कोलकाता, मतलब गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का घर, ठाकुरबाड़ी। लेकिन क्या आपने इस इलाके को सियासी निगाह से देखने की कोशिश की है? यदि आपको लगता है कि पश्चिम बंगाल का जोड़ासांको केवल रवींद्रनाथ टौगोर के पैतृक घर के लिए जाना जाता है तो आप शायद यहां के सियासी कहानियों से अनजान हैं। तो चलिए आज घूम आते हैं जोड़ासांको विधानसभा सीट।
पश्चिम बंगाल की जोड़ासांको विधानसभा सीट राज्य की सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील सीटों में गिनी जाती है।
जोड़ासांको पूरी तरह से शहरी क्षेत्र है। यह कोलकाता नगर निगम के 11 वार्डों को समेटे हुए है। चितरंजन एवेन्यू , कॉलेज स्ट्रीट और बड़ा बाजार जैसे व्यस्त इलाकों से यह क्षेत्र घिरा हुआ है। इस सीट की बनावट बड़ी पेचीदा है। यहां मारवाड़ी समुदाय, हिंदी भाषी लोग और पुराने बंगाली परिवारों का अनूठा मिश्रण है। रवींद्र सरानी (पुरानी चितपुर रोड) के किनारे बसा यह इलाका व्यापार का केंद्र है। यहां की तंग गलियों में हर रोज करोड़ों का कारोबार होता है।
यह सीट कोलकाता उत्तर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और यहां शहरी मतदाताओं, व्यापारिक वर्ग, अल्पसंख्यक समुदाय और मध्यमवर्गीय आबादी का खास प्रभाव माना जाता है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस का दबदबा रहा है, हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने लगातार अपना वोट शेयर बढ़ाकर मुकाबले को रोचक बना दिया है। ऐसे में 2026 के विधानसभा चुनाव में यहां कड़ा और दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है।
2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जोड़ासांको सीट से तृणमूल कांग्रेस के विवेक गुप्ता ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने भाजपा की मीना देवी पुरोहित को 12,743 वोटों के अंतर से हराया था।
तृणमूल के सामने कड़ी चुनौती
लगातार पांच बार जीत दर्ज करने वाली तृणमूल कांग्रेस को इस बार यहां कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। टीएमसी ने इस बार जोड़ासांको सीट से मौजूदा विधायक विवेक गुप्ता का टिकट काटकर तृणमूल पार्षद विजय उपाध्याय को उम्मीदवार बनाया है। वहीं भाजपा ने इस बार यहां से पार्षद विजय ओझा को उम्मीदवार बनाया है। यह उनका पहला विधानसभा चुनाव है। 2021 में यहां से भाजपा ने मीना देवी पुरोहित को टिकट दिया था। विजय ओझा का दावा है कि उन्हें प्रचार के दौरान जनता से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है और लोग बदलाव के मूड में हैं। उन्होंने तृणमूल पर सिंडिकेट और जंगलराज का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि पार्षद होने के नाते वह प्रचार के दौरान भी लोगों के जरूरी काम निपटा रहे हैं।
इस बार जोड़ासांको सीट पर मुकाबला मुख्य रूप से टीएमसी और भाजपा के बीच सिमटा दिखाई देता है। शहरी मतदाता और मध्यम वर्ग का रुख इन चुनावों के नतीजों पर बड़ा असर डाल सकता है। अल्पसंख्यक वोट बैंक हालांकि परंपरागत रूप से तृणमूल के साथ रहा है, लेकिन भाजपा का बढ़ता संगठन और वोट प्रतिशत मुकाबले को कड़ा बना रहा है। इन चुनावों में महिला मतदाताओं की भूमिका भी अहम होगी। कुल मिलाकर राज्य में ममता बनर्जी की पकड़ मजबूत है, फिर भी शहरी सीटों पर भाजपा लगातार चुनौती दे रही है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जोड़ासांको में 2026 का चुनाव कड़ा, रोचक और निर्णायक होने की पूरी संभावना है।
गौरतलब है कि जोड़ासांको विधानसभा महानगर कोलकाता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण केंद्र है। इसका एक कारण यह है कि यहां ठनठनिया कालीबाड़ी विश्व प्रसिद्ध है, वहीं गुरुद्वारा बड़ा सिख संगत, जहां गुरू नानक देव जी से लेकर नौवें गुरु तेगबहादुर के कदम पड़ने के कारण यह इलाका पावन हो गया था। कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की जन्मस्थली ठाकुरबाड़ी तो यहां है ही।
