Sunday, April 12, 2026
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अमेरिका-ईरान के बीच इस्लामाबाद में वार्ता हुई फेल, ये रहीं मुख्य वजहें

इस्लामाबाद में ईरान-अमेरिका के बीच हुई वार्ता फेल हो गई और यह बातचीत किसी निर्णायक नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।

इस्लामाबादः 21 घंटे तक चली लंबी बातचीत के बाद भी पाकिस्तान की मध्यस्थता में चल रही अमेरिका-ईरान शांति वार्ता शनिवार 11, अप्रैल को बेनतीजा रही। एक तरफ, वाशिंगटन प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने कहा कि यह “ईरान के लिए बुरी खबर” है और उनकी टीम “अंतिम और सर्वोत्तम प्रस्ताव” पेश करने के बाद वार्ता समाप्त कर रही है। दूसरी तरफ, ईरान के संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबफ का कहना है कि उनके प्रतिनिधिमंडल ने इस दौरान “भविष्योन्मुखी” पहलों का मुद्दा उठाया। लेकिन अमेरिका उनका विश्वास हासिल करने में विफल रहा।

इस्लामाबाद में हुई यह वार्ता ईरान और अमेरिका के बीच सबसे उच्च स्तरीय प्रत्यक्ष बातचीत थी। इतनी कि 1979 की इस्लामी क्रांति और तेहरान में अमेरिकी दूतावास संकट के बाद इस लेवल की बैठक हुई हो। पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। दांव बहुत बड़ा था। 28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका-इजरायल के ईरान पर युद्ध ने पहले ही वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित कर दिया है और मध्य पूर्व को संकट के कगार पर धकेल दिया है।

ईरान-अमेरिका में क्यों नहीं बनी बात?

ऐसे में जहां एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हताशा में इस स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे थे। वहीं दूसरी ओर उससे भी अधिक हताश पाकिस्तान ने युद्धरत पक्षों को अपनी राजधानी में आमंत्रित किया। जबकि दक्षिणी लेबनान में इजरायली सेनाओं द्वारा नाजुक दो सप्ताह के युद्धविराम को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया था। लेकिन इसके बावजूद सुलह नहीं हो पाई। आखिर इसकी वजहें क्या हैं, आगे 5 पॉइंट्स में समझने की कोशिश करें-

  1. तल्ख रवैया- ईरान-अमेरिका के बीच सुलह के न बन पाने की सबसे बड़ी वजह है कि दोनों में से कोई भी पक्ष समझौता करने या अपनी ‘रेड लाइन’ से पीछे हटने को तैयार नहीं था। अमेरिका ने ईरान से यूरेनियम संवर्धन रोकने और भविष्य में परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता जताने की मांग की। ईरान ने इनकार कर दिया। उसने कहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण नागरिक उद्देश्यों के लिए है।

वार्ता के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने कहा, “हम ऐसी स्थिति तक नहीं पहुंच सके, जहां ईरानी हमारी शर्तें मानने को तैयार हों।” उधर ईरान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी मांगों को “अत्यधिक और अनुचित” बताया।

मध्य पूर्व के पूर्व अमेरिकी वार्ताकार आरोन डेविड मिलर फिलहाल पूरे मामले में ईरान की बढ़त बताते हैं. वह अमेरिकी मीडिया संस्थान सीएनएन को बताते हैं कि 21 घंटे की बातचीत बिना किसी समझौते के समाप्त होने के बाद ईरानियों के पास “अमेरिकियों की तुलना में अधिक ताकत है”। डेविड मिलर ने आगे कहा, “वे रियायतें देने में स्पष्ट रूप से कोई जल्दी नहीं दिखा रहे हैं, जिससे पता चलता है कि ईरान अमेरिका की तुलना में धीमी गति से काम कर रहा है।”

  1. माहौल बातचीत लायक था? – शांति वार्ता के लिए विश्वास जरूरी है। या कम से कम कुछ शांति, या उसका आभास होना चाहिए। जब ​​ईरान और अमेरिका के वार्ताकार इस्लामाबाद में इक्टठे हुए, तब न तो शांति थी और न ही शांति। इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को बार-बार धमकियां दीं और यहां तक ​​कहा कि “आज रात पूरी सभ्यता का अंत हो जाएगा”। वार्ता शुरू होने से कुछ घंटे पहले भी उन्होंने अपने रुख में नरमी नहीं बरती। ईरानी अधिकारियों के पाकिस्तान पहुंचने के दौरान ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर शांति समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिकी हमले फिर से शुरू किए जाएंगे और तेज किए जाएंगे।

