Sunday, April 5, 2026
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पुस्तक समीक्षाः ये स्त्रियां कभी हारतीं नहीं

हिंदी कथा-साहित्य में स्त्री-लेखन को अक्सर एक तयशुदा स्त्रीवादी चौखटे में परखने की प्रवृत्ति रही है, लेकिन कुछ लेखिकाएँ इस सीमांकन से बाहर जाकर जीवन की अधिक जटिल और व्यापक सच्चाइयों को सामने लाती हैं। योगिता यादव का कहानी-संग्रह ‘नए घर में अम्मा’ इस परंपरा का विस्तार है। यहाँ स्त्रियाँ केवल प्रतिरोध नहीं करतीं, बल्कि बदलते समाज की सक्रिय संवाहक बनकर उभरती हैं। चुपचाप, लेकिन लगातार संघर्ष करती हुईं।

हिंदी में स्त्री-लेखन के भीतर स्त्रीवादी रुझानों को पहचानने का दबाव इतना ज़्यादा है कि जब भी कोई स्त्री लिखती है तो उसकी रचनाओं में पहले वे तत्व खोजने की कोशिश शुरू हो जाती है जिसका वास्ता स्त्री-विमर्श नाम के किसी बोध से हो। निश्चय ही इस प्रवृत्ति के अपने सकारात्मक असर रहे हैं। हिंदी आलोचना ने स्त्री लेखन की परंपरा को नए सिरे से खंगाला है और उन पहलुओं की पहचान की है जिनसे लेखन में छुपे सामंती या पितृसत्तात्मक रुझानों को पकड़ा जा सके या फिर उन मातृमूलक मूल्यों की पहचान की जा सके जिन्हें पारंपरिक आलोचना-विवेक अनदेखा करता रहा है। लेकिन शायद इस प्रवृत्ति में चले आने वाले अतिरिक्त दबाव की वजह से हिंदी में सक्रिय महिला लेखकों ने ख़ुद को बहुत सख़्ती से स्त्रीवादी लेखक मानने से इनकार किया है। इस सूची में कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, अलका सरावगी और गीतांजलि श्री जैसी वरिष्ठ लेखिकाएं भी शामिल हैं। सच तो यह है कि इन सबका लेखन इतना विविधतापूर्ण है और इतने सारे आयाम समेटता है कि इसे स्त्री विमर्श के चौखटे में रखकर देखना स्त्री विमर्श से भी अन्याय है और इन लेखिकाओं से भी। इसके बावजूद एक सच यह भी है कि इन सबके लेखन में एक बहुत सूक्ष्म सी अंतर्धारा वह भी है जो अंततः स्त्री-संवेदना से ही निकलती है और उनके पूरे लेखन को एक अलग आस्वाद भी देती है।

बीते दिनों आए योगिता यादव के कहानी संग्रह ‘नए घर में अम्मा’ को पढ़ते हुए नए सिरे से यह खयाल आता है कि उनकी कहानियां भी स्त्रीवादी लेखन के स्थूल दायरों के भीतर  समाने से इनकार करती हैं, लेकिन अंततः स्त्री होने की चेतना इन कहानियों का एक अपरिहार्य अवयव है। इस संग्रह में कई उल्लेखनीय बातें हैं। पहली बात यह कि योगिता यादव की लगभग सभी कहानियां उस नए दौर की कहानियां हैं जो उदारीकरण के दो-तीन दशकों में विकसित हुए विराट उपभोक्ता वर्ग और उसके नए रुझानों के बीच बन रहा है। दूसरी बात यह कि योगिता की कहानियों में पर्याप्त विविधता है। तीसरी बात यह कि इन कहानियों में कई बार योगिता विधा का व्याकरण तोड़ती भी प्रतीत होती हैं। अमूमन बहुत लंबे अंतरालों में फैली उनकी कहानियां जैसे औपन्यासिक होने की चाह के बीच समेट दिए गए आख्यानों से बनती हैं। चौथी बात यह कि योगिता अपनी कहानियों में घटनाओं से ज़्यादा प्रक्रियाओं को महत्व देती हैं। ये कहानियां चौंकातीं नहीं, धीरे-धीरे विकसित होती हुई किसी एक बदलाव की ओर आहिस्ते से इशारा कर जाती हैं। पांचवीं बात यह कि इन कहानियों में हमारे समय के कई जलते हुए सवालों से मुठभेड़ दिखती है। यौन हमलों, सांप्रदायिकता और जातिवाद के छुपे हुए नासूरों पर ये कहानियां बहुत संवेदनशीलता से इशारा करती हैं। इन कहानियों में बदली हुई लड़की भी दिखती है और बदला हुआ दौर भी- इन सबके अलावा वे ढेर सारी जटिलताएं भी, जो हमारे समय कई तरह की नई दुविधाओं से भर रही हैं।

