो और नीचे तक हिटर मौजूद हों, तो जोखिम लेने की आजादी बढ़ जाती है। यही वजह है कि कई मैचों में 220, 240 और 250 से ऊपर के स्कोर बनने लगे हैं। पैट कमिंस जैसे खिलाड़ियों ने भी कहा था कि फ्लैट पिच, छोटी बाउंड्री और इम्पैक्ट प्लेयर जैसे नियम बड़े स्कोरों की संस्कृति को बढ़ा रहे हैं।

इम्पैक्ट प्लेयर नियम के आने से क्या बदला?

आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। 2018 से 2022 के बीच आईपीएल में 200 से अधिक स्कोर कुल 66 बार बने थे, यानी औसतन लगभग 13 बार प्रति सीजन। लेकिन इम्पैक्ट प्लेयर नियम लागू होने के बाद तस्वीर तेजी से बदली। 2023 में 37 बार, 2024 में 41 बार और 2025 में अकेले 52 बार टीमें 200 के पार पहुंचीं। 2025 में कुल पारियों के लगभग 36 प्रतिशत में 200+ स्कोर बना।

रन गति भी लगातार बढ़ी है। 2021 में औसत रन रेट 8.05 था, जो 2022 में 8.54, 2023 में 8.99, 2024 में 9.56 और 2025 में 9.62 तक पहुंच गया। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इम्पैक्ट प्लेयर युग शुरू होने के बाद 250 से अधिक स्कोर 11 बार बने, जबकि इससे पहले 17 वर्षों में ऐसा केवल एक बार हुआ था।

विराट कोहली ने भी इस बदलाव की ओर इशारा करते हुए कहा था कि जब बल्लेबाज को पता हो कि नंबर आठ या नौ पर भी विशेषज्ञ बल्लेबाज मौजूद है, तो उसकी सोच बदल जाती है। वह पारी बनाने नहीं, पहली गेंद से हमला करने उतरता है। यही कारण है कि कई मुकाबलों में गेंदबाज अब सिर्फ दबाव झेलते नजर आते हैं।

भारतीय क्रिकेट बोर्ड भी इस बहस से अनजान नहीं है। घरेलू टूर्नामेंटों में इस नियम पर प्रयोग हुए और कुछ जगहों पर इसे हटाया भी गया। इसका अर्थ साफ है कि बोर्ड खुद यह समझने की कोशिश कर रहा है कि यह नियम स्थायी समाधान है या अस्थायी प्रयोग। आईपीएल में इसके होने की वजह सिर्फ क्रिकेट नहीं, बल्कि रोमांच, एंटरटेनमेंट, प्रसारण और आर्थिक मूल्य भी है।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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