नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (20 अप्रैल) को उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें भारत की स्वतंत्रता के लिए सुभाष चंद्र बोस को स्वतंत्रता का श्रेय देने की मांग की गई थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने टिप्पणी की कि अदालत ऐसे मुद्दों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
इस याचिका में भारत की स्वतंत्रता की “वास्तविक सत्य रिपोर्ट को सार्वजनिक करने” और यह घोषित करने की मांग की गई थी कि वास्तव में सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) ने ही स्वतंत्रता दिलाई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार
अदालत ने याचिकाकर्ता की इस बात के लिए भी आलोचना की कि 2024 में इसी तरह की याचिका खारिज होने के बावजूद उसने दोबारा इस मामले को उठाया।
सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की “क्या आपने पहले भी इसी तरह की याचिका दायर की थी?”
इस पर याचिकाकर्ता पिनाकपानी मोहांती ने जवाब दिया कि “यह बार अलग है।”
अदालत ने हालांकि याचिका पर आगे विचार करने से इनकार कर दिया। पीठ ने यह भी चेतावनी दी कि यदि याचिकाकर्ता इसी प्रकार निराधार याचिकाएं दायर करता रहा तो उसे न्यायालय में आने से प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। पीठ ने टिप्पणी की कि “अब सुप्रीम कोर्ट में एंट्री बैन करवा देंगे तुम्हारा। पहले भी वही याचिका खारिज कर चुके हैं।”
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से मिली स्वतंत्रता का श्रेय उन क्रांतिकारियों को दिया जाए जिन्होंने अहिंसा का पालन नहीं किया और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आईएनए को भी इसमें शामिल किया जाए। अहिंसा के संदर्भ में याचिकाकर्ता का इशारा महात्मा गांधी द्वारा औपनिवेशिक शासन का विरोध करने के शांतिपूर्ण तरीके से था।
सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन को घोषित किया जाए राष्ट्रीय दिवस
याचिका में अन्य मांगे भी की गईं। अदालत से मांग की कि यह निर्देश दिया जाए कि आजाद हिंद फौज/आईएनए का स्थापना दिवस – 21 अक्टूबर, 1943 – राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाए, जो भारतीय स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए नेताजी की आईएनए के 26,000 सैनिकों को श्रद्धांजलि का प्रतीक है।
1947 में भारतीय स्वतंत्रता की वास्तविक सच्चाई की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के निर्देश जारी करने की मांग की। जिसमें यह बताया गया हो कि अंग्रेजों ने भारत कैसे और किन कारणों से छोड़ा, जिसमें अहिंसा का पालन न करने वाले सभी क्रांतिकारी (नेताजी की आजाद हिंद फौज सहित) की भूमिका का जिक्र हो। इसके साथ ही 1946-1947 में तत्कालीन भारतीय सैनिकों, नौसेना, वायु सेना, सेना और नागरिकों के विद्रोह की रिपोर्ट आदि शामिल हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आधिकारिक तौर पर ‘राष्ट्रीय पुत्र’ घोषित करने और उनके जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय दिवस’ के रूप में मनाने और उनके जन्मस्थान (ओडिशा के कटक) को राष्ट्रीय संग्रहालय से सम्मानित करने के निर्देश की भी मांग की गई।
इसके अलावा नीरा आर्य (आईएनए की पहली महिला जासूस) को ‘राष्ट्रीय पुत्री’ घोषित करने और उनके जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय दिवस’ के रूप में मनाने के निर्देश जारी करने की भी मांग की।
अदालत ने ऐसे मुद्दों पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया। इसके साथ ही याचिकाकर्ता द्वारा बार-बार इस तरह की याचिकाएं दायर करने की आलोचना भी की।

