कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा में है। झारग्राम में वे सड़क किनारे एक स्टॉल पर रूके और दुकानदार से बातचीत करते हुए ‘झालमुड़ी’ खाई। यह वीडियो तेजी से वायरल हुआ। इस पर राजनीतिक बहस तो हो ही रही है, लेकिन साथ ही इसने पश्चिम बंगाल और उत्तर भारत में बिहार से लेकर यूपी तक में लोकप्रिय ‘झालमुड़ी’ को चर्चा में ला दिया। आलम ये हुआ कि सोमवार को गूगल पर झालमुड़ी की सर्चिंग भी खूब बढ़ गई।
गूगल ट्रेंड्स बता रहा है कि झालमुड़ी को लेकर 22 साल में कभी इतना सर्च नहीं किया गया, जितना पिछले दो दिन में कर लिया गया। गूगल पर सर्च को लेकर 2004 से अब तक का डेटा मौजूद है। गूगल ट्रेंड्स के अनुसार 21 अप्रैल को भी दोपहर दो बजे तक झालमुड़ी का सर्चिंग स्कोर 100 में से 87 था, जिसे काफी अच्छा माना जाता है।
दिलचस्प ये भी है कि केवल भारत ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश में भी झालमुड़ी के बारे में बहुत ज्यादा सर्च किया गया। इससे पहले 2022 में एक गाने को लेकर झालमुड़ी पर काफी सर्च किया गया था। झालमुड़ी हम सभी ने खाई होगी, खासकर उत्तर भारत में हिंदी बेल्ट में यह खासा लोकप्रिय स्नैक्स है, पर इसकी कहानी क्या है? बंगाल से खासतौर पर ये कैसे जुड़ा और यहां कितना रचा-बसा है…आईए जानते हैं।
झालमुड़ी, बंगाल और इसका इतिहास
जो लोग झालमुड़ी से परिचित नहीं हैं, उनके लिए बता दें कि यह चावल के बने मुरमुरे या मुड़ी (लावा भी), सरसों के तेल, कटे हुए प्याज, मिर्च, मसालों का एक मसालेदार मिश्रण है। इसे बंगाल के सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड में से एक माना जाता है। इसकी खासियत ये है कि इसे झटपट तैयार किया जा सकता है। साथ ही चटपटा स्वाद और किफायती दाम इसे सभी लोगों के लिए सुलभ बना देते हैं।
सवाल है कि इस चटपटे स्नैक्स की शुरुआत कैसे हुई होगी। इसे लेकर एकदम कोई सटीक तारीख या कहानी नहीं है। हालांकि, गौर करने वाली बात है कि झालमुड़ी का बेसिक इंग्रीडिएंट ‘मुड़ी या मुरी’ भारत में हजारों सालों से खाया जा रहा है। कई जगहों पर भगवान को भोग और फिर इसके प्रसाद के तौर पर इस्तेमाल के भी उदाहरण मिलते हैं।
बिहार, यूपी, बंगाल और ओडिशा जैसी जगहों पर मुड़ी सदियों से एक सस्ता, हल्का और झटपट खाने के लिए तैयार भोजन के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। खासकर गरीब और कामकाजी वर्ग के बीच ये खूब लोकप्रिय रहा है। माना जाता है कि यहीं से आगे बढ़ते हुए ‘झालमुड़ी’ का मौजूदा स्वरूप आया होगा।
फूड रिसर्च और खाने के इतिहास को खंगालने वाले मानते हैं कि झालमुड़ी एक ‘डिश’ के रूप में शायद 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में उभरा होगा, जब कोलकाता (तब कलकत्ता) ब्रिटिश भारत की राजधानी था। ‘कलकत्ता’ के तेजी से शहरीकरण, बढ़ती भीड़ और मजदूर वर्ग के बीच सस्ते, जल्दी मिलने वाले स्ट्रीट फूड की मांग बढ़ी होगी।
इसी दौर में स्ट्रीट वेंडर्स ने मुड़ी, सरसों का तेल, मसाले, प्याज, मिर्च मिलाकर एक चटपटा स्नैक बनाना शुरू किया। यहीं से मुड़ी में ‘झाल’ मुड़ी जुड़ गया। वैसे भी बंगाली में ‘झाल’ का मतलब तीखा/स्पाइसी होता है। झालमुड़ी की लोकप्रियता में रेलवे की भी भूमिका रही। बंगाल के ट्रेनों से लेकर बदलते समय के साथ जब रेलवे नेटवर्क और फैला तो ‘झालमुड़ी’ वाले ट्रेनों में और प्लेटफॉर्म पर नजर आने लगे।
झालमुड़ी की खास बात इसकी सादगी और सस्ती कीमत है। यह बेहद किफायती है और साधारण सामग्री से तैयार होती है, इसलिए यह समाज के हर वर्ग तक पहुंचती है। छात्र हों या दफ्तर जाने वाले लोग, लगभग हर कोई इसे खाता है। राजधानी कोलकाता से फैलते हुए पूरे बंगाल में और बंगालियों के लिए झालमुड़ी सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि यादों और अपनापन से भी जुड़ी है।
इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि झालमुड़ी बंगाल में बचपन की स्मृतियों, स्थानीय त्योहारों, उत्सवों, दोस्तों और परिवार के साथ बिताए पलों, और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रही है। यही वजह है कि झालमुड़ी को सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक विरासत के हिस्से के तौर पर भी देखा जाता है।
बंगाल से ब्रिटेन तक है झालमुड़ी की धमक
झालमुड़ी बंगाली समुदाय के साथ भारत से बाहर भी फैला है। लंदन और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में भी इसकी दुकाने दिख जाएंगी। ब्रिटिश शेफ एंगस डेनून पिछले कई सालों से लंदन की सड़कों पर झालमुड़ी परोस रहे हैं, जिसका वीडियो भी वायरल होता रहा है।
डेनून खुद बताते हैं कि उन्होंने कोलकाता में एक झालमुड़ी विक्रेता को काम करते हुए देखा, वह व्यक्ति अपने पैरों को स्थिर रखते हुए लयबद्ध तरीके से शरीर को घुमा रहा था, और कुशलता से इसे तैयार कर रहा था।
वे आगे बताते हैं कि स्टॉल के पास में एक बेंच थी, और डेनून वहाँ बैठ गए और इसे देखने लगे। बाद में उन्हें पता चला कि उस विक्रेता का यह हुनर खानदानी था, विक्रेता के पिता भी झालमुड़ी बेचने वाले थे।
लंदन लौटने पर डेनून ने अपना फूड वैन, ‘एवरीबॉडी लव लव झालमुड़ी एक्सप्रेस’ लॉन्च किया, जिसने जल्दी ही कई ग्राहक बना लिए। वे बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उनके लिए सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली बात यह रही कि कैसे बड़ी संख्या में लंदन के लोगों ने इसे तीखे और मसालेदार स्वाद को आसानी से अपना लिया और इस स्नैक को उत्साह के साथ पसंद किया।
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