इस माहौल ने वार्ता को प्रभावित किया। ईरान ने इसे कूटनीति नहीं, बल्कि दबाव के रूप में देखा। जानकारों का कहना है कि यह युद्धविराम ट्रंप की अतिवादी धमकियों के बाद हुआ। इससे विश्वास बढ़ाने के बजाय तेहरान का रुख और कड़ा हो गया। ईरान पहले सतर्क था। जबकि अमेरिका ने कड़े रुख के साथ हस्तक्षेप किया। दोनों देशों के बीच खाई को और चौड़ा करने का ही इरादा था।

  1. इजराइल के लेबनान पर हमले – पाकिस्तान में ईरान-अमेरिका वार्ता चल रही थी। उसी दौरान इजरायल ने लेबनान में हमले जारी रखे, जो कि हिजबुल्लाह के नियंत्रण वाला क्षेत्र है, जो तेहरान के एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस यानी “प्रतिरोध की धुरी” का हिस्सा है। ईरान शांति वार्ता की शर्त के रूप में लेबनान पर इजरायली हमलों को रोकना चाहता था। लेकिन इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका और ईरान के बीच द्विपक्षीय युद्धविराम उस पर लागू नहीं होता। इजरायल ने लेबनान पर हमले जारी रखे।

वार्ता से ठीक पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे लेकर एक एक्स पोस्ट भी किया था, जिसे उन्होंने बाद में डिलीट कर दिया। आसिफ ने इजरायल पर लेबनान में “नरसंहार” करने का आरोप लगाया। “इजरायल के विनाश” की मांग करने वाले उनके इस पोस्ट पर नेतन्याहू के ऑफिस ने कड़ी प्रतिक्रिया भी दी थी।

  1. स्ट्रैट ऑफ होर्मुज बड़ा फैक्टर – स्ट्रैट ऑफ होर्मुज पर कंट्रोल अमेरिका-ईरान वार्ता में एक प्रमुख अड़चन बन गया है, जो 28 फरवरी से काफी हद तक बंद है। ईरान ने इससे पहले स्ट्रैट के कुछ हिस्सों में बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं, जिससे फारस की खाड़ी से जहाजों का आवागमन और तेल का प्रवाह बाधित हो गया था। अमेरिका चाहता था कि होर्मुज को तुरंत फिर से खोला जाए। ट्रंप ने बार-बार कहा कि अमेरिका के लिए यह एक गैर-समझौता योग्य मुद्दा है। उन्होंने तो यहां तक ​​कि ट्रुथ सोशल पर अपशब्दों से भरी एक तीखी टिप्पणी में ईरानियों को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने होर्मुज नहीं खोला, तो वे “नरक में जीएंगे”।

लेकिन ईरान स्ट्रैट ऑफ होर्मुज को एक हथियार के रूप में देखता है। वह सबसे पहले अपने ऊपर लगे प्रतिबंधों से राहत और सुरक्षा गारंटी चाहता है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, अन्य मुद्दों पर प्रगति के बावजूद स्ट्रैट ऑफ होर्मुज के कंट्रोल को लेकर मतभेद बने रहे। सीएनएन ने बताया कि इस विफलता से होर्मुज को फिर से खोलने को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं।

इससे पहले, ट्रंप ने एबीसी को बताया था कि वे इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर कंट्रोल के लिए ईरान के साथ मिलकर विचार कर रहे हैं और होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से फीस वसूलने की योजना बना रहे हैं । ईरान ने होर्मुज पर अपने और ओमान के कंट्रोल की औपचारिक मान्यता मांगी है। साथ ही, ईरान स्ट्रैट ऑफ होर्मुज में जहाजों से ट्रांजिट टोल्स या फीस वसूलने का अधिकार भी बरकरार रखना चाहता है।

  1. अमेरिका और ईरान के बीच विश्वास की कमी – अंततः, इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता में विश्वास ही सबसे बड़ा निर्णायक कारक साबित हुआ। सालों की दुश्मनी के कारण दोनों पक्षों को एक-दूसरे के इरादों पर शक था। वार्ता शुरू होने से पहले ही ईरान के वार्ताकार मोहम्मद बगेर ग़ालिबफ़ ने कहा था, “हमारे बीच सद्भावना तो है, लेकिन विश्वास नहीं है।”

वह मानसिकता ईरान का बोझ थी, जिसे वार्ताकार 21 घंटे की बातचीत के दौरान ढोते रहे। जहां अमेरिकी उपराष्ट्रपति वैंस ने अमेरिकी प्रस्ताव को अपना “अंतिम और सर्वश्रेष्ठ” प्रस्ताव बताया। वहीं ईरानियों ने इसे “एकतरफा” बताया।

अमरेन्द्र यादव
अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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