Friday, April 24, 2026
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खेती बाड़ी-कलम स्याही: बंपर मतदान के बीच राहुल का ममता बनर्जी पर आरोप; बंगाल में इस बार क्या होगा?

पश्चिम बंगाल में शुरू से ही मतदान का प्रतिशत ज्यादा रहा है। नब्बे के दशक को देखें तो पता चलता है कि तब से ही बंगाल का वोटर टर्नआउट बहुत ज्यादा रहा है।

ऐसा कहा जाता है कि राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं है और जो होता है, वो दिखता नहीं है। इसी तरह चुनाव में ज्यादा या कम मतदान होना भी एक अनसुलझी पहेली है। जैसा कि हम सबने गुरुवार को देखा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 91.78% का रिकॉर्ड तोड़ मतदान हुआ। यह उच्च भागीदारी एसआईआर विवाद के बीच और कम हिंसा के साथ दर्ज की गई है। हालांकि, रिकॉर्ड वोटिंग का मतलब हमेशा एक जैसा नहीं होता, बंगाल का चुनावी इतिहास साक्षी है कि कभी रिकॉर्ड वोटिंग से सरकार गिरी है, तो कभी सत्तारूढ़ पार्टी की सीट में इजाफा भी हुआ है।

ज्यादा वोटिंग, किसके पक्ष में पब्लिक?

पिछला 2021 का विधानसभा चुनाव कोविड महामारी के दौरान हुआ था। उस चुनाव में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच कड़ी टक्कर हुई थी। उस चुनाव में 82.30 फीसदी मतदान हुआ था। इस चुनाव में पिछले चुनाव का आकंड़ा पार करते हुए मतदान के मामले में रिकॉर्ड बनाया है।

हालांकि बंगाल में शुरु से ही मतदान का प्रतिशत ज्यादा रहा है। नब्बे के दशक को देखें तो पता चलता है कि तब से ही बंगाल का वोटर टर्नआउट बहुत ज्यादा रहा है। 1996 के विधानसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत लगभग 83 प्रतिशत था, जो उस समय पूरे देश के हिसाब से बहुत ज्यादा था।

पहले चरण में गुरुवार को बंगाल में वोटिंग प्रतिशत की तस्वीर देखकर तृणमूल का दावा है कि यह स्थिरता के पक्ष में है। यह एसआईआर का विरोध करने का जनादेश है। महिलाएं लक्ष्मी का भंडार हैं और युवाओं ने युवा साथी को वोट दिया। वहीं रिकॉर्ड वोटिंग देखकर भाजपा खेमा भी कम उत्साहित नहीं है। उनका दावा है कि बंगाल में एंटी-एस्टैब्लिशमेंट सेंटिमेंट का तूफान है। यह लक्ष्मी भंडार के लिए वोट नहीं है। यह सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए वोट है। भाजपा दावा कर रही है कि तृणमूल 10 से 12 जिलों में खाता भी नहीं खोल पाएगी।

सिंगूर का अपना दर्द

इन सबके बीच कभी बंगाल की सियासत के केंद्र में रहा सिंगूर मौजूदा विधानसभा चुनाव में हमें अलग-थलग दिख रहा है। वहां के किसानों की बात कोई करता नहीं दिख रहा है। टाटा मोटर्स को यहां से नैनो कार कारखाना समेटे 18 साल हो चुके हैं। लेकिन जमीन वहीं है, किसानों को कोई नहीं पूछ रहा है। कारखाने के बाबत जिनकी कृषि जमीनें अधिग्रहित की गई थीं, उन्हें एक दशक पहले वापस मिल चुकी हैं। पर अधिकांश अब कृषि लायक नहीं बची हैं। कारखाना लगते वक्त कंक्रीट की परत चढ़ने से बंजर हो चुकी हैं। कोलकाता से करीब 40 किलोमीटर दूर हुगली जिले में स्थित सिंगूर चुनाव के इस मौसम में अपनी अलग ही कहानी सुना रहा है।

जिस आंदोलन ने बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंका, उसी ने सिंगूर के किसानों के लिए एक उलझन भरी स्थिति पैदा कर दी है। सत्ता भले ही बदल गई हो, लेकिन जमीन, खेती और रोजगार को लेकर अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है।