इधर, बड़ाबाजार पहले बंगाल का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा है। किसी को कपड़ा खरीदना हो, राशन-पानी, किताबें, बर्तन, पेन से लेकर कुछ भी थोक और खुदरा ग्राहक के लिए यही एक केंद्र था। बीते कुछ सालों में भले ही राज्य में व्यापारिक केंद्रों का विस्तार हो गया है, लेकिन यहां का महत्व कम नहीं हुआ है। इलाके को मारवाड़ी बहुल के तौर पर भी जाना जाता है।
मारवाड़ी विधायकों का रहा है दबदबा
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की जनसंख्या 2,34,845 है। 2019 लोकसभा चुनाव के अनुसार यहां कुल मतदाता 1,91,912 हैं। 79 प्रतिशत हिंदू और 21 प्रतिशत मुसलमान हैं। 03 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग हैं। 59 प्रतिशत पुरुष और 41 प्रतिशत महिलाएं हैं। 81 फीसदी पुरुष और 84 फीसदी महिलाएं शिक्षित हैं।
यह राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषियों का इलाका है। जोड़ासांको सीट से मारवाड़ी विधायकों ने ही लंबे समय तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया है। अपवाद के रूप में 1952 में फॉर्वर्ड ब्लॉक लेफ्ट के अमरेंद्रनाथ बसु ने कांग्रेस के भगवती प्रसाद खेतान को भारी बहुमत से हराया था। इसके बाद पूरे बीस साल कांग्रेस यहां बेताज बादशाह रही। 1957 से 1977 तक कांग्रेस के मारवाड़ी उम्मीदवार भारी मतों से विजयी होते रहे।
ममता बनर्जी की पार्टी ने इस प्रतिष्ठित सीट पर 2001 में कब्जा जमाया जो आज तक बरकरार है। 2001 और 2006 में मुख्य मुकाबला दो मारवाड़ियों तृणमूल कांगेस के सत्य नारायण बजाज और ऑल इंडिया फॉर्वर्ड ब्लॉक के श्याम गुप्ता के बीच रहा। दोनों बार सत्यनारायण बजाज विजयी रहे। दरअसल, 1957 से लेकर 2006 तक इस सीट पर मारवाड़ी प्रत्याशी ही विजयी होते रहे। 2011 और 2016 में भी यहां से तृणमूल की ही जीत हुई थी।
1957 में कांग्रेस के आनंदीलाल पोद्दार, 1962 में कांग्रेस के बद्री प्रसाद पोद्दार, 1967 में कांग्रेस के आर के पोद्दार, 1969, 1971 और 1972 में कांग्रेस के देवकीनंदन पोद्दार विजयी रहे। 1977 में आपातकाल के बाद हुए विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी के विष्णुकांत शास्त्री चुनाव जीते।
लेकिन अगले चुनाव में 1982 में कांग्रेस के मारवाड़ी उम्मीदवार देवकी नंदन पोद्दार फॉर्वर्ड ब्लॉक के मारवाड़ी उम्मीदवार श्याम सुंदर गुप्ता को हरा कर चुनाव जीत गए। देवकीनंदन पोद्दार ने मारवाडी बहुल जोड़ासांको सीट पर लंबी पारी खेली। वे 1987, 1991, 1996 में लगातार चुनाव जीते। इस सीट के चुनावी इतिहास में देवकीनंदन पोद्दार सबसे लोकप्रिय नेता रहे।
इस बार कौन होगा ‘सिकंदर’?
21वीं सदी की शुरुआत में 2001 में तृणमूल ने जब पहली बार अपना उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया तो मारवाड़ी बहुल इलाका देखते हुए मारवाड़ी सत्यनारायण बजाज को और 2006 में दिनेश बजाज को अपना उम्मीदवार बनाया। दोनों बार तृणमूल उम्मीदवार चुनाव जीते। हालांकि फॉर्वर्ड ब्लॉक ने भी मारवाड़ी श्यामसुंदर गुप्त को अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पाए।
महानगर कोलकाता के इस इलाके में हिंदी भाषी मतदाता परंपरागत रूप से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में यहां इस बार हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा है- क्या टीएमसी अपनी अजेय बढ़त बनाए रख पाएगी या भाजपा जो लोकसभा चुनावों में अपना दम दिखाती है, विधानसभा में भी सेंध लगा पाएगी ?
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