नई दिल्ली: गणतंत्र दिवस 2026 की परेड में देश की सैन्य ताकत और तकनीकी प्रगति को दर्शाती कई झांकियां नजर आईं। इन्हीं में एक झांकी ‘ड्रोन शक्ति’ की भी थी, जिसने खास तौर पर लोगों का ध्यान खींचा। इस झांकी के जरिए भारतीय सेना ने संकेत दिया कि आने वाले समय में युद्ध की रणनीति में ड्रोन की भूमिका कितनी अहम होने वाली है। यह सिर्फ अत्याधुनिक तकनीक का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि इस बात का ऐलान था कि अब ड्रोन हर मोर्चे पर तैनात सैनिक की रोजमर्रा की जरूरत बनेंगे।
‘ईगल ऑन आर्म’
सेना की इस नई रणनीति को ‘ईगल ऑन आर्म’ का नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य ड्रोन्स को सीधे बटालियनों और रेजिमेंटों के स्तर पर समाहित करना है। वर्षों तक मानवरहित विमानों को ‘हाई-वैल्यू एसेट’ मानकर केवल उच्च स्तर के फॉर्मेशन तक सीमित रखा गया था, लेकिन आधुनिक युद्धों के अनुभव ने यह साबित कर दिया है कि ड्रोन तभी सबसे प्रभावी होते हैं जब वे असाधारण के बजाय ‘साधारण’ और हर समय उपलब्ध हों।
इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि अब इन्फैंट्री यूनिटों के पास अपनी निगरानी प्रणाली होगी, आर्टिलरी बैटरियां लक्ष्य साधने के लिए अपने स्वयं के यूएवी का उपयोग करेंगी, और किसी कमांडर को अगले पहाड़ के पीछे देखने के लिए उच्च मुख्यालय की मंजूरी का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
‘ड्रोन शक्ति’ केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि एक पूरा इकोसिस्टम है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है- सस्टेनमेंट। सेना ने ऐसे मोबाइल रिपेयर वाहनों का प्रदर्शन किया है जो चलते-फिरते मरम्मत और असेंबली हब के रूप में कार्य करते हैं। हाल के सैन्य अभियानों, खासकर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन की भूमिका बेहद अहम रही। इस ऑपरेशन में भारतीय सशस्त्र बलों ने ड्रोन और कामिकाजे ड्रोन के जरिए दुश्मन के रडार, मिसाइल सिस्टम और अन्य उच्च-मूल्य वाले ठिकानों को निशाना बनाया। इस अनुभव ने यह साफ कर दिया कि भविष्य के संघर्षों में ड्रोन केवल सहायक तकनीक नहीं, बल्कि निर्णायक हथियार बन चुके हैं।
ड्रोन शक्ति मिशन की शुरुआत जल्द
इसी रणनीतिक सोच को मजबूती देने के लिए केंद्र सरकार जल्द ही ‘ड्रोन शक्ति मिशन’ शुरू करने जा रही है। द इकोनामिक टाइम्स ने सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद के हवाले से एक रिपोर्ट में कहा कि इस मिशन का उद्देश्य ड्रोन के कलपुर्जों के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देना और उन्नत ड्रोन तकनीक के लिए शोध एवं विकास को प्रोत्साहित करना है। फिलहाल भारत में ज्यादातर ड्रोन आयातित पुर्जों से असेंबल किए जाते हैं, लेकिन नए मिशन के तहत कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर विशेष जोर दिया जाएगा, ताकि तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके।
यह मिशन अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के तहत शुरू किया जाएगा, जिसका मकसद देश में रिसर्च, इनोवेशन और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट की संस्कृति को मजबूत करना है। सरकार एडवांस मैन्युफैक्चरिंग, रोबोटिक्स और ड्रोन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की योजना पर भी काम कर रही है।

सेना स्तर पर भी बड़े बदलाव किए जा रहे हैं। मोबाइल ड्रोन रिपेयर यूनिट, फील्ड असेंबली सिस्टम और प्रशिक्षित तकनीकी टीमें विकसित की जा रही हैं, ताकि युद्ध क्षेत्र के पास ही ड्रोन की मरम्मत और दोबारा तैनाती संभव हो सके। इससे लंबे समय तक चलने वाले अभियानों में ड्रोन की उपलब्धता बनी रहेगी।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह के अनुसार, सरकार द्वारा किए जा रहे अधिकांश बड़े सुधार तकनीक आधारित हैं। एक लाख करोड़ रुपये के रिसर्च डेवलपमेंट और इनोवेशन फंड के जरिए निजी क्षेत्र में शोध को सीधी सहायता दी जा रही है, ताकि रक्षा और नागरिक दोनों क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीक विकसित हो सके।