कुल आठ कहानियों से बने इस संग्रह की पहली ही कहानी ‘शहद का छत्ता’ इस जटिलता की मिसाल है। कहानी में एक दफ़्तर है, दफ़्तर में काम करने वाली एक लड़की है, उसकी एक बॉस है, और बॉस की ज़बरदस्ती है। अमूमन दफ़्तरों में यौन उत्पीड़न की कहानियां हम पुरुषों के साथ जोड़ते हैं, लेकिन यहां एक स्त्री है जो इस उत्पीड़न का केंद्र बनती है। पूछा जा सकता है- योगिता यादव यह बदलाव क्यों करती हैं? क्या कुछ अलग कहने की इच्छा से? या यह साबित करने के लिए कि यौन उत्पीड़न में सिर्फ पुरुषों को खलनायक बनाना ठीक नहीं? लेकिन यह अनुमान एक ख़तरनाक सरलीकरण है जो कहानी में मौजूद एक ज़रूरी और संवेदनशील पहलू की उपेक्षा करता है। दरअसल यह कहानी साबित यही करती है कि योगिता यादव बनी-बनाई लीक पर नहीं चलतीं, वे दिए हुए सच से ज़्यादा देखे हुए सच पर भरोसा करती हैं और अगर यह कहानी उन्होंने लिखी है तो इसलिए कि इस समाज में यह कहानी उन्हें मिली है। जाहिर है, कहानियां ठीक उसी तरह नहीं मिलतीं जिस तरह वे लिखी जाती हैं, लेकिन वे हैं और एक लेखिका को मजबूर करती हैं कि उन्हें लिखा जाए।

संग्रह की दूसरी कहानी ‘भाप’ में बहुत लंबा अंतराल है। एक घर बन रहा होता है। घर पूरा हो जाता है। घर में एक परिवार रहने आ जाता है। परिवार के दो बच्चे बड़े होते हैं। दोनों आईएएस हो जाते हैं। इतने लंबे अंतराल में तो पूरा उपन्यास हो जाए। लेकिन शायद योगिता यादव की नज़र उस मूल कथ्य पर टिकी रहती है जो इस कहानी के पीछे है। जब से घर बना और यह परिवार आया, तब से उसकी जाति को लेकर मोहल्ले वालों में संदेह है। मोहल्ले वाले कभी इस परिवार से छिटकना चाहते हैं और कभी अपने स्वार्थ की वजह से क़रीब आना चाहते हैं। बच्चे जब बड़े अफ़सर बन जाते हैं तो परिवार की नाक ऊंची हो जाती है। लेकिन मोहल्ले में सवाल बचा हुआ है- आख़िरकार इनकी जाति क्या है।

तीसरी कहानी ‘तस्कीन’ सोशल मीडिया और वाट्सऐप समूहों पर गढ़े जा रहे उस नए भारतीय सामान्य ज्ञान की कहानी है जिसके मूल में सांप्रदायिक विद्वेष का चरम है। इन वाट्सऐप समूहों पर योग सिखाया जाता है, भक्ति सिखाई जाती है, देशभक्ति सिखाई जाती है, अनजान लोगों से बचने की सलाह दी जाती है और वे उदाहरण बताए जाते हैं जिनमें मुस्लिम लोग कभी खाने में थूक रहे हैं और कभी सर तन से जुदा कर रहे हैं। बेशक, बाक़ी कहानियों से अलग इस कहानी में एक नाटकीय मोड़ आता है जब इन वाट्सऐप समूहों में रमी और इनकी वजह से अपना रक्तचाप बढ़ा रही श्रीमती वर्मा के भीतर एक निर्णायक क्षण में एक स्त्री खड़ी हो जाती है जो एक बच्ची को किसी अनिष्ट के अंदेशे से बचा रही है।

चौथी कहानी ‘नए घर में अम्मा’ फिर एक बड़े अंतराल में फैली कहानी है। अम्मा पहले अकेली पड़ती है, फिर कमज़ोर पड़ती है और बुढ़ापा आते-आते इतनी कमज़ोर पड़ जाती है कि वह हर किसी की उपेक्षा और उसके शोषण का शिकार बनती चली जाती है। इस शोषण की शुरुआत देवर से होती है और फिर उसके बाद हर कोई जैसे उन्हें अपनी संपत्ति समझने लगता है और यहां तक कि उनका पोता भी उनके साथ बदसलूकी करता है। इस दौरान उनका घर टूटा-फूटा है। लेकिन इत्तिफ़ाक से गांव में एक महिला प्रधान आती है, जो प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य योजनाओं के तहत अम्मा का घर बनवाती है, उसे दूसरी सहूलियतें दिलवाती है। सिर पर एक छत और हल्की सी मदद अम्मा के भीतर फिर से खड़े होने का और अपने साथ बदसलूकी का प्रतिरोध करने का आत्मविश्वास पैदा कर देते हैं।

