नई दिल्लीः इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में उन दो युवकों के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द करने से इंकार कर दिया जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर फेसबुक पर टिप्पणी की थी। पीएम मोदी और आरएसएस पर पोस्ट को लेकर अदालत ने कड़ा रुख किया है।
जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव ने आरोपी जुबैर अंसारी और इजाहर आलम द्वारा मामले को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। इसके साथ-साथ बीते साल सोनभद्र अदालत में पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र को रद्द करने के लिए दायर याचिका को भी खारिज कर दिया।
पीएम मोदी को देश ने चुना हैः इलाहाबाद हाई कोर्ट
अदालत ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही साबित होते हैं क्योंकि निचली अदालत ने पुलिस द्वारा आरोपित अपराधों का संज्ञान लिया है। अदालत ने कहा कि आरएसएस एक संस्था है जो इससे जुड़े समूहों के साथ मिलकर बीते 100 वर्षों से समाज के विभिन्न तबकों तक सुविधाएं मुहैया करा रही है। अदालत ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अधिकांश नागरिकों ने चुना है।
आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1)(ए), 351(2), 352 और 353(2) के तहत समाज में शत्रुता फैलाने और अपने बयानों से शांति भंग करने का प्रयास करने का आरोप है।

आरोप यह भी है कि आरोपियों के फेसबुक अकाउंट से पता चलता है कि लगभग हर पोस्ट राष्ट्रविरोधी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस के खिलाफ थी।
अभियुक्तों के वकील ने क्या दलील दी?
इस मामले में अदालत के सामने उपस्थित हुए अभियुक्तों के वकील ने दलील दी कि एफआईआर उन्हें परेशान करने की दुर्भावनापूर्ण मंशा का नतीजा है। दूसरी ओर राज्य ने कहा कि मामले को निचली अदालत में आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए।
इन दलीलों पर विचार करते हुए अदालत ने शुरुआत में ही कहा कि सोशल मीडिया पर लोग कभी-कभी अपने कृत्यों के परिणामों को समझे बिना पोस्ट अपलोड करके सीमा पार कर जाते हैं।
अदालत ने कहा कि हालांकि सोशल मीडिया का इस्तेमाल किसी भी मुद्दे पर विचार और राय व्यक्त करने के लिए किया जा सकता है लेकिन इस अधिकार का दुरुपयोग या अतिउपयोग नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने अतीत में सोशल मीडिया के दुरुपयोग के उदाहरणों का भी उल्लेख किया।
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अदालत ने सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया के अन्य दुरुपयोगों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। अदालत ने आगे कहा कि सोशल मीडिया की एक और खामी यह है कि नाबालिग भी आसानी से वयस्क वीडियो या पोर्न वीडियो तक पहुंच सकते हैं।
न्यायालय ने आगे कहा कि बीएनएस की धारा 196(1)(ए) फेसबुक पोस्ट पर तब लागू होती है जब सामग्री जानबूझकर धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास स्थान, भाषा, जाति या समुदाय के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी, घृणा या दुर्भावना को बढ़ावा देती है।
अदालत में मौजूद सामग्री पर विचार करते हुए जस्टिस ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है।