सिंगूर की बात यहीं छोड़कर जब हम आगे बढ़ते हैं तो भाजपा एक अलग ही रुप में हमें आगे बढ़ती दिखती है। बंगाल में भाजपा इस बार पूरा जोर लगा रही है ताकि सत्ता तक वह पहुंच सके। वह एंटी-इन्कम्बेंसी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, घुसपैठ और एनआरसी जैसे मुद्दे उठा रही है। साथ ही केन्द्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की बात भी कर रही है। पार्टी का कहना है कि ममता के शासनकाल में कानून-व्यवस्था भी खराब हुई है, रोजगार बड़ी समस्या बना हुआ है और उद्योग-धंधे, यानी बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं। पार्टी हिंदू कार्ड भी खुल कर खेल रही है तो दूसरी तरफ निशाने पर मुस्लिम वोटर और घुसपैठिया भी है।

भाजपा की राह उतनी भी आसान नहीं…

भाजपा को लगता है कि इस बार वह जीत सकती है, लेकिन बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो भाजपा के लिए चुनौती बनी हुई है। आंकड़ों की बात करें तो बीजेपी को जीत के लिए 65-70 फीसदी हिंदू वोटों की जरूरत होगी। वहीं लेफ्ट और कांग्रेस कितनी सेंध लगाती हैं, यह भी देखने वाली बात होगी। इसके अलावा मुस्लिम वोटरों में हूमायूं कबीर और ओवैसी की पार्टी कितना असर डालती है, यह भी अहम रहेगा।

इस बार के चुनाव में भाजपा ने अपने स्टार प्रचारकों को जमीन पर उतार रखा है। अपनी एक चुनावी रैली में पीएम मोदी ने वादा किया है कि 4 मई को जीत के बाद बंगाल में ‘झालमुड़ी’ और मिठाइयां बांटी जाएंगी, दूसरी ओर ममता बनर्जी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं।

वहीं बंगाल चुनाव 2026 के महासंग्राम में ममता बनर्जी के बाद अगर किसी एक चेहरे पर सबसे अधिक चर्चा हो रही है, तो वह हैं शुभेंदु अधिकारी। कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार रहे शुभेंदु भाजपा के सबसे बड़े ‘हथियार’ बनकर उभरे हैं। राजनीतिक गलियारों में उन्हें बंगाल की सत्ता का समीकरण बदलने वाला ‘गेमचेंजर’ माना जा रहा है।

मीडिया इस बार ममता बनर्जी के समानांतर ही शुभेंदु अधिकारी पर भी फोकस दे रही है।

राहुल गांधी के बयान के क्या मायने?

इन सब चुनावी फील्ड रिपोर्ट के बीच विपक्ष के नेता राहुल गांधी का एक वीडियो जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें वह पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रदर्शन को लेकर बात करते हुए नजर आ रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गुरुवार (23 अप्रैल) को कहा कि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का उभार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार की शासन-प्रशासन से जुड़ी नाकामियों की वजह से हुआ है।

राहुल गांधी ने जोर देकर कहा, “यदि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ-सुथरी सरकार चलाई होती और बंगाल में ध्रुवीकरण नहीं करतीं तो भाजपा के लिए रास्ता नहीं खुलता।” उन्होंने कहा कि विचारधारा की लड़ाई में सिर्फ कांग्रेस ही भाजपा को हरा सकती है।

राहुल गांधी की ये टिप्पणियां इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि तृणमूल कांग्रेस विपक्षी गठबंधन का हिस्सा है। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने अपने आधिकारिक X हैंडल से उनका वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “राहुल गांधी टीएमसी को लेकर लगातार सच के बम फोड़ रहे हैं। एक बार फिर धन्यवाद, राहुल जी।”

राहुल गांधी का ये बयान ऐसे समय आया जब पश्चिम बंगाल चुनावों के पहले चरण के लिए मतदान हो रहा था। जबकि दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा। वहीं, मतगणना चार मई को होगी।

यह भी पढ़ें- खेती बाड़ी-कलम स्याही: बंगाल चुनाव- कहानी गुरुदेव के जोड़ासांको विधानसभा सीट की

गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा ने पत्रकारिता की पढ़ाई वाईएमसीए, दिल्ली से की. उसके पहले वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर चुके थे. आप CSDS के फेलोशिप प्रोग्राम के हिस्सा रह चुके हैं. पत्रकारिता के बाद करीब एक दशक तक विभिन्न टेलीविजन चैनलों और अखबारों में काम किया. पूर्णकालिक लेखन और जड़ों की ओर लौटने की जिद उनको वापस उनके गांव चनका ले आयी. वहां रह कर खेतीबाड़ी के साथ लेखन भी करते हैं. राजकमल प्रकाशन से उनकी लघु प्रेम कथाओं की किताब भी आ चुकी है.
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