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तमिलनाडु सरकार को झटका, राष्ट्रपति ने मद्रास यूनिवर्सिटी बिल लौटाया, विधेयक को लेकर क्या है पेंच?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ‘मद्रास विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2022’ को बिना मंजूरी दिए राज्य सरकार को वापस लौटा दिया है। राज्य सरकार इसके जरिए विश्वविद्यालयों के कुलपति की नियुक्ति और उन्हें हटाने का अधिकार राज्यपाल से छीनकर अपने पास लेना चाहती थी।

चेन्नई के 168 साल पुराने प्रतिष्ठित मद्रास विश्वविद्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर चल रही लंबी कानूनी और राजनीतिक जंग में तमिलनाडु की डीएमके (डीएमके) सरकार को बड़ा झटका लगा है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ‘मद्रास विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2022’ को बिना मंजूरी दिए राज्य सरकार को वापस लौटा दिया है। राज्य सरकार इसके जरिए विश्वविद्यालयों के कुलपति की नियुक्ति और उन्हें हटाने का अधिकार राज्यपाल से छीनकर अपने पास लेना चाहती थी। विधेयक में ‘चांसलर’ शब्द के स्थान पर ‘सरकार’ शब्द जोड़कर चुनी हुई सरकार को अकादमिक नेतृत्व से जुड़े फैसलों में अंतिम प्राधिकारी बनाने की मंशा थी।

हालांकि, राज्यपाल आरएन रवि ने इसे राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखते हुए यह कहते हुए आगे बढ़ाया था कि प्रस्तावित बदलाव विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमों और उपकुलपति नियुक्ति से जुड़े स्थापित मानकों के खिलाफ हो सकते हैं। राष्ट्रपति भवन की ओर से लौटाने के पीछे दिए गए कारणों पर विभाग के अधिकारी फिलहाल खुलकर कुछ कहने से बच रहे हैं।

क्या था विवादित विधेयक?

अप्रैल 2022 में तमिलनाडु विधानसभा ने मद्रास विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन के लिए एक विधेयक पारित किया था। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य कुलपति की नियुक्ति और उन्हें पद से हटाने का अधिकार राज्यपाल (जो विश्वविद्यालय के पदेन कुलाधिपति होते हैं) से छीनकर राज्य सरकार को सौंपना था।

तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री के. पोनमुडी और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने तर्क दिया था कि गुजरात और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी सरकार ही कुलपतियों की नियुक्ति करती है, इसलिए तमिलनाडु में भी निर्वाचित सरकार को ही अंतिम निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। हालांकि, राज्यपाल आरएन रवि ने यूजीसी नियमों और स्थापित मानदंडों के उल्लंघन की आशंका जताते हुए इस विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख लिया था।

बिना कुलपति संचालित हो रहे 22 में से 14 विश्वविद्यालय

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक मद्रास विश्वविद्यालय बीते दो वर्षों से अधिक समय से नेतृत्व के संकट से जूझ रहा है। अगस्त 2023 से यहां कोई स्थायी कुलपति नहीं है और संस्थान का कार्यभार एक कन्वीनर कमेटी द्वारा संभाला जा रहा है।

विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों का कहना है कि स्थायी नेतृत्व न होने के कारण शैक्षणिक योजना, अनुसंधान की मंजूरी और प्रशासनिक कार्यों पर बेहद बुरा असर पड़ा है। केवल मद्रास विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि राज्य के कुल 22 विश्वविद्यालयों में से 14 इस समय बिना स्थायी कुलपति के ही काम कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और ‘डीम्ड एसेंट’

कुलपतियों की नियुक्ति और विधेयकों को रोके जाने का यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था। अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी असाधारण शक्तियों (अनुच्छेद 142) का प्रयोग करते हुए तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित 10 अन्य विधेयकों को ‘डीम्ड एसेंट’ यानी स्वीकृत मान लिया था। इनमें 18 राज्य विश्वविद्यालयों से जुड़े उपकुलपति नियुक्ति विधेयक भी शामिल थे।

इस फैसले के बाद राज्य सरकार ने कई विश्वविद्यालयों में नियुक्तियाँ भी की थीं, लेकिन इन पर कानूनी चुनौतियां आईं और मामला मद्रास हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में उलझ गया। मद्रास विश्वविद्यालय से जुड़ा विधेयक अदालत के उस दायरे में नहीं आया और राष्ट्रपति के फैसले का इंतजार करता रहा।

राज्य सरकार के पास क्या विकल्प हैं?

राष्ट्रपति द्वारा बिना हस्ताक्षर के विधेयक वापस किए जाने के बाद अब राज्य सरकार को इस कानून पर नए सिरे से विचार करना होगा। उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सरकार वर्तमान में सभी कानूनी और विधायी विकल्पों की समीक्षा कर रही है। सरकार के पास या तो विधेयक को संशोधनों के साथ दोबारा पारित करने का विकल्प है या फिर राज्यपाल के साथ समन्वय कर नियुक्ति की वर्तमान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता बचा है। फिलहाल राष्ट्रपति के इस कड़े रुख ने राज्य सरकार की प्रशासनिक स्वायत्तता की योजना पर पानी फेर दिया है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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