‘सिलबट्टा शुक्ला का दांपत्य’ एक दिलचस्प और कुछ हद तक मनोरंजक कहानी है जो पढ़ाई-लिखाई कर अफ़सर बनने की लगन पाले एक लड़की के आसपास घूमती है। पहले शुक्ला जी के जीवन से उनका मनचाहा प्रेम गया, फिर पत्नी आई तो वह वैसी पारिवारिक नहीं निकली जिसकी उम्मीद थी- वह बस पढ़ने वाली लड़की है जो किसी तरह घर का काम निबटा कर सबकी अपेक्षाओं को अंगूठा दिखाकर कमरे में पढ़ने के लिए बंद हो जाती है। उसे बच्चे नहीं, पहले नौकरी चाहिए। चाहें तो इसे एक बदले हुए समय की लड़की की कहानी की तरह पढ़ सकते हैं।

‘ताऊ जी कितने अच्छे हैं’ घर के भीतर ही एक बच्ची के यौन शोषण की उदास कहानी है और अपनी सीमाओं के भीतर उसके प्रतिशोध की भी। यह कहानी वाकई परेशान करती है।

‘आख़िरी नज़र’ को उस प्रेम की कहानी की तरह पढ़ा जा सकता है जो हमेशा अनकहा रह गया। कथावाचक की मां के देहांत के समय वह लड़की अपनी बच्ची के साथ शोक जताने आई है जो कभी उसे बेहद पसंद थी और इस वजह से उसकी मां को भी। लड़की मां को अंतिम विदाई देने आई है लेकिन इस तरह रो रही है जैसे अपने छूटे हुए प्रेम को भी आख़िरी बार विदा कर रही हो। यह मार्मिक कहानी देर तक अपना प्रभाव बनाए रखती है।

संग्रह की अंतिम कहानी ‘गंध’ रिश्तों के उस मनोविज्ञान की कहानी है जो मनोविश्लेषकों के सरलीकरण से आगे जाता है। पति की मौत के बाद पत्नी लगातार उसे याद करती है, एक गंध उसका पीछा करती है। उसकी दोस्त जैसी मनोविश्लेषक को लगता है कि शायद इस मनोग्रंथि के पीछे यौन-अतृप्ति हो, जिसे पूरा करने के वह कुछ कृत्रिम उपाय सुझाती है। लेकिन अंततः नायिका को समझ में आता है कि दरअसल वह अपने प्रेम से और उसकी गंध से पीछा नहीं छुड़ा पाएगी- यह नकली उपाय उसके काम का नहीं।

तो ये सारी कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन क्या इनके पीछे कोई एक वैचारिक सूत्र भी है? लेखिका ने ‘कथा के बहाने’ शीर्षक से जो भूमिका लिखी है, उसमें एक सूत्र वह बिल्कुल आख़िरी में देती है। वे लिखती हैं- ‘वर्ष 2020 के बाद से लिखी गई इन कहानियों में ऐसी ही स्त्रियां हैं जो सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं, अपने समाज और परिवार को थोड़ा और सुंदर बनाने के लिए लड़ रही हैं। जिन्हें अगली पीढ़ियों के लिए रास्ते के ये कंकड़ साफ़ करने हैं। ऐसा नहीं है कि इनमें पुरुषों का कोई विरोध है, बल्कि उन सहज, सरल पुरुषों का साथ भी है जो स्त्रियों को अपने समान मनुष्य मानते हैं और उनके अधिकारों की लड़ाई में उनके साथ खड़े हैं।‘ इसके पहले वे पितृसत्ता के नकली युद्धों से सावधान करती हैं।

इस नज़र से देखें तो यह बात कुछ और समझ में आती है कि योगिता यादव दरअसल व्यक्तियों और स्थितियों की कहानी नहीं लिख रही हैं, वे परिवारों और समाजों की, उनके संघर्ष की और उन प्रक्रियाओं की कहानी लिख रही हैं जिनमें ये स्त्रियां हैं और जिन्हें वे सबके साथ मिलकर बदल भी रही हैं। यहीं यह खयाल भी आता है कि लगभग हर कहानी की केंद्रीय चरित्र कोई न कोई महिला है, वह भी नौकरी करने वाली, नौकरी चाहने वाली या अपने घर के लिए, अपने प्रतिरोध के लिए संघर्ष करने वाली महिलाएं। इस लिहाज से यह हमारे समय का एक महत्वपूर्ण संग्रह है जिस पर सबकी नज़र पड़नी चाहिए।

लेकिन बात यहां ख़त्म नहीं होती। योगिता यादव की कहानियों के शिल्प पर नज़र डालना ज़रूरी है। उनके पास बहुत संवेदनशील और जीवंत कथा-भाषा है, लेकिन कई बार वे शिल्प की शर्तों के प्रति बेपरवाह नज़र आती हैं। अमूमन यह माना जाता है कि कहानी में कई तरह की एकसूत्रताएं होनी चाहिए- वह एक निश्चित समय में घटनी चाहिए, निश्चित चरित्रों के आसपास होनी चाहिए और एक निश्चित घटना को केंद्र में रखकर होनी चाहिए। बेशक, शिल्प की इस अपेक्षा को तोड़ कर इसके बाहर जाकर भी दुनिया की महान कहानियां लिखी गई हैं, लेकिन उन्होंने फिर अपना एक अलग शिल्प बनाया है। योगिता लेकिन ऐसा नहीं करतीं। वे बस कहानी कहती जाती हैं, दिन गुज़रते जाते हैं, बच्चे बड़े होते जाते हैं, स्थितियां विकसित होती जाती हैं और इनके बीच उनकी कहानी भी खड़ी होती जाती है।

सवाल है, इसमें हर्ज क्या है? अगर कहानियां एक संपूर्णता का एहसास कराती हों- जो उनमें है- तो परेशानी क्या है? बस यही कि कुछ कहानियों का संपूर्ण प्रभाव कुछ खंडित हो जाता है। उनकी तीव्रता वह नहीं बचती जो उनसे अपेक्षित होती है। हम कहानी पढ़ लेते हैं, उसके विचार को भी समझ लेते हैं, लेकिन उससे बहुत स्पंदित नहीं होते। ‘भाप’ इस प्रक्रिया की सबसे ज्यादा शिकार होती है। अगर जातिगत भेदभाव की कोई विडंबना है तो वह बिल्कुल समझ में आ जाती है, लेकिन शायद चुभती नहीं। इसलिए कि हम इस विडंबना को लगभग रोज़ अपने जीवन में पहचानने के आदी हैं। वह चुभती तब है जब कोई कहानी कुछ सिहरा देने वाले अनुभव के साथ इस स्थिति को हमारे बीच रखती है। हालांकि इसकी अपनी सांकेतिकता है। एक पूर्वग्रह भाप की तरह बना हुआ है जो अलग तरह के ज़ख़्म देता है।

इसी तरह ‘नए घर में अम्मा’ बहुत अच्छी और मार्मिक होते हुए भी उतना गहरा प्रभाव पैदा नहीं कर पाती, जितना कर सकती है। निस्संदेह ‘शहद का छत्ता’ और ‘ताऊजी कितने अच्छे हैं’ अपने प्रभाव में सिहरा देती हैं। लेकिन शहद का छत्ता का बिंब कहानी से बाहर खड़ा रह जाता है। वह मूल कथावस्तु से मेल नहीं खाता- सिवा इस तर्क के कि कहानी में उत्पीड़क एक लड़की है।

लेकिन कुल मिलाकर ‘नए घर में अम्मा’ हमारे समय का महत्वपूर्ण संग्रह है। वह स्त्री-लेखन की परंपरा को कुछ और आगे बढ़ाता है, लेकिन याद दिलाता हुआ कि हम इसका कोई ऐसा चौखटा न बनाएं जिसमें हमारे पूर्वग्रहों का काठ ज़्यादा लगा हो, कहानियों के भीतर से निकलने वाले सच और संघर्ष का लोहा कम। योगिता यादव का यह तीसरा संग्रह है। उनकी कुछ पुरानी पढ़ी हुई कहानियों की स्थूल याद ध्यान दिलाती है कि वे बहुत सारे विषयों को छूती रही हैं और हमेशा समकालीन यथार्थ से मुठभेड़ करती रही हैं। और जो सबसे खास बात है कि उनकी कहानियों की स्त्रियां कभी हारतीं नहीं- वे बूढ़ी और लाचार हो जाएं तब भी उनका सपना पूरा होता है और वे बहुत मासूम डरी हुई बच्चियां हों, तब भी अपनी हद में अपना बदला निकाल लेती हैं। इस ढंग से देखें तो ये लड़ती हुई स्त्रियों की कहानियां हैं जो कई बार लड़ती नज़र नहीं आतीं, लेकिन अपने समय और अपनी स्थितियों से लगातार युद्धरत रहती हैं।

पुस्तकः नए घर में अम्मा
लेखकः
योगिता यादव
प्रकाशनः
सेतु प्रकाशन; 118 पृष्ठ
मूल्यः
200 रुपये

प्रियदर्शन
प्रियदर्शन
पत्रकार एवं लेखक। दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित। सम्प्रति: एनडीटीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत।
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